कहानी: क्रिसमस की शाम

बड़े दिन की छुट्टियां हो चुकी थीं। मोनू बेहद खुश नजर आ रहा था। अब वह इत्मिनान के साथ कुछ वक्त अपने मम्मी-पापा के साथ घर पर गुजारेगा।
हॉस्टल से घर आने के बाद मोनू मम्मी-पापा, सोनू भैया और सोनिया दीदी से काफी देर तक गपशप करता रहा। नाश्ते के बाद वह आराम से लेट गया। थकावट तो थी ही। लेटते ही नींद ने कब अपने आगोश में ले लिया था, उसे पता ही नहीं चला।
अगले दिन जब दादी का फोन आया, तो दादी ने उसे बड़े प्यार से अपने पास बुलाया। मोनू भी दादी के पास जाने को झट से तैयार हो गया। पापा ने पटना के लिए मोनू की एक सीट बुक करा दी। मोनू अगले ही दिन पटना पहुंच गया, दादी के पास। मोनू को अपने पास पाकर दादी काफी खुश हुईं। मोनू को भी बहुत मजा आ रहा था, दादी के साथ। दादी भी मोनू के पसंदीदा व्यंजन बनाकर खिलाती थी। छोटे अंकल अनिल, छोटी आंटी प्रतिमा, उनकी बेटी प्रिंसी भी मोनू को अपने पास पाकर काफी खुश थे। खासकर प्रिंसी को बहुत अच्छा लग रहा था। वह तो मोनू को एक पल के लिए भी नहीं छोड़ती थी। दरअसल, इतने बड़े घर में तो कोई रहता भी नहीं था। छोटे अंकल और छोटी आंटी प्रतिदिन अपने-अपने दफ्तर चले जाते थे। प्रिंसी स्कूल चली जाती थी। लेकिन स्कूल से लौटने के बाद उसके साथ खेलने वाला कोई होता नहीं था। सिर्फ दादी ही उसके साथ रहती थी। इसी बीच अनु की भी छुट्टी हो गई थी। अनु प्रिंसी से बड़ी थी। भुवनेश्वर में रह कर वह पढ़ाई कर रही थी। वह भी अपनी सहपाठिनों के साथ पटना लौटी थी। अब तो सूना-सूना रहने वाला घर काफी भरा-पूरा लगने लगा था।
‘इस बार क्रिसमस में तो सचमुच बड़ा मजा आएगा। लेकिन दादी, यह बदमाश तो सारा का सारा केक और पेस्ट्री खुद खा जाता है। हम सब को तो मिठाइयां छूने भी नहीं देगा।’ अनु ने मोनू को चिढ़ाते हुए कहा।
‘देखो न, मैं कितना दुबला हो गया हूं। खाऊंगा नहीं, तो काम कैसे चलेगा।’ मोनू ने नहले पे दहला जड़ते हुए कहा।
अब तो इस बार के क्रिसमस को यादगार बनाने की सारी तैयारियां काफी जोरशोर से होने लगीं। मोनू के साथ-साथ अनु और प्रिंसी के सभी दोस्तों को भी आमंत्रित किया गया। पूरे घर को तरह-तरह के फूलों के गमलों से सजाया गया था। चारों तरफ रंगबिरंगे फूल ही फूल दिखाई पड़ रहे थे। कहीं अलग-अलग रंग के गुलदाउदी, तो कहीं डलिया, बोगेनवेलिया, गेंदा, गुलाब हर रंग के बड़े ही खूबसूरत अंदाज में रखे गए थे। बड़े ही आकर्षक ढंग से कुछ बोंसाई भी लगाए गए थे। आरकेरिया और एरिका पाम भी नजर आ रहे थे। ऊपर से रंगबिरंगी रोशनी तो गजब ढा रही थी। पूरा घर तरह-तरह के फूलों की खुशबू से महक उठा था। सचमुच आज तो क्रिसमस का मजा ही आ जाएगा।
उस दिन मोनू दादी के साथ ऊपर वाले कमरे में गया था। वह देख रहा था कि उस कमरे में बहुत सारे म्यूजिकल इंस्ट्रूमेंट्स बेहद हिफाजत के साथ रखे थे। ड्रम सेट, तबला, हारमोनियम, ढोलक, बांसुरी, खंजरी, बैंजो, कांगो, बांगो, गिटार, सिंथेसाइजर, पियानो एकार्डियन और पता नहीं क्या-क्या।
‘दादी, यह सब यहां पर क्यों पड़ा हुआ है? यह सब है किस का?’ मोनू ने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा। ‘यह सब तो मैंने पहले कभी देखा नहीं था।’
‘तुम यहां रहते ही कहां हो, जो देख पाओगे। ये सारे वाद्ययंत्र तुम्हारे जन्म से बहुत पहले के हैं।’
‘लेकिन यह है किस का? इन्हें बजाता कौन था?’
