कान छिदवाने के पीछे कई वैज्ञानिक कारण

नई दिल्ली: कान छिदवाने के पीछे कई वैज्ञानिक कारण भी हैं और कान छिदवाना सेहत के लिए भी कई तरह से फायदेमंद है। आयुर्वेद की मानें तो कान के बाहरी भाग में सेंटर का हिस्सा सबसे अहम पॉइंट होता है। यह एक ऐसा हिस्सा है जो प्रजनन संबंधी सेहत के लिए सबसे अहम माना जाता है। इतना ही नहीं कान छिदवाने से महिलाओं का मेन्स्ट्रुअल साइकल यानी मासिक धर्म भी सही और हेल्दी बना रहता है। अगर छोटी उम्र में ही बच्चों के कान छिदवा दिए जाएं तो उनके ब्रेन का विकास बेहतर तरीके से होता है।

ईयर लोब्स यानी कान के बाहरी हिस्से में मध्याह्न पॉइंट होता है जो ब्रेन के लेफ्ट हेमिस्फियर को राइट हेमिस्फियर से जोड़ने का काम करता है। कान के इस हिस्से में छेद करवाने से ब्रेन के ये हिस्से ऐक्टिवेट हो जाते हैं। ऐक्युप्रेशर थेरपी का सिद्धांत भी यही कहता है कि जब इस मेरिडियन पॉइंट को उत्तेजित किया जाता है तो ब्रेन का जल्दी और हेल्दी तरीके से विकास होता है। कान के सेंटर पॉइंट पर ही आंखों की रोशनी का सेंटर निर्भर करता है।

ऐसे में इन पॉइंट्स पर छेद करवाने के बाद पड़ने वाले प्रेशर की वजह से आइसाइट यानी आंखों की रोशनी बेहतर होती है। आयुर्वेद की मानें तो कान में जहां छेद करवाया जाता है वह सबसे अहम ऐक्युप्रेशर पॉइंट है जो बच्चे के सुनने की क्षमता को मेनटेन करने में अहम रोल निभाता है। ऐक्युप्रेशर एक्सपर्ट्स की मानें तो कान में झनझनाहट जैसी समस्याओं से छुटकारा दिलाने में अहम रोल निभाता है कान में छेद वाला स्पॉट। मालूम हो कि यह भारतीयों की परंपरा सदियों पुरानी है।

पुरातन काल में सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरुष भी कान छिदवाकर कानों में कुंडल पहना करते थे। इस परंपरा को हमारी सांस्कृतिक विरासत से भी जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में अगर आप सोचती हैं कि कान छिदवाना सिर्फ फैशन के लिए और अच्छा दिखने के लिए किया जाता है तो आप गलत हैं।

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