अभागी का स्वर्ग

सात दिनों तक ज्वरग्रस्त रहने के बाद ठाकुरदास मुखर्जी की वृद्धा पत्नी की मृत्यु हो गई। मुखोपाध्याय महाशय अपने धान के व्यापार से काफी समृद्ध थे। उन्हें चार पुत्र, चार पुत्रियां और पुत्र-पुत्रियों के भी बच्चे, दामाद, पड़ोसियों का समूह, नौकर-चाकर थे-मानो यहां कोई उत्सव हो रहा हो।

धूमधाम से निकलने वाली शव-यात्रा को देखने के लिए गांव वालों की काफी भीड़ इकट्ठी हो गई। लड़कियों ने रोते-रोते माता के दोनों पांवों में गहरा आलता और मस्तक पर बहुत-सा सिंदूर लगा दिया। बहुओं ने ललाट पर चंदन लगाकर बहुमूल्य वस्त्रों से सास की देह को ढंक दिया। पत्र, पुष्प, गंध, माला और कलरव से मन को यह लगा ही नहीं कि यहां कोई शोक की घटना हुई है-ऐसा लगा जैसे बड़े घर की गृहिणी, पचास वर्षों बाद पुन: एक बार, नई तरह से अपने पति के घर जा रही हो। प्रबल हरि-ध्वनि (राम नाम सत्य है) से प्रात:कालीन आकाश को गुंजित कर सारा गांव साथ चल दिया।

एक दूसरा प्राणी भी थोड़ी दूर से इस दल का साथी बन गया-वह थी कंगाली की मां। वह अपनी झोंपड़ी के आंगन में पैदा हुए बैंगन तोड़कर, हाट जा रही थी। इस दृश्य को देखकर उसके पग रुक गए। आंसू बहाती वह सबसे पीछे श्मशान में खड़ी हो गई। कंगाली की मां को निकट जाने का साहस नहीं हुआ।

चौड़ी और बड़ी चिता पर जब शव रखा गया, उस समय शव के दोनों रंगे हुए पांव देखकर उसके दोनों नेत्र शीतल हो गए। उसकी इच्छा होने लगी कि दौड़कर मृतक के पांवों से एक बूंद आलता लेकर वह अपने मस्तक पर लगा ले। अनेक कंठों की हरिध्वनि के साथ पुत्र के हाथों में जब मंत्रपूत अग्नि जलाई गई, उस समय उसके नेत्रों से झर-झर पानी बरसने लगा। वह मन-ही-मन बारंबार कहने लगी- ‘सौभाग्यवती मां, तुम स्वर्ग जा रही हो-मुझे भी आशीर्वाद देती जाओ कि मैं भी इसी तरह कंगाली के हाथों अग्नि प्राप्त करूं।’

लड़के के हाथ की अग्नि! यह कोई साधारण बात नहीं। प्रज्ज्वलित चिता का अजस्र धुआं नीले रंग की छाया फेंकता हुआ घूम-घूमकर आकाश में उठ रहा था। कंगाली की मां को उसके बीच एक छोटे-से रथ की आकृति जैसे स्पष्ट दिखाई दे गई। उस रथ के चारों ओर कितने ही चित्र अंकित थे। ऊपर देखती हुई कंगाली की मां की दोनों आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। इसी बीच एक पंद्रह-सोलह वर्ष की उम्र के बालक ने उसके आंचल को खींचते हुए कहा- ‘तू यहां आकर खड़ी है, मां, भात नहीं रांधेगी?’

चौंकते हुए पीछे मुड़कर मां ने कहा- ‘राधूंगी रे ! अचानक ऊपर की ओर अंगुली उठाकर व्यग्र स्वर में कहा- ‘देख-देख बेटा ब्राह्मणी मां उस रथ पर चढ़कर स्वर्ग जा रही हैं!’
लड़के ने आश्चर्य से मुंह उठाकर कहा- ‘कहां?’ फिर क्षणभर बाद बोला- ‘तू पागल हो गई है मां! वह तो धुआं है।’
फिर गुस्सा होकर बोला- ‘दोपहर का समय हो गया, मुझे भूख नहीं लगती है क्या?’
पर मां की आंखों में आंसू देखकर बोला- ‘ब्राह्मणों की बहू मर गई है, तो तू क्यों रो रही है, मां?’
कंगाली की मां को अब होश आया। दूसरे के लिए श्मशान में खड़े होकर आंसू बहाने पर वह लज्जित हो उठी। तुरंत आंखें पोंछकर बोली- ‘रोऊंगी किसके लिए-आंखों में धुआं लग गया है।’
‘हां, धुआं तो लग ही गया था! तू रो रही थी।’
मां ने और प्रतिवाद नहीं किया। लड़के का हाथ पकड़कर घाट पर पहुंची; स्वयं भी स्नान किया और कंगाली को भी स्नान कराकर घर लौट आई-श्मशान पर होने वाले संस्कार के अंतिम भाग को देखना उसके भाग्य में नहीं बदा था।

लेखक: शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय

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