‘यह सब तुम्हारे पापा का है और किस का।’
‘पापा का है!’
‘हां, तुम्हारे पापा का ही है। तुम्हारे पापा अपने कॉलेज के जमाने से ही पियानो एकार्डियन बजाते थे।’
‘पापा और पियानो एकार्डियन! यह मैं क्या सुन रहा हूं? मैंने तो उन्हें कभी पियानो एकार्डियन बजाते नहीं देखा है।’
‘बिल्कुल सही सुन रहे हो। तुम्हारे दोनों छोटे चाचा तो इन सब के अलावा कांगो, बांगो भी बजाया करते थे। तीनों भाई गाते भी थे। तीनों अपने-अपने क्लास में गाने के लिए मशहूर रहे हैं। इन तीनों ने मिल कर अपना एक आरकेस्ट्रा भी बनाया था। उसमें बहुत सारे कलाकार आया करते थे और यहीं पर खूब रियाज करते थे। आज तुम जो गीत सुन कर झूम उठते हो न, उन्हीं गीतों को ये सब बड़ी खूबसूरती के साथ परफॉर्म करते थे। पुलिस सॢवस में जाने से पहले तुम्हारे पापा एफएम रेडियो में एनाउंसर भी रह चुके हैं।’
‘यह मैं क्या सुन रहा हूं मोनू। तुम्हारे पापा और गीत-संगीत। कोई पुलिस ऑफिसर गीत-संगीत का इतना बड़ा शौकीन हो, यह तो मैं आज तक जानता ही नहीं था।’ मोनू के मित्र सुमीत ने कहा।
‘वीरेन अंकल तो एक बैंक मैनेजर हैं, वह भी संगीत प्रेमी हैं और अनिल अंकल एकाउंट्स की फाइलें ही नहीं चेक करते, बल्कि उम्दा किस्म के गायक और वादक भी हैं। अब तो इस बार क्रिसमस पर उन्हें गाना ही होगा।’ मोनू ने कहा।
मोनू ने सारे वाद्य यंत्रों को झाड़-पोंछ कर साफ-सुथरा किया। मोनू, अनु, सुमित और प्रिंसी ने मिल-जुलकर सारे वाद्य यंत्रों को क्रिसमस के दिन बड़े ही करीने से सजा दिया। दादी हैरान हो रही थी कि ये सब मिल कर क्या कर रहे हैं। परेशान होकर बोली, ‘अगर इन साजों को कुछ भी हुआ तो बहुत मार पड़ेगी।’
‘दादी, हमारे पास जब इतने बेहतरीन वाद्य यंत्र मौजूद हैं, तो फिर क्यों न इन का इस्तेमाल क्रिसमस के वक्त किया जाए। एक अलग ही समां बंध जाएगा।’ मोनू ने उत्साहित होते हुए कहा।
‘ठीक है। लेकिन जरा संभाल कर रखना इन सब को। तुम्हारे पापा की जान बसती है इनमें।’
दादी ने शीतलछाया से ढेर सारी मिठाइयां और नमकीन मंगवाई। खूब सारे गुब्बारे लगाए गए, मिनी बल्ब और खूब लाइट अरेंज की गईं। साउंड सिस्टम भी लगाया गया। खूब डांस हुआ। सभी लोग एक-दूसरे को बड़े दिन की ढेर सारी बधाइयां देने लगे। दादी तो इतनी खुश थी कि वह भूल ही गईं कि सोनू, सोनिया और पापा-मम्मी को मोनू के बगैर काफी अजीब सा लग रहा होगा।
‘इतने अरसे बाद मैं दादीजी, छोटे अंकल, छोटी आंटी, अनु और प्रिंसी के साथ क्रिसमस मना रहा हूं। यह क्रिसमस तो मुझे हमेशा याद रहेगा।’ मोनू ने कहा।
दादीजी ने गाजर का हलवा खुद बनाया था। खीर भी बनी थी। मोनू को ढोकला बहुत पसंद था। इसीलिए दादीजी ने उसके लिए ढोकला भी बनाया था। कोल्ड ड्रिंक्स मंगवा लिए गए थे। आइसक्रीम भी थी। सचमुच मजा आ गया, क्रिसमस का। छोटे अंकल पूरी क्रिसमस पार्टी को शूट करते जा रहे थे।
