ओबामा की कसौटी: राहुल के सवाल व ‘ट्रोल-सेना’ की हुर्रेबाजी

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी बेस्ट सेलर बुक ’द ऑडेसिटी ऑफ होप’ में राजनीति का कटु सत्य उजागर करते हुए लिखा है कि- ’इन दिनों पुरस्कार उसे नहीं मिलता, जो सही है, बल्कि उसे मिलता है, जो व्हाइट हाउस के प्रेस कार्यालय की तरह अपने तर्क ज्यादा बुलंद आवाज में ज्यादा बार सामने रख सकता है। राजनीतिज्ञ भले ही व्यक्तिगत ईमानदारी के चलते सत्य कहने की जिद करें, पर सच यह है कि अब इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या सोचते हैं…महत्व इस बात का है कि मीडिया मे आपकी छबि कैसी है’?

किताब का हिन्दी अनुवाद ’आशा का सवेरा’ नाम से छपा है। ओबामा की यह थीसिस भारत के राजनीतिक फलक पर प्रोपेगंडा की ताकत के आगे सच की बेचारगी को बखूबी चिह्नित करती है। इस सप्ताह राहुल गांधी ने ट्वीट के जरिए देश के कुछ मुद्दों पर सच्चाइयों को खंगालने की कोशिश की है। मोदी सरकार के खिलाफ किसी भी सच को बुझाने के लिए उनकी ट्रोल सेना की रणनीतिक हुर्रेबाजी इतनी जबरदस्त होती है कि सच की इबारत हाशिए पर खिसक कर खामोशियों में गुम हो जाती है। यहां ओबामा का यह कथन सच लगने लगता है कि ’महत्व सच कहने की जिद अथवा आपके सोच का नहीं हैं, बल्कि इस बात है कि मीडिया में आपकी छवि कैसी है ?’ सार्वजनिक जीवन के इस मुकाम पर राहुल गांधी कमजोर हैं। वो अभी तक गोदी मीडिया और सोशल मीडिया के उस चक्रव्यूह को नहीं तोड़ पाएं हैं, जो उन्हें अपरिपक्व अथवा सीधे-सीधे पप्पू बनाने के लिए रचा गया है।

सत्य की महत्ता पर घंटों प्रवचन दिए जा सकते हैं, लेकिन खुद सत्य बोलना आसान नहीं है…। राजनीति में वैसे भी सत्य की डगर ज्यादा कठिन है। इसीलिए ओबामा कहते हैं-’’ राजनीतिज्ञ झूठ के खतरे बखूबी समझता है, लेकिन वह यह जानता कि सच बोलने का भी कोई फायदा नहीं, खासकर जब सच जटिल हो। सत्य से सभी परेशान होंगे और सत्य पर आक्रमण किया जाएगा। मीडिया के पास भी तथ्यों की पड़ताल का समय नही हैं, इसलिए हो सकता है कि आम जनता को सच और झूठ में अंतर ही पता न चले। इसलिए राजनीतिज्ञों का प्रयास होता है कि वो ऐसे बयान नहीं दें, जो बेवजह विवाद पैदा करें’’।

राहुल ओबामा के अनुभवों के ठीक उलट काम कर रहे हैं। वो मोदी सरकार के लिए मुश्किल सवालों को उठाने से बाज नहीं आ रहे हैं। इऩ निरुत्तर सवालों को सरकार छिपाना चाहती है। ज्यादातर विपक्षी नेता सरकार व्दारा ’फेब्रीकेटेड तथ्यों’ के बारे में सच की इस तफ्तीश पर खामोश हैं। सच की पड़ताल को केन्द्र ने राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में खड़ा कर दिया है। राष्ट्रद्रोह के खतरों के बावजूद राहुल यह काम कर रहे हैं, जबकि इन सवालों पर बाकी नेता राष्ट्रीय आपदा और राष्ट्रहित की पतली गलियों से बच निकल जाते हैं। यहां सवाल यह है कि राष्ट्रीय आपदा के नाम पर सत्तारूढ़ दल और उसकी सरकार को सवालों में कितनी रियायत मिलना चाहिए? इस प्रसंग का गौरतलब पहलू यह भी है कि कांग्रेस में ही राहुल की रणनीति के समर्थक ज्यादा नहीं हैं। राहुल खुद इस पर असंतोष भी प्रकट कर चुके हैं।

सवालों की ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्ता कमतर नहीं हैं। सवाल हर हाल में पूछे जाने चाहिए। राहत की बात है कि सोशल मीडिया पर प्रायोजित ट्रोल होने के बावजूद राहुल सवालों से पीछे नहीं हट रहे हैं। सवालों के जरिए राहुल ने अपने ट्वीट में इल्जाम लगाया है कि मुद्दा चाहे चीन से जुड़ा हो अथवा कोरोना और जीडीपी से, मोदी सरकार ने झूठ को संस्थागत बना दिया है। राष्ट्रीय महत्व के सभी मामलों में सरकार झूठ बोल रही है। टेस्ट संख्या कम करके कोविड-19 से होने वाली मौतों को सरकार ने छिपाया है। जीडीपी की गणना में हेराफेरी के लिए एक नया तरीका अपना कर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। मीडिया को डरा-धमका कर चीनी घुसपैठ को कमतर दिखाने की कोशिशों की कीमत भारत को चुकानी पड़ेगी।

केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर राहुल की उपलब्धियों पर सवाल उठाकर उनके सवालों के ’तथाकथित जवाब’ दे चुके हैं, लेकिन सत्य को गढ़ने के ये तरीके शंकाओं से परे नहीं है। राजनीति में तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने का एक हुनर होता है। जो इसमें माहिर है, बाजी उसी के हाथ रहती है। यहां झूठ-सच बेमानी होता है।

दुनिया भर के लोकतंत्र इन दिनों एक अजीबोगरीब त्रासदी से गुजर रहे हैं। ’सत्याग्रह’ के एक लेख के अनुसार अमेरिका के ब्रिस्टल विश्‍व विद्यालय के प्रोफेसर स्टीफन लेवंडोस्की ने एक शोध में लिखा है कि ’परिपक्व लोकतंत्र वाले समाजों में भी लोग सच-झूठ के पैमानों की आश्‍चर्यजनक अनदेखी कर रहे हैं’। 2016 में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में जनता के सामने दो विकल्प थे। एक ऐसा था, जिसने कैंपेन के दौरान 75 फीसदी सही बयान दिए थे। फैक्टचेक एजेंसी के मुताबिक दूसरे उम्मीदवार के 70 प्रतिशत दावे गलत थे। अमेरिका ने डोनाल्ड ट्रम्प को चुना, जो राष्ट्रपति बनने के बाद अब तक 1300 से ज्यादा झूठ बोल चुके हैं। फिर भी उनके समर्थक कम नहीं हुए हैं। यह कैसे मुमकिन है? लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास में समाज से झूठ बोलने वाले नेता लोगों की पहली पसंद कैसे बन सकते हैं? हिन्दुस्तान में होने वाली सच की फजीहत के इस दौर में क्या भारत भी इसी दिशा मे अग्रसर हो चला है…?

उमेश त्रिवेदी/सुबह सबेरे से साभार

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