आखिर कौन होगा प्रदेश में भाजपा का नया खेवनहार?

भारतीय जनता पार्टी का प्रदेश में अगला खेवनहार कौन होगा जो खेमों में बंटी पार्टी को एकजुट कर मैदान में कमलनाथ सरकार की तगड़ी घेराबंदी करते हुए उन पर भारी पड़ सके। मुख्यमंत्री कमलनाथ को घेरने के भाजपा के जितने भी प्रयास रहे उनमें वह एक प्रकार से असफल रही, क्योंकि कोई बड़ी चुनौती वह उनके लिए खड़ी नहीं कर पाई। इसके विपरीत देखने में यह आया कि हर कदम पर कमलनाथ नहले पर दहला साबित हुए। पार्टी का मुख्यमंत्री नहीं होता तब प्रदेश अध्यक्ष का पद एवं भूमिका ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जिसके कंधों पर सबको साथ लेकर चलते हुए फिर से पार्टी को खड़ा करने की जिम्मेदारी होती है। भाजपा के संगठनात्मक चुनाव चल रहे हैं और उसका अगला प्रदेश अध्यक्ष कौन होगा, इस यक्ष प्रश्‍न का उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि भाजपा की प्रदेश को लेकर आखिर भावी रणनीति क्या है। पहले भाजपा नेतृत्व को यह तय करना है कि वह जोड़तोड़ के साथ सत्ता में वापसी की कोशिश करे या राज्य में मध्यावधि चुनाव के हालात पैदा कर तैयारी करे या फिर पांच साल तक विपक्ष की मजबूत राजनीति करते हुए अपने संगठन को ऐसा धारदार बनाये कि वह कांग्रेस के सत्ताजनित संगठन का मुकाबला कर सके। जब वह अपनी प्राथमिकताएं तय कर लेगी तब ही अधिक आसानी से ऐसे चेहरे को तलाश सकेगी जो सबको साथ लेकर गतिशील तथा परिणामोन्मुखी हो। भाजपा यथास्थिति रखते हुए राकेश सिंह को एक और कार्यकाल देगी या किसी नये चेहरे को खोजने की मशक्कत करती है यह इस पर निर्भर करेगा कि उसका कोई तात्कालिक लक्ष्य है या दीर्घकालीन रणनीति पर वह चलना चाहती है।

नये चेहरे की तलाश में भाजपा को मशक्कत इसलिए करना होगी क्योंकि उसे पहले यह तय करना होगा कि आगे की उसकी राजनीतिक दिशा क्या होगी। उसके बाद जो चेहरा तलाशेगी उसके नाम पर संघ कितना राजी होता है, क्योंकि संघ की भी भाजपा की संगठनात्मक जमावटों में एक अहम् भूमिका रहती आयी है, इसीलिए यह सवाल उठता है कि सर्व-स्वीकार्य चेहरा कौन होगा जो नेतृत्व विहीन और खेमों में बंटी नजर आ रही पार्टी को एकजुट कर सके। जो चेहरे चर्चित हैं उनमें से कोई आयेगा या कोई नया चेहरा सामने आयेगा, यह प्रदेश अध्यक्ष की ताजपोशी के बाद ही पता चल सकेगा। दावेदारों में तो अनेकों नाम शामिल हैं लेकिन अंतिम मोहर किस पर लगेगी इसके लिए अभी कुछ समय इन्तजार करना होगा। मध्यप्रदेश की अपनी कुछ विशषताएं हैं जिनके चलते क्षेत्रीय संतुलन व जातिगत समीकरणों पर भी ध्यान देते हुए इनको साधने वाला कौन सा चेहरा सामने आता है इस पर ही बहुत कुछ निर्भर करेगा कि वह पार्टी को मजबूती प्रदान करेगा या आगे चलकर असहाय नजर आयेगा। भाजपा के संगठनात्मक चुनाव निर्णायक दौर में पहुंच चुके हैं और यदि सब कुछ कार्यक्रम के अनुसार चलता रहा तो दिसम्बर माह के पहले पखवाड़े में प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर मोहर लग सकती है।

मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह भी दावा कर रहे हैं कि उन्हें डेढ़ साल का ही मौका मिला है इसलिए एक कार्यकाल और दिया जाए। उनका दावा इस आधार पर मजबूत नजर आता है कि उनके नाम पर भाजपा हाईकमान की सहमति आसानी से मिल जायेगी, लेकिन यदि उनके पिछले कार्यकाल को देखा जाए तो लोकसभा चुनाव को छोड़कर उनके खाते में कोई उपलब्धि नहीं है बल्कि उल्टे भाजपा का आधार सिकुड़ा है। लोकसभा चुनाव में जो भी सफलता मिली उसका श्रेय न तो प्रदेश भाजपा संगठन को न ही किसी नेता को, क्योंकि यह चुनाव केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रवाद की धुरी पर लड़ा गया था। राकेश सिंह को प्रदेश अध्यक्ष इसलिए बनाया गया था ताकि वे महाकौशल अंचल में भाजपा को मजबूत करें और विधानसभा चुनाव में अच्छे नतीजे आयें। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ तथा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कमान राकेश सिंह को चुनावी चुनौतियों के समय मिली थी। न तो राकेश सिंह महाकौशल में भाजपा की पिछली जीत का सिलसिला कायम रख पाये और न ही प्रदेश में भाजपा सत्ता में आ पाई।

