एनडीए की एकता बनाये रखने के लिए कोई भी त्याग कर सकती है बीजेपी!

दिल्ली ब्यूरो: विपक्ष के पैतरे को देखते हुए बीजेपी ने भी मन बना लिया है कि एनडीए की एकता बनाये रखने के लिए वह किसी भी तरह का त्याग कर सकती है। बीजेपी सहयोगी पार्टियों के लिए अधिक से अधिक सीट छोड़ने को तैयार है। उधर तमाम अटकलों और हाल की खबरों के बावजूद भाजपा का कोई सहयोगी उसका साथ नहीं छोड़ रहा है। न नीतीश कुमार गठबंधन से अलग होने जा रहे हैं और उद्धव ठाकरे, न ओमप्रकाश राजभर एनडीए छोड़ने वाले हैं और न सुदेश महतो। अपनी सीटें बढ़वाने या कुछ और हासिल करने के लिए ये नेता मोलभाव कर रहे हैं पर अंततः इनको भाजपा के साथ ही लड़ना है।

भाजपा के सहयोगियों में शिवसेना और जेडीयू को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है। ये दोनों सबसे बड़े सहयोगी भी हैं। जानकार सूत्रों का कहना है कि नीतीश कुमार की पार्टी भाजपा के साथ ही चुनाव लड़ेगी। सीटों के बंटवारे को लेकर जल्दी ही नया फार्मूला बन जाएगा। बिहार में नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और उपेंद्र कुशवाहा को साथ रखने के लिए भाजपा अपनी सीटें छोड़ने को तैयार है। जदयू के एक वरिष्ठ नेता ने नए फार्मूले की चर्चा करते हुए माना कि बार बार गठबंधन बदलने से इमेज खराब होगी। इसलिए पार्टी एनडीए में ही रहेगी। नए फार्मूले के तहत भाजपा और जदयू 15-15 सीटों पर लड़ सकते हैं। इसमें एकाध सीट ऊपर नीचे संभव है। पांच या छह सीट पासवान की पार्टी को और दो सीटें कुशवाहा की पार्टी को मिलेंगी। अगर जहानाबाद के सांसद अरुण कुमार और मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव भी एनडीए से जुड़ते हैं तो एक-एक सीट उनके लिए छोड़ी जाएगी।

इसी तरह शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की मुलाकात के बाद माना जा रहा है कि दोनों के बीच बर्फ पिघली है। हालांकि शिवसेना का हमला कुछ दिन और जारी रहेगा पर जिस तरह राष्ट्रपति के चुनाव में उसने अंततः भाजपा का साथ दिया वैसे ही अंत में वह भाजपा के साथ ही लड़ेगी। इसका कारण यह है कि लोकसभा में उसके अकेले लड़ने का सबसे बड़ा नुकसान उसे ही होगा।

भाजपा की सबसे पुरानी सहयोगियों में से एक अकाली दल ने अगले साल के चुनाव को युद्ध बताते हुए भाजपा के साथ लड़ने का ऐलान कर दिया है। झारखंड में भाजपा की सहयोगी आजसू को सिल्ली और गोमिया दोनों सीटों पर उपचुनाव हारने के बाद अहसास हो गया है कि विपक्षी एकता के बीच उसका सबसे अच्छा मौका तभी है, जब वह भाजपा के साथ मिल कर लड़े। असल में मीडिया और सोशल मीडिया के प्रचार से यह धारणा बनी है कि नरेंद्र मोदी की अखिल भारतीय लोकप्रियता है और उनकी फिर वापसी हो सकती है। इसलिए कोई भी सहयोगी अलग होने के बारे में नहीं सोच रहा है।

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