कांग्रेस ने पटकी अपने पैर में कुल्हाड़ी, बाजी मार ले गई भाजपा

दिनेश निगम ‘त्यागी’

इसे कहते हैं अपने पैर में कुल्हाड़ी मारना। कांग्रेस ने अपने पैर में कुल्हाड़ी पटकी और बाजी भाजपा मार ले गई। यह कहना कतई ठीक नहीं कि भाजपा की खरीद-फरोख्त के कारण कमलनाथ सरकार गिरी। इसके विपरीत भाजपा नेताओं का यह कहना सच है कि कांग्रेस सरकार अपने ही अंतर्विरोधों के कारण गिरी। कमलनाथ अनुभवी नेता है। उनके जैसा नेता जानबूझ कर ऐसी गलती नहीं कर सकता, पर वे चूक गए। जनता, कार्यकर्ताओं के बीच जा रहे इस मैसेज को पढ़ने में वे नाकाम रहे कि ‘कमलनाथ मुख्यमंत्री हैं, सरकार दिग्विजय सिंह चला रहे हैं और ज्योतिदित्य सिंधिया को किनारे किया जा रहा है’। इस संदेश की गंभीरता को न समझ पाने का नतीजा है, कमलनाथ अपनी सरकार गंवा बैठे। कमलनाथ एवं दिग्विजय सिंह राजनीतिक प्रबंधन के महारथी माने जाते हैं पर इस बार नाथ-दिग्गी की जोड़ी फ्लोर मैनेजमेंट में पूरी तरह से फेल साबित हुई।

– सिंधिया को संतुष्ट करना थी पहली जवाबदारी
कांग्रेस सरकार भले निर्दलीय, सपा, बसपा विधायकों के समर्थन से बनी थी लेकिन कमलनाथ मुख्यमंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की बदौलत बने थे। विधानसभा चुनाव में बड़े वर्ग के लिए सिंधिया मुख्यमंत्री का चेहरा थे। हाईकमान के साथ बैठक में वे राजी हो गए तो कमलनाथ की पहली जवाबदारी सिंधिया के प्रति थी, समर्थन दे रहे विधायकों के प्रति नहीं। मुख्यमंत्री ने इस बात का ध्यान नहीं रखा। मंत्री न बनने से नाराज विधायकों को वे साधते, समझाते रहे लेकिन सिंधिया और उनके समर्थकों के प्रति बेपरवाह रहे। यही वजह है कि मंत्री न बन पाने से नाराज विधायकों का असंतोष जब-जब भड़का, उसे थाम लिया गया लेकिन सिंधिया को संतुष्ट करने की कोशिश नहीं की गई। नतीजा, सिंधिया नाराज हुए और कमलनाथ की कुर्सी चली गई।

