अविश्वास प्रस्ताव से आखिर क्यों डर रही है मोदी सरकार

अखिलेश अखिल

मोदी भक्त जिस संभावित अविश्वास प्रस्ताव की खिल्ली उड़ा रहे हैं और कह रहे हैं कि एक मजबूत और बहुमत वाली सरकार का कुछ होने वाला नहीं है,वहीं बीजेपी के रणनीतिकार अविश्वास प्रस्ताव को संकट के रूप में देख रहे हैं। बीजेपी नेताओं का मानना है कि सरकार को भले ही अविश्वास प्रस्ताव से कोई डर नहीं लेकिन अगर अविश्वास प्रस्ताव के नाम पर सभी विपक्षी एक हो गए तो बीजेपी की अगली राजनीति पर असर पडेगा। बीजेपी कभी नहीं चाहेगी कि विपक्षी एकता कायम हो। और अगर ऐसा हो गया तो 2019 का चुनाव आसान नहीं होगा बीजेपी के लिए। चुकी 2014 के चुनाव में विपक्ष बंटा हुआ था इसलिए बीजेपी मोदी की अगुवाई में भरी मतों से जीत हासिल कर पाए। यही वजह है कि बीजेपी को अविश्वास प्रस्ताव का भय सता रहा है।

बता दें कि टीडीपी और वाईएसआर कांग्रेस मोदी सरकार के खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव लाने पर अड़े हुए हैं और मोदी सरकार के खिलाफ पहली बार लाए जाने वाले अविश्वास प्रस्ताव को कई विपक्षी दलों ने समर्थन देने की बात कही है। इनमें महाराष्ट्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम, एनसीपी और एआईएमआईएम शामिल हैं।कांग्रेस चाहती है कि सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आये ताकि विपक्षी एकता कायम हो। बीजेपी की यही बड़ी चिंता है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद-75 में कहा गया है कि केंद्रीय मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति जवाबदेह है। यानी सदन में बहुमत हासिल होने पर ही मंत्रिपरिषद बनी रह सकती है। इसके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित होने पर प्रधानमंत्री सहित मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देना होता है। अविश्वास प्रस्ताव लोक सभा की नियमावली-198 के लाया जाता है। इसके लिए लोक सभा के कम से कम 50 सांसदों का समर्थन अनिवार्य होता है। भारत के राजनीतिक इतिहास में पहली बार 1963 में जवाहर लाल नेहरू की सरकार को अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा था। इसके बाद 1978 में पहली बार मोरारजी देसाई सरकार को सदन का विश्वास हासिल करने में विफल रहने पर इस्तीफा देना पड़ा था। 1963 से लेकर अब तक केंद्र की सरकारों को 26 बार अविश्वास प्रस्ताव का सामना करना पड़ा है।

2019 के आम चुनाव करीब आ गए है और इसे देखते हुए मोदी सरकार के खिलाफ विपक्षी दलों के बीच एकता को लेकर कोशिशें तेज हो गई हैं। एक तरफ कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी विपक्षी दलों को डिनर दे कर एकता का प्रयास कर चुकी हैं तो दूसरी तरफ ममता और के चंद्रशेखर राव की बैठकें संभावित मोर्चा को लेकर चल रही है। फिर शरद पवार भी अस माह के अंत में विपक्षी एकता को लेकर डिनर पार्टी करने जा रहे हैं। उधर सपा और बसपा के बीच गठबंधन बनता दिख रहा है। यह भी माना जा रहा है कि वाम दल भी कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। जाहिर है कि बीजेपी के खिलाफ एक बड़ा गठबंधन बनने की संभावना दिख रही है। बीजेपी को इसी से डर है।

देश में बदलते राजनीतिक रुख को देखते हुए अविश्वास प्रस्ताव विपक्षी दलों की एकता के लिहाज से एक अहम मौका माना जा रहा है। माना जा रहा है कि इस प्रस्ताव पर मत विभाजन के दौरान विपक्षी दलों का भाजपा को लेकर रुख साफ हो सकता है। अगर बड़ी संख्या में गैर-एनडीए सांसद इस प्रस्ताव के साथ आते हैं तो इससे मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष की मजबूती का संदेश जा सकता है। और अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी की विस्तारवादी राजनीति के लिए ख़तरा हो सकता है। बीजेपी इसी वजह से अविश्वास प्रस्ताव से डर रही है।

पिछले चार साल के राजनीतिक इतिहास को देखें तो 2014 के बाद भाजपा पूर्वोत्तर के राज्यों में अपनी पकड़ मजबूत करती हुई दिख रही है लेकिन, दक्षिण भारत में उसकी स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। इन राज्यों में भाजपा क्षेत्रीय क्षत्रपों के सहारे ही दिखती है। ऐसे में यदि दक्षिण भारत की प्रमुख पार्टियां एनडीए से दूर छिटककर कांग्रेस या संभावित तीसरे मोर्चे के साथ जाती हैं तो 2019 में बहुमत न हासिल करने के बाद भाजपा के लिए फिर से सरकार बनाना मुश्किल हो सकता है। दूसरी ओर, हिंदी पट्टी के बड़े राज्यों- उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश में भाजपा के पास हासिल करने को अधिक कुछ नहीं है लेकिन, खोने को बहुत सारी सीटें हैं। जानकारों के मुताबिक भाजपा इन राज्यों में सीटें गंवाने की आंशका को देखते हुए ही दक्षिण में अधिक सक्रिय है। लेकिन, अविश्वास प्रस्ताव को लेकर मत विभाजन के दौरान यहां के क्षेत्रीय दलों का रुख उसके भविष्य का भी एक संकेत हो सकता है।

सच तो यही है कि अविश्वास प्रस्ताव के दौरान अगर विपक्ष मजबूत और सरकार असहज दिखती है तो एनडीए में शामिल कई दल आने वाले दिनों में इससे अलग जा सकते हैं। भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने पहले ही 2019 के चुनाव में अकेले जाने का ऐलान कर दिया है। इसका अलावा जीतन राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (हम) एनडीए से अलग हो चुकी है। बताया जाता है कि पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और शिरोमणि अकाली दल पहले ही भाजपा नाराज चल रहे हैं। इसके अलावा सरकार में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी प्रमुख रामविलास पासवान ने भी 2019 को लेकर संकेत देने की कोशिश की है। उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार उपचुनाव में एनडीए को मिली हार को नुकसान बताया है। जाहिर है पासवान के मन में भी कुछ राजनीतिक बातें चल रही है। ऐसे माहौल में अविश्वास प्रस्ताव को भला कौन स्वीकार करे। कौन अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी चलाये।

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