आखिर मृत्यु के बाद क्या होता है आत्मा के साथ, ये सब जानकर कांप उठेंगे आप ?

नई दिल्ली: गरुड़ पुराण प्रमुख हिंदू धर्म ग्रंथों में से एक है। अगर किसी की मृत्यु हो जाये तो घर-परिवार के लोग ब्राह्मण द्वारा ये ग्रंथ सुनते हैं। इस पुराण में भगवान विष्णु ने अपने वाहन गरुड़ को मृत्यु से संबंधित बहुत सी गुप्त बातें बताई हैं। मृत्यु के बाद जीवात्मा यमलोक तक किस प्रकार से जाती है, इसका पूरा विस्तृत वर्णन गरुड़ पुराण में बताया गया है।

आज हम आपको गरुड़ पुराण में लिखी हुई कुछ ऐसी ही खास व रोचक बातें बता रहे हैं:

1.गरुड़ पुराण के अनुसार, जिस भी मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोलना चाहता है, लेकिन बोल नहीं पाता है। अंत समय में उसकी सभी इंद्रियां (बोलने, सुनने आदि की शक्ति) नष्ट हो जाती हैं और वह बिलकुल जड़ अवस्था में हो जाता है, यानी के हिल-डुल भी नहीं पाता है। और इसके बाद उसके मुंह से झाग निकलने लगते है और लार भी टपकने लगती है। और फिर उस समय दो यमदूत आते हैं। उनका चेहरा बहुत ही भयानक होता है, नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं और उनकी बड़ी-बड़ी आंखें होती हैं। उनके हाथ में दंड रहता है। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मल-मूत्र त्याग करने लग जाता है। और उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा हा शब्द करता हुआ निकलता है, जिसे यमदूत एकदम से पकड़ लेते हैं।

2. और फिर यमराज के दूत उस शरीर को पकड़कर उसी समय यमलोक ले जाते हैं, जैसे- की राजा के सैनिक अपराध करने वाले को पकड़कर ले जाते हैं उस पापी जीवात्मा के रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत डराते हैं और उसे नरक में मिलने वाले सारे दुखों के बारे में बार-बार बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पाप आत्मा ज़ोर-ज़ोर से रोने लगती है, लेकिन यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते है।

3. इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता-कांपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी हो कर, अपने सारे पापों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा और गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है

और वह भूख और प्यास से तड़पता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर ज़ोर से चाबुक मारते हुए उसे और आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता रहता है और बेहोश हो जाता है। फिर उठकर चलने लगता है। और इस प्रकार से यमदूत जीवात्मा को अंधकार वाले रास्ते से यमलोक ले जाते हैं।

4.गरुड़ पुराण के अनुसार, यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई नापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है चार कोस यानी 13-16 कि.मी) है। वहां पर यमदूत पापी जीव को थोड़ी ही देर में ले जाते हैं। और इसके बाद यमदूत उसे सजा देते हैं। और फिर इसके बाद वह जीवात्मा यमराज की आज्ञा से यमदूतों के साथ फिर से अपने घर वापस आती है।

5.घर आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा ज़ाहिर करती है परंतु यमदूत के बंधन से वह मुक्त ही नहीं हो पाती है और भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो कि पिंड और अंत समय में दान करते हैं, उससे भी प्राणी को तृप्ति नहीं होती है, क्योंकि पापी लोग को दान, श्रद्धांजलि द्वारा भी तृप्ति नहीं मिलती है। और इस प्रकार भूख-प्यास से युक्त होकर वह जीव यमलोक जाता है।

6.इसके बाद पाप आत्मा के पुत्र आदि परिजन यदि पिंडदान नहीं देते हैं, तो वह प्रेत रूप हो जाती है और काफी लंबे समय तक सुनसान जंगल में रहती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य ही करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं उसमें से दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, और तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत (आत्मा) खाता है। और फिर नौवें दिन पिंडदान करने से प्रेत (आत्मा) का शरीर बनता है, और दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति भी प्राप्त हो जाती है।

7.शव को जलाने के बाद पिंड से अंगूठे के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। और वही, यमलोक के मार्ग में शुभ और अशुभ फल को भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन से गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से ह्रदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पांचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नौवें और दसवें दिन से भूख-प्यास आदि उत्पन्न हो जाती है। ऐसे पिंड शरीर को धारण कर भूख व प्यास से व्याकुल प्रेत ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।

8.यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत (आत्मा) को बंदर की तरह से पकड़ लिया जाता है। और इसके बाद वह प्रेत भूख और प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। 47 दिन तक लगातार चलकर आत्मा यमलोक पहुंचती है। इस प्रकार मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर के पापी जीव यमराज के घर जाता है।

9.इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार से हैं- सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण, शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद ही आगे यमराज पुरी आती है। पापी प्राणी यम, पाश में बंधे हुए मार्ग में हाहाकार करते हुए ही अपने घर को छोड़कर यमराज पुरी जाते हैं।

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