क्रिसमस पार्टी चल ही रही थी कि पोॢटको में दो कारें आकर लगीं। मोनू के पापा-मम्मी, सोनू भैया और सोनिया दीदी भी आ पहुंचे थे। वीरेन अंकल भी ज्योति दीदी, विक्की और गीता आंटी के साथ आ गए।
दादी ने जब अपने पूरे परिवार को एक साथ इकट्ठे देखा, तो उनकी खुशियों की सीमा न रही। बोली, ‘तुम सभी लोगों के आ जाने से क्रिसमस की रौनक तो और बढ़ गई है।’
पापा अपने सारे वाद्य यंत्रों को इतने कलात्मक ढंग से रखा हुआ देख कर तो बिल्कुल अभिभूत हो गए थे। वे अतीत के यादों की गहराइयों में गोते लगाते हुए नजर आ रहे थे। पापा अपने आप को चाह कर भी रोक नहीं सके। बरबस ही पियानो एकार्डियन लेकर बजाने लग गए, कम्प्यूटर पर फर्राटे के साथ दौडऩे वाली उन की उंगलियां अब पियानो एकार्डियन पर गजब का जादू चला रही थीं। उधर, वीरेन अंकल ड्रम सेट पर और अनिल अंकल कांगो पर अपना जलवा बिखेर रहे थे। शुरू हो गया गाने-बजाने का नहीं थमने वाला दौर। एक जमाने के बाद भी इन तीनों भाइयों ने एक से बढ़कर एक गाने की धुन बजाई। मोनू को तो अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था।
‘यह पियानो एकार्डियन आपने कब खरीदी थी पापा?’ मोनू ने हसरत भरी निगाहों से देखते हुए पूछा।
पापा बीते हुए दिनों को याद करते हुए बोले, ‘यह पियानो एकार्डियन एक जर्मन व्यक्ति का था। उसका प्रोजेक्ट जब खत्म हो गया, तो वह जर्मनी लौटने से पहले अपने सारे सामान औने-पौने दामों में बेच रहा था। किसी ने सोफा सेट खरीदा, किसी ने डायनिंग टेबल, किसी ने बेड खरीद लिया, तो किसी ने अलमारी। उनके पीए की नजर इस पियानो एकार्डियन पर पड़ी थी। उसने अपने बेटे के लिए इसे मांग लिया। जर्मन लोगों की तो जान बसती है, संगीत में। उसने कहा था कि ठीक है जिस दिन मैं यहां से जाने लगूंगा उसी दिन इसे ले जाना। पीए मान गया था। बाद में उस जर्मन ने इस पियानो एकार्डियन को भरे मन से अपने पीए को दे दिया था। पीए के लड़के को संगीत की समझ तो थी नहीं। कुछ दिन तक उस ने इस से खेला, फिर इसे उपेक्षित छोड़ दिया था। बाद में पीए ने इसे बेचने का मन बना लिया था। इसकी जानकारी जब मुझे मिली, तो मैंने इसे खरीदने का सोचा। मगर उस वक्त इसकी कीमत लगाई गई थी 7000 रुपए। उस समय मेरी उम्र लगभग 19 वर्ष की रही होगी। जैसे-तैसे मैंने इसे खरीद लिया था। लेकिन उस पीए के लड़के ने इसका एक रीड बेसुरा कर दिया था। इसे कोलकाता ले जाकर बनवाना पड़ा था। इसका रीड जर्मनी से मंगवाना पड़ा था। लगभग 10 हजार रुपए का खर्च आया था उस वक्त। आज इसकी कीमत लाखों में होगी, लेकिन यह मेरे लिए अत्यंत अनमोल है।’
वह जिद करने लगा, ‘पापा, मुझे भी म्यूजिक सीखना है।’ लौटते समय मोनू स्पैनिश गिटार अपने साथ लेते गया।’ पापा उसे गिटार बजाना सिखा रहे थे। मोनू के लिए सचमुच यह एक यादगार खुशनुमा क्रिसमस बन गया था।

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