आतंकवादियों के लिए सुरक्षित पनाहगार है श्रीनगर सेंट्रल जेल

जम्मू: श्रीनगर सेंट्रल जेल में बंद लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी नवीद जट को जिस तरह से आतंकवादियों ने अस्पताल पर हमला छुड़ाया, उसने इस जेल की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं। यह जेल वास्तव में आतंकियों के सुरक्षित पनाहगार की तरह है। यहां खूंखार आतंकवादियों की खूब खातिरदारी की जाती है और उन्हें हर तरह सुविधाएं उपलब्ध हैं। जेल स्टाफ नियम-कानूनों को ताक पर रख कर आतंकी सरगनाओं के मातहत कर्मचारियों की तरह काम करता है।

सूत्रों के अनुसार जेल के स्टाफ की मिलीभगत की वजह से ही पाक आतंकी नवीद फरार होने में कामयाब हुआ। बताया जाता है कि जेल में कैदियों के लिए इंटरनेट डेटा पैक वाले स्मार्टफोन्स से लेकर लजीज कश्मीरी ‘वाजवान’ मटन तक सब कुछ आसानी से उपलब्ध रहता है। जेल सूत्रों के मुताबिक, जेल की रूल बुक यहां किसी मजाक से कम नहीं। राज्य सरकार के बड़े प्रशासनिक अधिकारियों का इस ओर कोई ध्यान नहीं है। उदाहरण के तौर पर, मानवाधिकार कार्यकर्ता एचएन वानचू की हत्या का दोषी कासिम फक्तू उर्फ आशिक फक्तू श्रीनगर सेंट्रल जेल में बंद है।

जेल में बंद होने के बावजूद, उसकी ओर से आए दिन कश्मीरी मीडिया को प्रेस रिलीज जारी की जाती है। इसके अलावा यहां एक और बड़ा आतंकवादी भी उम्रकैद की सजा काट रहा है, जिससे मिलने के लिए अकसर लोग आते रहते हैं। बहुत बड़ी संख्या में उसके अनुयायी हैं, जो उसे धार्मिक गुरु मानते हैं। ये लोग अक्सर तावीज लेने के लिए यहां आते हैं। यहां सजायाफ्ता आतंकवादी मोबाइल के जरिए दूसरी जेलों में बंद अपने साथियों से खुलेआम बात करते हैं। इतना ही नहीं, वे कश्मीर और पाकिस्तान में स्थित अपने आतंकवादी संगठनों से भी संपर्क में रहते हैं। सूत्रों के मुताबिक, 2010 में कश्मीर में हुई हिंसा की साजिश भी सेंट्रल जेल में ही रची गई थी।

भारत-विरोधी अलगाववादी नेता मसरत आलम ने मोबाइल के जरिए ही कश्मीर को जलाने की साजिश रची थी। आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि मंसूर अहमद नाम का एक फार्मासिस्ट यहां 10 साल से पोस्टेड है, जिसके जेल में बंद आतंकवादियों से अच्छे संबंध बन गए हैं। सूत्रों के मुताबिक, मंसूर ही इन आतंकवादियों को इलाज के नाम पर श्रीनगर के अस्पतालों में ले जाने में मदद करता है।

सूत्रों के मुताबिक, डॉ. जीनत निजामी नाम की जिस मेडिकल अफसर ने आतंकवादी नवीद जट और पांच अन्य कैदियों को मेडिकल चेक-अप के लिए एसएमएचएस अस्पताल भेजा था, वह तीन सालों से जेल में ड्यूटी कर रही हैं। उनके साथ हेल्थ डिपार्टमेंट ने डॉक्टर सज्जाद अहमद को भी यहां ड्यूटी पर रखा है, लेकिन वह काफी दिनों से बीमार हैं और अकसर छुट्टी पर रहते हैं। बताया जाता है कि जेल में आतंकवादियों को खाने में कश्मीर का स्पेशल ‘वाजवान’ मटन भी परोसा जाता है। लगभग दस साल पहले, सीआरपीएफ ने इस जेल में छापा मारा था और यहां से मटन काटने के चॉपर, बड़े चाकू और दर्जनों सेल फोन बरामद किए थे। हालांकि इस छापे के बाद भी जेल की व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ। सूत्रों ने बताया कि आतंकवादियों पर यह मेहरबानी जेल सुपरिंटेंडेंट हिलाल अहमद रादर के संरक्षण में दिखाई जा रही है। हालांकि वह इन आरोपों से इनकार करते हैं। उन्होंने कहा, ‘हम जेल मेन्यू का सख्ती से पालन करते हैं। जेल में अंदर सेल फोन इस्तेमाल किए जाने का सवाल ही पैदा नहीं होता।’

हालांकि आतंकवादियों को खास सुविधाएं देने वाली श्रीनगर सेंट्रल जेल, पहली जेल नहीं है। पिछले साल अगस्त में पुलिस ने बारामुला सब-जेल से भी बीस सेलफोन बरामद किए थे। जम्मू-कश्मीर के स्वास्थ्य मंत्री बाली भगत ने बताया कि वह इस बात की जांच करवाएंगे कि श्रीनगर सेंट्रल जेल का फार्मासिस्ट वहां दस साल से कैसे काम कर रहा है और महिला डॉक्टर कैसे तीन साल से काम कर रही हैं? मंत्री ने कहा कि सेंट्रल जेल में काम कर रहे स्टाफ को वहां से शिफ्ट किया जाएगा। एक बड़े पुलिस अधिकारी ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह लग रहा है कि पूरे जेल स्टाफ की मिलीभगत से ही आतंकी नवीद जट को जेल से भगाया गया।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper