एकता में दरार के बीच दिल्ली में महागठबंधन की बैठक

दिल्ली ब्यूरो: सोमवार को दिल्ली में आयोजित विपक्षी एकता की बैठक पर देश की निगाह लगी हुई है। बीजेपी को अगले लोकसभा चुनाव में मात देने के लिए अधिकतर पार्टियां एक जुट होने की बात कर रही है। ऐसी पार्टियां भी जिनका कांग्रेस से भी दुराव रहा है और आज भी कई राज्यों में कई क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के विरोध में ही वोट उगाहती रही है। यह बात और है कि अपने तमाम गिले शिकवे को भुलाकर अडखितरा पार्टियां इस मंच पर जुट रही है ,फैसला क्या होगा देखना होगा। इस बैठक में यूपी की दो अहम पार्टियां सपा और बसपा आएँगी या नहीं इसका अभी तक कोई खुलासा नहीं हुआ है। बता दे कि  बैठक तेलगू देशम् पार्टी प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने बुलाई है।
इस बैठक में कांग्रेस सहित सभी प्रमुख विपक्षी पार्टियों के हिस्सा लेने की संभावना है।  खबर के मुताबिक बैठक में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप नेता संजय सिंह के भी हिस्सा लेने की उम्मीद है। इससे पहले केजरीवाल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ किसान आंदोलन के दौरान मंच साझा कर चुके हैं। इस आगामी बैठक में चंद्रबाबू नायडू के साथ एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी मौजूद रहेंगे। इस दौरान विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के साथ मतभेदों को दूर कर बीजेपी के खिलाफ एकजुट अभियान चलाने के लिए सहमति बनाने की कोशिश करेंगे। विपक्षी एकता के सवाल पर होने जा रही इस बैठक में अभी तक बसपा के शामिल होने की कोई सूचना नहीं है। इसके साथ ही विपक्ष की इस आशंका को बल मिला है कि बीजेपी विपक्ष को एकजुट होने से रोकने के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल कर रही है।  वह विपक्षी दलों को सीबीआई जैसी संस्थाओं का डर दिखाकर विपक्षी एकता को तोड़ने की कोशिश कर सकती है। राहुल गांधी समेत सभी प्रमुख विपक्षी दलों के नेता अभी तक प्रधानमंत्री पद के लिए किसी संयुक्त उम्मीदवार के नाम पर सहमति नहीं बना सके हैं।
कहा जा रहा है कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और बीएसपी सुप्रीमो मायावती भी इस बैठक से कन्नी काट रही हैं। उत्तर प्रदेश में इन दोनों दलों का दबदबा रहा है।  कहा जाता है कि दिल्ली में सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। साल 2014 में भी उत्तर प्रदेश में धमाकेदार जीत के बाद ही केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी थी। ऐसे में महागठबंधन में अखिलेश यादव और मायावती बड़ी भूमिका चाहते हैं, लेकिन बाकी दलों ने इन दोनों को बड़ी भूमिका देने को लेकर अभी तक कोई सहमति नहीं बनाई है। इन दोनों के लिए समस्या की असल जड़ कांग्रेस भी है। अखिलेश यादव और मायावती ने यह साफ कर दिया है कि वह कांग्रेस को ‘बड़े भाई’ की भूमिका में नहीं देखते हैं। इसकी झलक हमें मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में देखने को मिल चुकी है। इन दोनों की पार्टी ने यहां कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं किया। ऐसे में कांग्रेस के लिए नेतृत्व पर दावेदारी ठोंकना आसान नहीं होगा।
बता दें कि  साल 2004 में हालात थोड़े अलग थे। तब कांग्रेस उतनी कमज़ोर नहीं थी। कुछ राज्यों में कांग्रेस की सरकार भी थी। खासकर उस वक्त न तो क्षेत्रीय दल इतने मजबूत थे और न ही वो राष्ट्रीय राजनीति में आने को इतने इच्छुक थे। ऐसे में कांग्रेस जीतनी कमज़ोर होगी, क्षेत्रीय दलों की ताकत उतनी ही ज़्यादा बढ़ेगी।
उधर  कांग्रेस के ‘बड़े भाई’ को तमगा दिए जाने से ममता बनर्जी भी खुश नहीं है। पिछले महीने ममता इस बात से नाराज हो गई थीं कि बिना उनसे बातचीत किए चंद्रबाबू नायडू और अशोक गहलोत ने महागठबंधन की बैठक बुला ली थी। इसके बाद जब नायडू ने कोलकाता में ममता से मुलाकात की तो महागठबंधन की बैठक को टाल दिया गया।
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