आईआईटी-आईआईएम की मदद से सरकार ने खींचे हाथ, प्राइवेट सेक्टर के दखल के लिए खोले दरवाजे

केंद्र की मोदी सरकार ने आईआईटी-आईआईएम जैसे देश के उत्कृष्ट शिक्षण संस्थानों में प्राइवेट सेक्टर के दखल के दरवाजे खोल दिए हैं। सरकार ने इस साल के बजट में इन संस्थानों के साथ ही केंद्रीय विश्वविद्यालयों को दी जाने वाली मदद से हाथ खींच लिए हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार जो नई शिक्षा नीति ला रही है, वह किस तरह की होगी, इसका अंदाजा अभी संसद में पेश बजट से भी मिलता है। इसमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों का बजट लगभग एक तिहाई कर दिया गया है, जबकि डीम्ड विश्वविद्यालयों का बजट तिगुना कर दिया गया है। इसी तरह, आईआईटी और आईआईएम का बजट तो घटा दिया गया है जबकि नए आईआईटी और आईआईएम के लिए कोई राशि रखी ही नहीं गई है। मतलब, चुनावों से पहले नए आईआईटी और आईआईएम खोलने की जो बातें की गई थीं, वे बेमानी रह गईं। आईआईटी और आईआईएम को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत चलाने की सरकार ने मंशा जताई है।

सरकार के 100 दिन के एजेंडे में नई शिक्षा नीति को लागू करना शामिल है। इस नीति को बनाने में मोदी सरकार को चार साल लग गए। नीति का ड्राफ्ट जारी हो चुका है। जानकार बताते हैं कि इस ड्राफ्ट को जुलाई के अंत या अगस्त के पहले सप्ताह में होने वाली कैबिनेट बैठक में मंजूरी दी जाएगी। इस नीति में 2030 तक के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। शिक्षा नीति पर शिक्षा संस्थानों को आधिकारिक मान्यता या प्रमाणन देने की भी नई व्यवस्था शुरू करने पर ज्यादा जोर दिया गया है। शिक्षा नीति में कहा गया है कि इस काम का विकेंद्रीकरण हो और निजी एजेंसियों को प्रमाणन देने की अनुमति दी जाए।

मोटे तौर पर लगता है कि सरकार का सारा ध्यान निजी व्यवस्था को बढ़ावा देने पर रहेगा। इसका अंदाजा इस बार के बजट (2019-20) को देख कर भी लगाया जा सकता है। बजट भाषण में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उच्च शिक्षा को लेकर कोई घोषणा नहीं की। नई शिक्षा नीति लाने की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार का मकसद दुनिया के टॉप 200 संस्थानों में भारत के संस्थानों की संख्या बढ़ाने का है। इनकी संख्या अभी तीन है।

बजट दस्तावेज बताते हैं कि कई मदों पर अनुमानित खर्च घटा दिया गया है। इनमें केंद्रीय विश्वविद्यालयों को दी जाने वाली ग्रांट प्रमुख है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों को जहां 2017-18 में 7286.22 करोड़ रुपये का बजटीय सपोर्ट दिया गया था। उसे घटाकर लगभग एक तिहाई (2865.62 करोड़ रुपये) कर दिया गया है। इसके एवज में माध्यमिक एवं उच्चतर शिक्षा कोष से 1000 करोड़ और नेशनल इंवेस्टमेंट फंड से 2746.27 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। हालांकि, अभी जानना बाकी है कि इनवेस्टमेंट फंड से ये पैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों को किन शर्तों पर मिलेंगे, लेकिन अपुष्ट सूत्र बताते हैं कि विश्वविद्यालयों को लोन के माध्यम से पैसे मिलेंगे।

दिलचस्प बात यह है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों की ग्रांट तो कम कर दी गई है, लेकिन निर्मला सीतारमण के इस बजट में डीम्ड विश्वविद्यालयों को आगे बढ़ाने के लिए 350 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 5 गुना है। पिछले साल के बजट में 60 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था जबकि उससे पहले इस तरह का प्रावधान नहीं किया जाता था। साफ है कि सरकार केंद्रीय विश्वविद्यालयों के बजाय डीम्ड विश्वविद्यालयों पर मेहरबान है।

मोदी सरकार ने छात्रों द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता में भी कमी कर दी है। 2017-18 में सरकार ने इस मद में कुल बजटीय सपोर्ट 1950 करोड़ रुपये वास्तविक खर्च दिखाया था। उसे 2018-19 में 30 करोड़ रुपये और अब 20 करोड़ रुपये कर दिया गया है। छात्रों को वित्तीय सहायता के पैटर्न में भी बदलाव किया गया है। अब उन्हें माध्यमिक एवं उच्चतर शिक्षा कोष से वित्तीय सहायता दी जाएगी, लेकिन उसका बजट भी बहुत अधिक नहीं है। उन्हें इस मद में 340 करोड़ रुपये दिए जाएंगे। शर्तें क्या होंगी, यह जानना बाकी है, लेकिन स्टूडेंट फाइनेंशियल ऐड के कुल मद में राशि जरूर घटा दी गई है। इस मद में 2018-19 में 2600 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया जिसे बाद में संशोधित कर 2155 करोड़ रुपये कर दिया गया और अब इस साल 2306 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

ऐसे होगा इनोवेशन!

