अजीम सितारा, अजीज प्यारा

जब भी हम अस्सी और नब्बे के दशक को याद करेंगे, अजीज साहब आपको गुनगुनाएंगे। आपका ही तो गाना है। ‘देश बदलते हैं वेष बदलते नहीं दिल बदलते नहीं दिल, हम बंजारे।’ हम बंजारों के अजीज को द लखनऊ ट्रिब्यून परिवार की ओर से आखिरी सलाम।

गानों की दुनिया का अजीम सितारा था, मोहम्मद अजीज प्यारा था। काम की व्यस्तता के बीच हमारे अजीज मोहम्मद अजीज दुनिया को विदा कर गए। मोहम्मद रफी के करीब इनकी आवाज पहचानी गई, लेकिन अजीज का अपना मकाम रहा। अजीज अपने वर्तमान में रफी साहब के अतीत को जीते रहे या जीते हुए देखे गए। यह अजीज के साथ नाइंसाफी हुई। मोहम्मद अजीज की आवाज बंद गले की थी, मगर बंद गली से निकलते हुए जब चौराहे पर पहुंचती थी, तब सुनने वाला भी खुल जाता। एक बंद गिरह के खुल जाने की आवाज थी मोहम्मद अजीज की। यहीं पर मोहम्मद अजीज महफिलों से निकल कर मोहल्लों के गायक हो जाते थे। अजीज अजीमतर हो जाते थे।

एक उदास और खाली दौर में अजीज की आवाज सावन की तरह थी। सुनने वालों ने उनकी आवाज को गले तो लगाया, मगर अजीज को उसका श्रेय नहीं दिया। अपनी लोकप्रियता के शिखर पर भी उन्हें बड़ा गायक नहीं माना गया, जबकि उनके गाने की शास्त्रीयता कमाल की थी। अजीज गा नहीं सकने वालों के गायक थे। उनकी नकल करने वाले आपको कहीं भी मिल जाएंगे। उनकी आवाज दूर से आती लगती है। जैसे बहुत दूर से चली आ रही कोई आवाज करीब आती जा रही हो।

फिल्म ‘सिंदूर’ के गाने में लता गा रही हैं। पतझड़ सावन बसंत बहार। पांचवा मौसम प्यार का, इंतजार का। कोयल कूके बुलबुल गाए हर इक मौसम आए जाए। गाना एकतरफा चला जा रहा है। तभी अजीज साहब इस पंक्ति के साथ गाने में प्रवेश करते हैं। ‘लेकिन प्यार का मौसम आए। सारे जीवन में एक बार एक बार।’ अजीज के आते ही गाना दमदार हो जाता है। जोश आ जाता है। गाने में सावन आ जाता है।

चौंसठ साल की जिंदगी में बीस हजार गाने गा कर गए हैं। सुभाष घई की फिल्म ‘राम लखन’ का गाना ‘माई नेम इज लखन’ उस दौर को दमदार बनाया गया था। इस गाने ने अनिल कपूर को घर-घर का दुलारा बना दिया। मोहम्मद अजीज अनिल कपूर में ढल गए थे। यह उनके श्रेष्ठतम गानों में से एक था। मोहम्मद अजीज को कागज पर सामान्य गीत ही मिले, लेकिन उन्होंने अपने सुरों से उसे खास बना दिया। और जब खास गीत मिले, उसे आसमान पर पहुंचा दिया। मोहम्मद अजीज की आवाज ही उस वक्त के भारत के कुलीन तबके को चुनौती दे सकती थी। बहुत खूब दी भी। उनकी आवाज की वतनपरस्ती अतुलनीय है। आप कोई भी चुनावी रैली बता दीजिए जिसमें ‘कर्मा’ फिल्म का गाना न बजता हो। रैलियों का समां ही बंधता है मोहम्मद अजीज की आवाज से।’

हमने हिंदी प्रदेशों की सड़कों पर रात-बिरात यहां-वहां से निकलते हुए अपनी कार में मोहम्मद अजीज को खूब सुना है। उनके गानों से हल्का होते हुए गांवों को देखा है, कस्बों को देखा है। तेजी से गुजरते ट्रक से जब भी अजीज की आवाज आई, रगों में सनसनी फैल गई। अजीज के गाने ट्रक वालों के हमसफर रहे। उनका गाया हुआ बिगाड़ कर गाने में भी मजा आता था। फिल्में फ्लाप हो जाती थीं, मगर अजीज के गाने हिट हो जाते थे।

विनोद खन्ना अभिनीत ‘सूर्या’ का गाना सुनकर लगता है कि कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो है। इस गाने को सुनते हुए अक्सर लगता रहा कि तमाम तकलीफों को मिटाने ‘सूर्या’ आ रहा है। सूर्या के आते ही सब ठीक हो जाएगा। नाइंसाफी से लड़ते रहना है। सुबह होगी। बाद की पढ़ाई ने समझा दिया कि मसीहा कभी नहीं आता। किसी एक के आने से सब ठीक नहीं होता है। यह सच है कि मैंने ‘सूर्या’ के इस गाने को असंख्य बार सुना है। सोचता रहता हूं कि मुंबई के गीत लिखने वालों ने कितनी खूबी से ऐसे गाने पब्लिक स्पेस में अमर कर दिए।

अजीज साहब हम आपके कर्जदार हैं। आपके गानों ने मुझे नए ख्वाब दिए हैं। लोग कहते थे कि आपकी आवाज लोकल है। शुक्रिया आपके कारण मैं लोकल बना रहा। मुझे इस देश के गांव और कस्बे आपकी आवाज के जैसे लगते हैं। दूर से करीब आते हुए और करीब से दूर जाते हुए। मोहम्मद अजीज मेरे गायक हैं। रफी के वारिस हैं, मगर रफी की नकल नहीं हैं। हालांकि उनमें रफी की ऊंचाई भी थी, लेकिन वह उन अनाम लोगों की खातिर नीचे भी आते थे जिनकी कोई आवाज नहीं थी।

अजीज के कई गानों में अमीरी और गरीबी का अंतर दिखेगा। हम समझते हैं कि गायक को गाने संयोग से ही मिलते हैं फिर भी अजीज उनके गायक बन गए जिन्हें कहना नहीं आया। जो आवाज के गरीब थे। जिन्हें लोगों ने नहीं सुना। उन्हें अजीज का इंतजार था और अजीज मिला। आपने हिन्दी फिल्मों के गानों का विस्तार किया है। नए श्रोता बनाए। आप चले गए। मगर आप जा नहीं सकेंगे। लोग मर्द टांगे वाला गाते रहेंगे, इसलिए कि इस गाने को कोई कैसे गा सकता है। ‘आखिर क्यों’ का गाना कैसे भूल सकता हूं। यह गाना आपको रफी बनाता है।

– रवीश कुमार (सोशल मीडिया से साभार)

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