इस भक्त के नौकर बन रहे भगवान शिव !

भगवान शिव अनादि है अनन्त है और सर्वव्यापी है। माना जाता है कि वे भोले भंडारी है और वे भक्तों से बहुत जल्दी प्रसन्न होते है। युॅ तो भगवान शिव के मंदिर देष के कोने कोने में है लेकिन कुछ मंदिरों के साथ कुछ रोचक कहानियॉ जुडी हुयी है। ऐसा ही एक प्रमुख मंदिर मधुबनी के भवानीपुर गांव में है जो उगना महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। इसके अलावा यह मंदिर उग्रनाथ महादेव के नाम से भी प्रसिद्ध है। यहां पर यह मान्यता है कि इस मंदिर में भगवान षिव ने अपने भक्त विद्यापति की नौकरी की थी और बाद में स्वंय यहां पर शिवलिंग के रूप में विराजमान हुये थे तभी से यह शिव मंदिर यहां पर स्थित है।

गर्भगृह जाने के लिये है छ सीढियॉ
उगना महादेव मंदिर के गर्भगृह में जाने के लिये भक्तों को छ सीढियॉ उतरकर जाना होता है। इसी तरह उज्जैन के महाकाल के दर्षन के लिये भी भक्तों को छ सीढियॉ उतरकर जाना होता है। उगना महादेव मंदिर में षिवलिंग आधार तल से 5 फीट नीचे स्थित है। यहां ये मान्यता है कि यह शिवलिंग यहां अपनेआप प्रकट हुआ है। यहां मंदिर के सामने ही एक सरोवर है। मंदिर के आसपास का दृष्य मनोरम है। माघ मास के कृष्णपक्ष में आने वाली नर्क चर्तुदषी इस मंदिर का प्रमुख त्यौहार है।

मंदिर से जुडी कथा
मंदिर के पुजारी उगना महादेव से जुडी कथा बताते है कि 1352 में जन्मे विद्यापति को भक्ति परंपरा के प्रमुख स्तंभ और मैथिली के सर्वोपरि कवि माने जाते है। साथ ही विद्यापति भगवान शिव के परम भक्त भी थे। भगवान षिव के उपर कवि विद्यापति ने अनेकों गीतों की रचना की। उनके गीतों से प्रसन्न हो भगवान शिव उनके घर वेश बदलकर आये और उनसे उनके घर नौकरी करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने अपना नाम उगना बताया। विद्यापति ने उगना अर्थात भगवान शिव को यह बताया कि उनकी आर्थिक स्थिती अभी अच्छी नहीं है इसलिये वे उन्हें नहीं रख सकते। लेकिन भगवान शिव ने उन्हें 2 समय के भोजन पर उन्हें रखने के लिये मना लिया।

एक दिन ऐसा हुआ कि विद्यापति और उगना राजा के दरबार के लिये जा रहे थे। गरमी का मौसम था और धूप बहुत तेज थी। विद्यापति को प्यास लगी लेकिन आसपास उन्हें कोई जल का स्त्रोत नहीं दिखा। तब विद्यापति ने उगना से जल का प्रबंध करने के लिये कहा। उगना कुछ ही दूर गये और अपनी जटा खोलकर उसमें गंगाजल भर लाये। विद्यापति ने जल पिया तो उन्होंने उसका स्वाद पहचान लिया कि यह तो गंगाजल है। तब उन्होनें सोचा कि इस स्थान पर गंगाजल कैसे आया। तब विद्यापति को समझते देर नहीं लगी की जो उगना उनके साथ एक नौकर के रूप में रह रहा है वह और कोई नहीं साक्षात भगवान शिव है। ऐसा कहकर वह उगना के पैरों में गिर गया। अपने भक्त को अपनी शरण में आया देख भगवान शिव ने उन्हें दर्षन दिये।

भगवान शिव ने विद्यापति से उगना के रूप में ही साथ रहने की इच्छा जतायी। विद्यापति से उन्होनें कहा कि किसी को भी मेरे वास्तविक परिचय के बारे में पता नहीं लगना चाहिये। विद्यापति ने हामी भरी और भगवान शिव अपने भक्त विद्यापति के नौकर उगना के रूप में रहने लगे। लेकिन एक दिन किसी वजह से विद्यापति की पत्नि उगना को चुल्हे की जलती लकडी से पीट रही थी तभी विद्यापति आये और बोले कि यह तुम क्या कर रही हो। यह भगवान शिव है और तुम्हें जलती लकडी से पीट रही हो। ऐसा सुनते ही भगवान शिव अर्तधान हो गये।

विद्यापति को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। लेकिन वे अपने भगवान को पागलों की भांति पुकारते हुये जंगलों में घुमने लगे। अपने भक्त की दषा देखकर भगवान शिव को दया आयी और उन्होनें विद्यापति से कहा कि मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकता लेकिन आज के बाद मैं शिवलिंग के रूप में हमेषा यहां विराजित रहुॅगा। इसके बाद वहां शिवलिंग प्रकट हो गया जो कि आज भी मधुबनी के भवानीपुर गांव में स्थित है और रोजाना भक्त भगवान शिव के दर्षन के लिये वहां आते है।

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