अकसर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इनोवेशन की बात करते हैं और इसके लिए आईआईटी, आईआईएम- जैसे संस्थानों को बढ़ावा देने की वकालत करते रहे हैं। लेकिन बजट में कुछ और ही बात कही गई है। बजट 2017-18 में नए आईआईटी के लिए 342.91 और अगले साल 338 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया, लेकिन बजट 2019-20 में इसे घटाकर शून्य कर दिया गया। इसी तरह नए आईआईएम पर 136 करोड़ रुपये का प्रावधान पिछले साल किया गया था। उसे भी शून्य कर दिया गया है।

आईआईटी और आईआईएम का कुल बजटीय सपोर्ट (जीबीएस) भी घटा दिया गया है। आईआईटी के लिए 2018-19 में 236 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। उसे घटाकर 208.16 करोड़ रुपये कर दिया गया। आईआईएम के लिए 2018-19 में 828 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। इसे रिवाइज करके 200 करोड़ रुपये किया गया। और 2019-20 में इसे 445.53 करोड़ रुपये कर दिया है।

इतना ही नहीं, सरकार ने इस बार के बजट में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल के तहत आईआईटी और आईआईएम के संचालन की बात कही है। इसकी डिटेल अभी आनी बाकी है। लेकिन इतना तो तय मानिए कि इससे आईआईटी और आईआईएम में प्राइवेट सेक्टर का रास्ता जरूर साफ हो जाएगा। संभव है कि अगले 100 दिन में सरकार की मंशा से पर्दा उठ जाए।

तो वे बस, चुनावी बातें थीं

आम चुनाव से पहले अचानक मोदी सरकार को याद आया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के स्तर पर कुछ काम नहीं हुआ है तो फरवरी, 2019 में हुई कैबिनेट की बैठक के बाद प्रेस नोट जारी किया गया कि केंद्र सरकार ने 13 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय के निर्माण कार्य को मंजूरी दे दी है। सरकार ने उस समय अगले 36 महीनों में ये सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनाने की बात कही और विश्वविद्यालयों के निर्माण कार्य के लिए 3639.32 करोड़ रुपये के बजट की इजाजत दे दी। तब कहा गया कि नए केंद्रीय विश्वविद्यालयों का निर्माण केंद्रीय विश्वविद्यालय कानून 2009 के तहत बिहार, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, केरल, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान और तमिलनाडु में किया जाएगा। इन 11 राज्यों में एक-एक विश्वविद्यालय बनाए जाने की बात कही गई थी, वहीं जम्मू-कश्मीर में दो विश्वविद्यालय बनाए जाने की बात थी।

फिर से चुने जाने के बाद संसद की पहली बैठक में इस बारे में सरकार से सवाल पूछा गया। सवाल कानुमुरु रघुराम कृष्णराजू ने किया और पूछा कि क्या सरकार की देश में 13 नए केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने और उनकी अवसंरचनात्मक सुविधाओं हेतु 3600 करोड़ रुपये आवंटित करने की योजना है? तो नए मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियााल निशंक ने जवाब दिया कि नहीं, वर्तमान में देश में नया केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव नहीं है। हालांकि इस जवाब में नीचे बताया गया है कि इस तरह के प्रस्ताव को कैबिनेट ने फरवरी में मंजूरी दी थी, लेकिन इसे आगे क्यों नहीं बढ़ाया गया, बजट का हिस्सा क्यों नहीं बनाया गया, इस तरह की कोई जानकारी नहीं दी गई है।

केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के पद खाली रहने का मामला कई बार उठा है लेकिन सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं दिखाई देती। इसका एक मजेदार पहलू भी है। 20 मार्च, 2017 को सरकार ने लोकसभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में जानकारी दी कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 17,006 शिक्षकों के पद स्वीकृत हैं और इनमें से 6,141 पद खाली हैं। इसके दो साल बाद 24 जून, 2019 को जवाब दिया गया कि1 अप्रैल, 2019 तक देश के सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 17,834 पद स्वीकृत हैं और उनमें से 11,115 पद भरे हुए हैं, यानी 6,719 पद खाली हैं। गणित देखिए कि दो साल के दौरान 828 पद सृजित तो किए गए, बावजूद इसके शिक्षकों की खाली सीटें और बढ़ गई।

उच्चतर शिक्षा के लिए एक और अहम संस्थान है भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं शोध संस्थान (आईआईएसईआर), मोदी सरकार ने इस संस्थान का बजट भी घटा दिया है। 2016-17 में इसका बजट 720 करोड़ रुपये था। इसे पहले 650 करोड़ रुपये किया गया, फिर 2018-19 में 689 करोड़ रुपये कर दिया गया। हालांकि नए बजट में इसमें बढ़ोतरी की गई है।

संडे नवजीवन से साभार

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