– चुनाव बाद ही बना देना था प्रदेश अध्यक्ष
ज्योतिरादित्य के प्रभाव वाले चंबल-ग्वालियर अंचल में कांग्रेस को 34 में से 27 विधानसभा क्षेत्रों में जीत मिली थी। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को ऐसी सफलता किसी दूसरे नेता के प्रभाव वाले क्षेत्र में नहीं मिली। बुंदेलखंड, मालवा एवं मध्यभारत की कुछ सीटें जीतने में भी सिंधिया की भूमिका रही। साफ है, कांग्रेस सरकार बनने में सिंधिया प्रमुख फैक्टर थे। मुख्यमंत्री पद के लिए उन्होंने समझौता भी किया। यह सब जानते हुए उन्हें लगातार इग्नोर करना व तवज्जो न देना, अपने पैर में कुल्हाड़ी पटकना नहीं तो क्या है? होना यह चाहिए था कि विधानसभा चुनाव बाद न सही लेकिन जैसे ही लोकसभा चुनाव हुए, कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ देना चाहिए थी और प्रयास कर सिंधिया को यह पद दिलाना था। लोकसभा चुनाव हार जाने के बाद सिंधिया दु:खी भी थे। ऐसा न कर कमलनाथ ने अपने लिए संकट बढ़ाया।
– कमलनाथ में थी यह करने की क्षमता
कमलनाथ छोटे नेता नहीं हैं। चालीस साल का उनका राजनीतिक अनुभव है। सोनिया गांधी के वे करीब माने जाते हैं। आखिर, उन्होंने चाहा तो दिग्विजय सिंह को भोपाल से लोकसभा चुनाव लड़ना पड़ा। कमलनाथ चाहते तो सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी बनवा सकते थे। यह कहना पर्याप्त नहीं था कि मैं दोनों दायित्व नहीं निभा पा रहा हूं, इसलिए एक पद छोड़ना चाहता हूं। सिंधिया की इच्छा थी तो उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनवाने के लिए प्रयास करना चाहिए थे। कमलनाथ ने यह नहीं किया, अलबत्ता मैसेज जाने दिया कि नाथ और दिग्विजय की जोड़ी सिंधिया के प्रदेश अध्यक्ष बनने की राह में रोड़ा अटका रही है। यही मैसेज सिंधिया को राज्यसभा भेजने के मामले में गया। सिंधिया की टिप्पणियों पर कमलनाथ की प्रतिक्रिया ने भी आग में घी का काम किया। लिहाजा, सिंधिया की नाराजगी चरम पर पहुंची। वे तो सड़क पर नहीं उतरे लेकिन कमलनाथ सरकार को सड़क पर ला खड़ा किया।

– अभी भी है उम्मीद की एक किरण
सरकार गंवा देने के बावजूद कांग्रेस एवं कमलनाथ के लिए उम्मीद की एक किरण शेष है। यह है 6 माह के अंदर 25 विधानसभा सीटों के लिए होने वाले उप चुनाव। दो सीटें पहले से रिक्त हैं। कांग्रेस के 22 बागियों के इस्तीफे स्वीकार हो चुके हैं। भाजपा के एक विधायक शरद कौल का भी इस्तीफा स्वीकार हुआ है। कमलनाथ का कहना है कि आज के बाद कल भी आएगा। उन्हें उम्मीद है कि उप चुनाव में वे इतनी सीटें जीतेंगे कि फिर कांग्रेस वापसी करेगी। हालांकि अधिकांश सीटें सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र वाली हैं, अब उन्हें भाजपा का समर्थन भी मिलेगा। ऐसे में कांग्रेस की जीत कठिन है पर उम्मीद तो की ही जा सकती है। दूसरी तरफ ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दिल्ली में प्रेस के साथ बातचीत करते हुए कहा है कि जिन विधायकों ने इस्तीफा दिया है, वे सभी होने वाले उप चुनाव में जीतेंगे।
– कांग्रेस को 17, भाजपा को 10 सीटों की जरूरत

अंक गणित में भाजपा से पिछड़ी कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए उपचुनाव में 25 सीटों में से 17 सीटें जीतना होंगी। जबकि भजापा को बहुमत में रहने के लिए कम से कम 10 सीटों की जरूरत है। अर्थात उप चुनाव के बाद तय होगा कि भाजपा सत्ता में बनी रहेगी या कांग्रेस की वापसी होगी। विधानसभा सीटों के गणित के अनुसार प्रदेश में कुल 230 विधानसभा सीट हैं। बहुमत के लिए चाहिए 116। शरद कौल का इस्तीफा स्वीकार होने के बाद भाजपा के पास फिलहाल 106 सीटें हैं। इसलिए सत्ता में बने रहने के लिए उसे कम से कम 10 सीटें जीतना होंगी। कांग्रेस की संख्या 92 है। निर्दलीय, सपा और बसपा का समर्थन उसे मिल जाए तो संख्या 99 है। लिहाजा, सत्ता में वापसी के लिए उसे 17 सीटों की जरूरत होगी। सपा, बसपा एवं निर्दलीय विधायक अलग हो जाएं तब तो और ज्यादा सीटें जीतनी होंगी।

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