कहानी: गौरैया

जेठ की दोपहरी थी। लू के थपेड़े, घने पेड़ों के बावजूद, बदन पर आग की लपटों की तरह लपलपा रहे थे। इस खौफनाक मौसम में बस एक ही राहत थी, गौरैया की मधुर आवाज। दोपहर के इस घनघोर सन्नाटे में उसकी आवाज पेड़-पौधों के ऊपर तितली की तरह थिरक रही थी। इस आवाज के सम्मोहन में ही मैं बाहर बगिया में निकल आया था और पेड़ के नीचे पड़ी खटिया पर पसर गया था। गौरैया चुप हो जाती, तो लगता पूरी कायनात धू-धू जल रही है। गौरैया बोलती, तो लगता अभी प्रलय बहुत दूर है।

लगातार एक जिज्ञासा हो रही थी कि क्या कह रही है यह गौरैया? मैं उसकी आवाज को लिपिबद्ध भी करना चाहता था, मगर वर्णमाला में उपयुक्त वर्ण नहीं मिल रहे थे। काफी देर तक इस उधेड़बुन में लगा रहा, जब कोई नतीजा नहीं निकला, तो मैंने यह कोशिश छोड़ दी और एक सीधा-सादा सरली करण स्वीकार कर लिया कि गौरैया ‘हर हर महादेव’ कह रही है, गायत्री मंत्र का पाठ कर रही है! नहीं, यह सरासर बकवास है! यह तुम्हारे भीतर का हिंदू बोल रहा है। दरअसल गौरैया कह रही है- अल्लाह-ओ-अकबर। अल्लाह-अल्लाह की रट लगाए हुए है गौरैया। नहीं, चिडिय़ा कह रही है- वाह गुरुजी का खालसा, वाह गुरुजी की फतेह। खालिस्तान की मांग कर रही हैं यह गौरैया। ये सब गुमराह करने वाली बातें हैं।

वास्तव में वह अपने प्रेमी को पुकार रही है। थक गई है, उसे बूटे-बूटे और पत्ते पत्ते पर खोज कर। कहीं भूखी तो नहीं है यह गौरैया? कहीं आरक्षण के प्रश्न पर अनशन पर तो नहीं बैठ गई? जानना जरूरी है कि कहीं आत्महत्या का निश्चय तो नहीं कर बैठी? थोड़ी देर तक गौरैया की आवाज सुनाई नहीं दी। अचानक मेरी नजर खपरैल पर गई, तो मैंने देखा कि गौरैया खपरैल के नीचे बल्ली पर बैठी है। न जाने कब से वह एक नन्हा-सा घोंसला बनाने में व्यस्त थी। यह घोंसला नहीं, राममंदिर के निर्माण में संलग्न है। अचानक मस्जिद से अजान के स्वर उठे, तो मेरा ध्यान भंग हुआ। मैं भी जूनून में क्या-क्या सोचता चला जा रहा था। मुझे याद आया, इस इमारत के ठीक पीछे मस्जिद है और सामने पीपल के पेड़ के नीचे हनुमानजी का मंदिर। इस समय जहां मैं बैठा था, वहां से सामने देखने पर मंदिर का कलश और पीछे देखने पर मस्जिद का गुंबद दिखाई देता है। गौरैया ने भी बहुत समझदारी का परिचय देते हुए ठीक मंदिर और मस्जिद के बीच अपने नीड़ के लिए स्थान चुना था। शायद गौरैया धर्म के पचड़े में नहीं पडऩा चाहती थी।

अगले दिन सुबह देखा, उसका घोंसला तैयार था। अब वह बाकायदा इस घर की सदस्या हो गई थी। अब उसका पता भी वही था, जो मेरा पता था। वह बेखटके अपने प्रेमी से पत्राचार कर सकती थी। अपना राशनकार्ड बनवा सकती थी। अपना वोट बनवा सकती थी अथवा पहचान पत्र। कुछ ही दिनों में मेरी उससे अच्छी-खासी दोस्ती हो गई। एक दिन तो रोशनदान पर आ बैठी और मुझे जवाब-तलब कर लिया, आज बाहर क्यों नहीं आए।

‘अच्छा बाबा आता हूं, तुम राग शुरू करो। मैं आता हूं।’ मैंने कहा। अपनी एक सप्ताह की मित्रता में ही उसने मुझे राग-भैरवी से ले कर राग जै जैवंती तक सुना डाले। मैंने महसूस किया, इसकी आवारागर्दी कुछ कम हो गई है। हमेशा अपने नीड़ में नजर आती। एक दिन सुबह तो मैं खुशी से पागल हो गया, जब मैंने देखा, उसके अगल-बगल दो नन्हीं गौरैया और बैठी थीं। घर में उत्सव हो गया। गौरैया के बच्चे पूरे परिवार के सदस्यों के संरक्षण में पलने लगे। एक दिन पता चला, गौरैया सुबह से गायब है और बच्चे अकेले पड़े हैं। दोपहर को बाहर गया, तो देखा गौरैया अभी तक नहीं लौटी थी।

दोनों बच्चे टुकुर-टुकुर मेरी ओर निहार रहे थे, जैसे मां की शिकायत कर रहे हों। मैं उनकी मदद करना चाहता था, मगर समझ नहीं पा रहा था कि इन्हें किस चीज की जरूरत है। शाम हो गई, गौरैया नहीं लौटी। मैं चिंतित हो उठा, क्या होगा इन बच्चों का? मैंने रात को भी कई बार टॉर्च जला कर देखा, दोनों बच्चे चुपचाप अकेले बैठे थे। कल तक जिस गौरैया पर मुझे लाड़ आ रहा था, आज मैं उससे बेहद नाराज था। मेरी कल्पना में भी नहीं था कि वह अपने नन्हें-मुन्नों के प्रति इस कदर निर्दयता और क्रूरता दिखाएगी। ढांढ़स बंधाने के लिए मैंने बच्चों को पुकारा। अंधेरे में पुचकार सुन कर बच्चों ने पंख फडफ़ड़ाए। मैंने घोंसले में लाई चने के कुछ दाने फेंक दिए और आ कर खिन्न मन से लेट गया।

‘अब सो जाओ चुपचाप। एक चिडिय़ा के पीछे पागल हो रहे हो।’ पत्नी ने कहा, ‘हो सकता है, वह बीच में किसी समय बच्चों को खिला-पिला गई हो।’ ‘नहीं, वह आई ही नहीं। बच्चे भूख से निढाल पड़े हैं।’ मैंने पत्नी को बताया, ‘घोंसले में लाई-चने डाल आया हूं। शायद चुग लें।’ ‘जाओ, बोतल से दूध भी पिला आओ।’ पत्नी ने व्यंग्य से कहा और करवट बदल ली। सुबह जब नींद खुली, तो मैं घोंसले की तरफ लपका। यह देख कर संतोष हुआ कि गौरैया दोनों बच्चों के बीच एक गर्वीली और समझदार मां की तरह बैठी थी और बारी-बारी से दोनों बच्चों को कुछ खिला रही थी। मैं भी कुर्सी डाल कर बैठ गया। शाम को जब बाहर निकला तो पाया, घोंसले से न केवल गौरैया गायब थी, बल्कि एक बच्चा भी लापता था। सहमी हुई छोटी गौरैया अकेली बैठी थी। मुझे आशंका हुई, कोई चील तो बच्चे को नहीं उठा ले गई? मगर यह संभव नहीं लग रहा था। हालांकि मुझे ज्यादा देर परेशान नहीं रहना पड़ा। छोटी गौरैया रबर प्लांट के नीचे बैठी थी। मैं उसकी ओर बढ़ा तो वह उड़ कर मुंडेर पर जा बैठी। वहां से उड़ान भर कर अनार के पेड़ पर उतर आई। वह रह-रह कर छोटी-छोटी उड़ाने भर रही थी। फिर वह चिडिय़ों के झुंड में शामिल हो गई।
‘तुम भी कुछ चुग लो। तुम्हें क्या चुगना नहीं आता?’ मैंने कहा, ‘खुद खाओ और अपनी बहन को भी खिलाओ।’

गौरैया ने मेरी बात की ओर ध्यान नहीं दिया और जा कर घोंसले में स्थापित हो गई। अब दोनों गौरैया सट कर बैठी थीं। बड़ी गौरैया जैसे किसी मूक भाषा में अपनी प्रथम उड़ान का अनुभव बयान कर रही थी। अब वह भला घोंसले में क्यों बैठती, थोड़ी ही देर में वह वहां से फिर गायब हो गई। देर रात तक दोनों गायब रहीं। मैं कुछ ऐसे परेशान हो रहा था, जैसे पत्नी और बेटी घर से गायब हों। गौरैया की आवारागर्दी का तो मुझे एक रोज पहले ही आभास हो चुका था, उस नन्हीं गौरैया के व्यवहार से मैं बहुत क्षुब्ध था।

सुबह तक फिसड्डी गौरैया के भी पंख निकल आए थे। वह अपने अकेलेपन से एकदम अनभिज्ञ थी, बल्कि लग रहा था अकेलेपन से प्रसन्न है। वह बार-बार घोंसले से उतरती और रबर के चौड़े पत्ते पर बैठने की कोशिश करती, मगर ज्यों-ही पत्ते पर बैठती, पत्ता झुक जाता और वह फिसल जाती। हर बार वह गिरते-गिरते रह जाती। कुछ देर घोंसले में विश्राम करती और दोबारा इसी खेल में लग जाती। ‘लगता है इसके भी पर निकल आये हैं।’ मैंने कहा।

शाम को हस्बेमामूल जब मैं निकला तो देखा, घोंसला खाली पड़ा था। मैंने तमाम पेड़-पौधों पर नजर दौड़ाई, गौरैया परिवार का नामोनिशान नहीं था। मुझे ज्यादा आघात नहीं लगा, क्योंकि मैं मानसिक रूप से अपने को तैयार कर चुका था कि यह अंतिम गौरैया भी मुझे धता बता कर गायब होने वाली है। मैंने राहत की सांस ली और फूलों पर मंडराती तितलियों का नृत्य देखने लगा। बीच-बीच में मैं गमलों के बीच भी निगाह दौड़ा लेता कि कहीं कोई गौरैया मुझसे लुकाछिपी न खेल रही हो। थोड़ी देर बाद मेरी दृष्टि मंदिर के कलश पर पड़ी, तो मैं देखता रह गया। गौरैया का पूरा परिवार वहां बैठा था- निद्र्वंद्व! निश्चिंत! प्रसन्न।

पत्नी पास से गुजरी तो मैंने उसे रोक लिया, ‘वह देखो, छोटा परिवार सुखी परिवार। तीनों आजाद पंछी की तरह इत्मीनान से मंदिर के कलश पर बैठी हैं।’
‘जानती हो, मंदिर के कलश पर क्यों बैठी हैं?’
‘क्यों बैठी हैं?’
‘क्योंकि इन्होंने एक हिंदू के घर जन्म लिया है। कुछ संस्कार जन्मजात होते हैं। यह अकारण नहीं है कि विश्राम के लिए इन्होंने मंदिर को चुना है।’
‘फितूर भर गया है तुम्हारे दिमाग में।’ पत्नी बिफर गई, ‘अभी थोड़ी देर पहले मैंने देखा था, तीनों मस्जिद के गुंबद पर बैठी थीं। अजान के स्वर उठे तो मंदिर पर जा बैठीं। लाउड-स्पीकर का कमाल है यह।’
मैं निरुत्तर हो गया। मंदिर में आरती शुरू हुई, तो तीनों अलग-अलग दिशा में उड़ गईं। थोड़ी देर बाद तीनों बगिया में उतर आईं। उस दिन से आज दिन तक उन्होंने घोंसले की तरफ मुड़ कर भी न देखा था।
बहरहाल, गौरैया मुझे भूली नहीं। दिन में एक-दो बार बगिया में दिखाई दे जातीं, कभी एक और कभी तीनों। मैं अक्सर सोचता हूं, क्या जन्मभूमि का आकर्षण खींच लाता है इन्हें यहां? जन्मभूमि नाम से ही मुझे दहशत होने लगी। मगर मुझे विश्वास है, यहां फसाद की कोई आशंका नहीं हैं, क्योंकि यहां एक चिडिय़ा ने जन्म लिया था, भगवान ने नहीं।

– रवींद्र कालिया

पंजाब के जालंधर में 11 नवम्बर 1938 को जन्मे रवींद्र कालिया ने कई कहानियां, उपन्यास, संस्मरण और व्यंग्य लिखे हैं। उन्हें कई बार राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया जा चुका है। 9 जनवरी 2016 में दिल्ली में उनका निधन हो गया था।

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- -----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper