आधुनिकता चाहे जितनी बढ़ी हो पर गुरू बिन ज्ञान संभव नहीं

लखनऊ: गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय। कबीरदास ने इस दोहे के माध्यम से गुरू की पूरे महत्व का बखान किया है। इसमें ही सार समझने वाला है। बच्चे को जन्म भले ही मां-बाप देते हों, लेकिन उसको जीवन का अर्थ और इस संसार के बारे में समझाने का कार्य गुरु करता है। गुरु को ब्रह्म कहा गया है, क्योंकि जिस प्रकार से वह जीव का सर्जन करते हैं, ठीक उसी प्रकार से गुरु शिष्य का सर्जन करते हैं। आज भी गुरू शिष्य परंपरा कितनी कारगर है। यह जानते हैं गुरूओं की जुबानी-

विद्यांत हिन्दू पीजी कालेज के प्रोफेसर डा. दिलीप अग्निहोत्री कहते हैं कि गुरू परंपरा भारत की महत्वपूर्ण धरोहर है। यह अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरूओं को हमेशा श्रेष्ठ माना गया है। उनका काम श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण करना है। जिससे वह समाज में सकारात्मक भूमिका का निर्वाहन कर सके। लेकिन वर्तमान में कुछ गुरूओं ने अपनी विश्वसनीयता खो दी है, उन पर प्रश्न चिन्ह खड़े होने लगे हैं। इसी वजह से शिष्यों का विश्वास गूगल पर बढ़ रहा है।

लखनऊ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष मुकुल श्रीवास्तव ने बताया कि पहले की जगह अब गुरू और शिष्य परंपरा में आधुनिकता और तकनीक ने अपनी जगह बना ली है। लोग मिलने के बजाय फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजकर ही अपना कोरम पूरा कर लेते हैं। लेकिन आज कितना भी गूगल का दौर हो उसमें लेकिन विवि और कालेज का अपना महत्व आज भी है, हमेशा रहेगा।

लखनऊ विवि की अंग्रेजी विभाग, प्रो. निशि पांडेय ने बताया कि उनकी गुरू और उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ावा देने वाली उनकी मौसी सुशीला पांडेय है। जब उनके पास से वापस लखनऊ आ गई तब मासी हर सप्ताह चिट्ठियां भेजती थीं जिनमें ढेर सारी प्रेरणादायक बातें होती थीं। तब वो केवल पत्र थे मगर अब उनका महत्व समझ में आता है। जब भी अंधेरों में घिरती हूं तो मौसी की चिट्ठियां रोशनी दिखाती हैं।

किंग जार्ज मेडिकल कालेज के दन्त विभाग के विभाध्यक्ष डा. पूरन चन्द्र ने कहा कि गुरू और शिष्य दोनों को अपनी नैतिक जिम्मेदारी का ख्याल रखना चाहिए। समाज के प्रति जो उनकी जवाबदेही उसे स्वीकार्य करें। व्यवसायीकरण को हावी ना होने दें। यही बात समाज तक आगे बढ़ाएं। धार्मिक गुरूओं को भी इस बात का ख्याल रखें। उनका जो कार्य है उसी पर ध्यान दें।

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