झाबुआ उपचुनाव भी कांग्रेस ने जीत लिया और भाजपा विधायकों की संख्या एक कम हो गयी। प्रहलाद लोधी दूसरे ऐसे भाजपा विधायक हैं जो फिलहाल एक अदालती निर्णय के बाद दो साल की सजा होने के कारण अपना पद गंवा चुके हैं और विधानसभा अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद प्रजापति ने उनकी सदस्यता समाप्त कर सीट रिक्त घोषित कर दी है। म.प्र. उच्च न्यायालय ने फिलहाल लोधी की सजा स्थगित कर दी है। लेकिन अभी तक उनकी विधायक के रुप में बहाली नहीं हुई है। फिलहाल वे विधायक नहीं हैं और सारा मामला कानूनी पेचीदगियों में उलझा हुआ है, जब तक इसका निराकरण नहीं होता तब तक मौजूदा सदन में भाजपा के दो विधायक कम हो गये हैं और कांग्रेस एक स्थान रिक्त होने के कारण बहुमत में आ गयी है क्योंकि उसके विधायकों की संख्या 230 के सदन में 115 हो गयी है। राकेश सिंह फिलहाल भाजपा की खेमेबंदी को नियंत्रित कर सबको एक साथ लाने में भी सफल होते नजर नहीं आ रहे हैं। फिर भी उन्हें उम्मीद है कि उनके नाम पर इसलिए मोहर लग जायेगी क्याेंंकि वे हाईकमान के चहेते हैं।

अन्य जो दावेदार उम्र के बंधन के चलते निराश हो गए थे उनमें भी उम्मीद की नई किरण जागी है और उन्हें भरोसा है कि जिस प्रकार मंडल से लेकर जिला अध्यक्ष तक के पदाधिकारियों में उम्र के बंधन में शिथिलता दी गयी है वैसे ही प्रदेश अध्यक्ष के मामले में भी कुछ छूट मिल जायेगी और इससे उनकी भी उम्मीदों के पंख लग गए हैं। राकेश सिंह के अलावा जो अन्य नाम चर्चा में हैं उनमें कैलाश विजयवर्गीय, विष्णु दत्त शर्मा (वी.डी.शर्मा), डॉ. नरोत्तम मिश्रा, प्रभात झा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री वीरेन्द्र कुमार, भूपेन्द्र सिंह, सांसद अजय प्रताप सिंह, विनोद गोटिया, अरविन्द भदौरिया और लाल सिंह आर्य के नाम शामिल हैं।

और यह भी

जबसे प्रदेश में कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी है उस समय से ही भाजपा के कुछ अति महत्वाकांक्षी प्रादेशिक नेता अक्सर यह बात दोहराते रहे हैं कि कभी भी सरकार गिर सकती है। लेकिन जबसे भाजपा के ही दो विधायक नारायण त्रिपाठी और शरद कोल कांग्रेस के पाले में विधानसभा के अन्दर मतदान कर आये तबसे भाजपा नेताओं ने सरकार के भविष्य के बारे में कुछ संभलकर बोलना चालू कर दिया है और अब कभी भी सरकार गिरने की भविष्यवाणी करने से बच रहे हैं। महाराष्ट्र में हुए ताजा राजनीतिक घटनाक्रम के बाद सत्ता पलट करने का जो लोग जोरशोर से दावा कर रहे थे उन्होंने फिलहाल मौन साध लिया है। एक तो अब बदले हुए हालातों में भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह कांग्रेस में तोड़फोड़ की अनुमति देंगे इसको लेकर भी संशय प्रादेशिक नेताओं के मन में है। भाजपा के अंदरुनी खेमों में भी सत्ता-पलट की चर्चा अब फिलहाल सुनाई नहीं पड़ रही है, दूसरे दो विधायक कोल एवं त्रिपाठी पर तो वैसे ही पार्टी को अब पक्का यकीन नहीं बचा है कि वे ऐसे हालातों में पार्टी के लिए खरे साबित होंगे।

वहीं कमलनाथ सरकार के प्रवक्ता तथा जनसंपर्क मंत्री पी.सी. शर्मा, सहकारिता मंत्री डॉ. गोविन्द सिंह, उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी, लोक निर्माण मंत्री सज्जन सिंह वर्मा सहित अनेक वरिष्ठ नेता यह दावा कर रहे हैं कि अभी भी भाजपा के लगभग आधा दर्जन विधायक उनके संपर्क में हैं जो कभी भी कांग्रेस के खेमे में नजर आयेंगे और यदि भाजपा सरकार की स्थिरता को चुनौती सदन के अंदर देगी तो फिर उसके कुछ और विधायक भी कम हो जायेंगे। कांग्रेस को भरोसा है कि भाजपा यदि प्रदेश में छब्बेजी बनने चलेगी तो वह चौबेजी भी नहीं रहेगी बल्कि दुबेजी बनकर रह जायेगी।

अरुण पटेल/सुबह सबेरे से साभार

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper