कांग्रेस की ताकत बनीं प्रियंका क्या भेद पाएंगी भाजपा के गढ़ 

मध्यप्रदेश में अंतिम चरण में 19 मई को जिन आठ लोकसभा क्षेत्रों में मतदान होने जा रहा उनमें से एक को छोड़कर सात सीटों पर भाजपा काबिज है। प्रदेश में भाजपा के गढ़ों में सेंध लगाने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी पूरी ताकत लगाए हुए थे लेकिन अंतिम चरण के मतदान वाले क्षेत्रों में कांग्रेस ने अनायास ही अपनी राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा को भी प्रचार अभियान में उतार दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर भाजपा जहां अपनी 27 सीटें बचाने का ही नहीं बल्कि सभी 29 सीटों पर एकतरफा जीत का भरोसा लिए है। बाद में लोकसभा के उपचुनाव में कांग्रेस ने अपनी झाबुआ-रतलाम की सीट भाजपा से छीन ली थी। भाजपा का दावा है कि चुनावी समर में प्रत्याशी गौण हो गए हैं और केवल मोदी के नाम पर ही मतदाता वोट डालेगा। प्रदेश में भाजपा का वर्चस्व बना रहे इसलिए स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस भाजपा से अधिक से अधिक सीटें छीने इसके लिए कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी मध्यप्रदेश में रैलियां कर रहे हैं। कांग्रेस की रणनीति इस चुनाव में कुछ बदली हुई रही है और जहां-जहां पहले मोदी की रैलियां हुईं, उन-उन क्षेत्रों में राहुल ने भी बाद में रैलियां कीं। प्रियंका गांधी वाड्रा को अंतत: चुनावी समर में उतारने का कांग्रेस को कितना फायदा मिला यह तो 23 मई की मतगणना से ही पता चलेगा और उसी दिन इस बात का भी पता चल जायेगा कि प्रियंका के सहारे भाजपा के गढ़ों में सेंध लगाने के कांग्रेस के प्रयास कितने सफल हुए।

मालवा, निमाड़ की जिन आठ सीटों देवास, उज्जैन, मंदसौर, रतलाम- झाबुआ, धार, इंदौर, खरगोन, खंडवा पर 19 मई को मतदान होना है उनमें 2014 की मोदी लहर में सभी पर भाजपा ने जीत हासिल की थी, यहां तक कि रतलाम-झाबुआ लोकसभा सीट जो कि 1980 से लगातार कांग्रेस के पास थी वह भी भाजपा ने छीन ली थी, हालांकि ज्यादा समय वह इस पर काबिज नहीं रह पायी, उसके उम्मीदवार दिलीप सिंह भूरिया के निधन के बाद हुए उपचुनाव में उनकी बेटी निर्मला भूरिया को पराजित कर कांतिलाल भूरिया ने यह सीट फिर से भाजपा से छीन ली। लेकिन अब चुनाव में अपनी सीट बचाये रखने के लिए भूरिया को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। हाल ही के विधानसभा चुनाव में मालवा निमाड़ के परम्परागत भाजपाई किले में कांग्रेस ने भारी सेंध लगा दी थी जिसके कारण यहां का राजनीतिक परिदृश्य काफी बदल गया है और कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए अनेक विधानसभा सीटें जीत लीं थी। अब कांग्रेस के सामने यही चुनौती है कि क्या वह विधानसभा चुनाव के प्रदर्शन को प्रियंका गांधी का भी सहारा मिल जाने के बाद इन आठ लोकसभा सीटों में से कितनी सीटें भाजपा से छीन पाती है। इस इलाके में दोनों ही पार्टियों में भितरघात हो रहा है और ये भी जीत-हार के समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। आठ सीटों में से छ: सीटों पर दोनों ही पार्टियों ने नये चेहरों को मौका दिया है। जबकि खंडवा में तीसरी बार कांग्रेस उम्मीदवार के रुप में अरुण यादव और भाजपा उम्मीदवार के रुप में नंदकुमार सिंह चौहान आमने-सामने हैं। दोनों ही अपनी-अपनी पार्टियों के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

प्रियंका गांधी सबसे पहले सोमवार 13 मई को इंदौर से हेलीकाप्टर से उज्जैन पहुंचेंगी और महाकाल के दर्शन-पूजा अर्चना के बाद रतलाम में जनसभा करेंगी और उसके बाद इंदौर पहुंचेंगी जहां वे कांग्रेस प्रत्याशी पंकज संघवी के समर्थन में रोड-शो करेंगी। रतलाम-झाबुआ लोकसभा क्षेत्र में रतलाम जिले के तीन और मंदसौर लोकसभा क्षेत्र में रतलाम जिले का एक विधानसभा क्षेत्र आता है, इस हिसाब से रतलाम में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाकर दोनों लोकसभा क्षेत्रों में फायदे उठाने की कांग्रेस की रणनीति है। एक ओर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तो सक्रिय हैं ही वहीं दूसरी ओर प्रियंका भी पहली बार लोकसभा चुनाव के लिएं प्रदेश में दस्तक देने जा रही हैं। इंदौर में प्रियंका के रोड-शो के अपने सियासी मायने हैं क्योंकि पिछले आठ लोकसभा चुनाव से इस क्षेत्र से सुमित्रा महाजन ताई चुनाव जीतती आई हैं, इस बार उम्र के आधार पर भाजपा ने उन्हें टिकट न देकर शंकर लालवानी को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस ने कई चुनाव लड़ने के अनुभवी रहे पंकज संघवी को चुनावी समर में उतारा है, कांग्रेस को उम्मीद है कि संघवी इस बार भाजपा के किले में सेंध लगा देंगे। इसी उम्मीद पर कांग्रेस ने प्रियंका को चुनाव प्रचार में उतारने का फैसला लिया है। मुख्यमंत्री कमलनाथ तो प्रचार अभियान की कमान पूरी मुस्तैदी से संभाले हुए हैं लेकिन अब कांग्रेस के दो बड़े चेहरे दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपने-अपने क्षेत्रों में मतदान हो जाने के बाद बचे हुए आठ क्षेत्रों में सक्रिय होंगे। कांग्रेस अब अपनी पूरी ताकत मालवा-निमाड़ अंचल में लगाने वाली है ताकि वह विधानसभा के प्रदर्शन को दोहरा सके। चुनाव नतीजों से यह बात भी सामने आयेगी कि पहली बार उत्तरप्रदेश से बाहर निकल कर केरल, दिल्ली, हरियाणा, असम में रोड-शो करने के बाद मालवा में प्रियंका का रोड-शो और मौजूदगी मध्यप्रदेश के चुनावी समर में कांग्रेस को कितनी ताकत देगी।

रतलाम-झाबुआ एकमात्र कांग्रेस की ऐसी परम्परागत सीट है जिस पर उसने उपचुनाव में फिर से जीत हासिल कर ली थी, इसके लिए अब वह कोई कोर-कसर बाकी नहीं रख रही है ताकि यह सीट उसके पास ही रहे। भाजपा भी इस सीट पर काफी जोर लगा रही है ताकि वह 2014 के नतीजे को दोहरा सके। यही कारण है कि इस सीट पर उसने अपने किसी भी विधायक को चुनाव न लड़ाने का फैसला बदला और झाबुआ में कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रान्त भूरिया को चुनाव हराने वाले जी.एस. डामोर को चुनाव मैदान में उतारा है। कांग्रेस के सामने भाजपा की तुलना में इस क्षेत्र में गुटबाजी काफी है लेकिन विधानसभा चुनाव में बतौर निर्दलीय विद्रोही कांग्रेसी जेवियर मेड़ा जिनके कारण भूरिया के बेटे चुनाव हार गये वापस कांगे्रस में लौट आये हैं इससे भूरिया को थोड़ी राहत मिली है। प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर का चुनाव इस समय सबसे ज्यादा चर्चित चुनाव बन गया है क्योंकि सुमित्रा महाजन की जगह इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहे शंकर लालवानी को चुनाव मैदान में भाजपा ने उतार तो दिया है लेकिन उनके खिलाफ खुलेतौर पर विद्रोही स्वर नहीं सुनाई दे रहे फिर भी चूंकि टिकट का फैसला अंतिम क्षणों में हुआ और दावेदारों की फेहरिस्त लम्बी हो गयी थी इसलिए अंदरुनी तौर पर वे सभी नाखुश हैं। ताई के कारण जो महाराष्ट्रीयन वोट मजबूती से भाजपा के साथ जुड़ा था उसमें कांग्रेस सेंधमारी की पूरी कोशिश कर रही है। जहां तक मंदसौर, खंडवा, देवास, उज्जैन, खरगोन और धार का सवाल है इन क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा दोनों में भितरघात की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। खंडवा में निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा भैया ने जो विद्रोही तेवर अपना रखे थे,  वे मुख्यमंत्री कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया की समझाइश के बाद अब समाप्त हो गये, उन्होंने अपनी पत्नी का नामांकन वापस ले लिया है। धार में भी जयस का उम्मीदवार चुनाव मैदान से हट गया जिससे कांग्रेस की चिंताएं दूर हुईं, फिर भी आठों क्षेत्रों में कांग्रेस और भाजपा में कुछ असंतुष्ट नाराज चल रहे हैं और जिसके असंतुष्ट ज्यादा शक्तिशाली होंगे वे अपने उम्मीदवार को वहीं रोक लेंगे और जिसके कमजोर होंगे उसका उम्मीदवार लोकसभा में नजर आयेगा।

और यह भी

लोकसभा चुनाव में युवा मानस काफी मायने रखता है, उसके मन में क्या चल रहा वह खुलकर नहीं बताता लेकिन 26 वर्षीय मेकेनिकल इंजीनियरिंग में बीई एवं एमबीए पास युवा मतदाता विक्रान्त रघुवंशी का यह कथन काफी कुछ कह जाता है और युवा मतदाताओं सहित अन्य मतदाताओं की मनोदशा की ओर भी इंगित करता है। रघुवंशी चुनाव के संबंध में चर्चा करने पर कहते हैं कि इस लोकसभा चुनाव में पहली बार देश में मतदाताओं के आई-क्यू का टेस्ट होने जा रहा है और मतगणना के बाद ही यह पता चल सकेगा कि मतदाता इस बार वास्तविक मुद्दों पर ध्यान देता है या प्रपोगंडा और प्रचार की आंधी में बहकर फैसला करता है।

सुबह सबेरे से साभार

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