कोटा में पढ़ रहे छात्रों का सच, नशे अनिंद्रा और अपराध की ओर अग्रसर होते युवा

मुंबई: मुंबई के टाटा इंस्टिट्यूट सोशल साइंस की एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के कोटा में पढ़ने वाले छात्र-छात्राएं, तनाव, अनिंद्रा, अकेलेपन, सेक्सुअल, एक्सपेरिमेंट, प्रेगनेंसी और नशे की लत का शिकार होना आम बात है। उल्लेखनीय है कोटा के कोचिंग संस्थानें आईआईटी और पीएमटी की कोचिंग करने वालों का गढ़ बना हुआ है। यहां हर साल लाखों बच्चे कोचिंग के लिए जाते हैं। वहां से कई बीमारियों का शिकार वापस होकर लौटते हैं।

अपने बच्चों का बेहतर भविष्य बनाने के लिए माता पिता बच्चों को राजस्थान के कोटा में कोचिंग के लिए ले जाते हैं। अभिभावक बच्चों को वहां छोड़कर चले आते हैं। पिछले वर्षों में कोटा के छात्रों ने बड़ी संख्या में आत्महत्या की। कईयों ने आत्महत्या के असफल प्रयास किए। इसको देखते हुए मुंबई की टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस ने यहां की एक सर्वे रिपोर्ट तैयार की है। जिसमें कोचिंग सिटी के सच को उजागर किया गया है।

सर्वे रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश छात्र 6 घंटे की लगातार कोचिंग करते हैं। कई छात्रों ने दो कोचिंग एक साथ ले रखी हैं। जिसके कारण वह तनाव में रहते हैं। अवकाश के दिन साप्ताहिक परीक्षा की तैयारी करते हैं। जिसके कारण उनका मानसिक तनाव बना रहता है। काउंसलर, छात्रों से तनाव कम करने के लिए उन्हें एक दूसरे से मिलने के लिए बोलते हैं। वहीं अभिभावक पढ़ाई में मन लगाने और पैसे बर्बाद मत करो, जैसे नसीहत देते हैं। जिसके कारण छात्र-छात्राओं के ऊपर दबाव बढ़ जाता है।

कोचिंग में पढ़ने वाले छात्रों के दोस्तों और सामाजिक जीवन नहीं होने के कारण इनका मनोरंजन काफी महंगा हो जाता है। इन्हें इतने पैसे परिवार से उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। कोटा के छात्र-छात्राओं के बीच शराब, सिगरेट, नशीले पदार्थ का उपयोग करने की जानकारी सर्वे में लगी है। जिसके कारण कुछ छात्र-छात्राएं अपराधिक गतिविधियों की ओर बढ़ जाते हैं।

छात्र-छात्राओं के बीच उम्र के हिसाब से सेक्सुअल आकर्षण होने से गर्भधारण और गर्भपात जैसी समस्याओं से भी यहां के छात्र-छात्राओं को तनाव में रहना पड़ता है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार 2013 से 2017 के बीच कोटा जिले के कोचिंग सेंटर में 58 छात्र-छात्राओं के आत्महत्या की घटनाएं रिकॉर्ड हैं। पुलिस रिकॉर्ड से यह जानकारी नहीं प्राप्त हुई है कि कितने लोगों ने आत्महत्या के असफल प्रयास किए हैं।

सर्वे में 49 फ़ीसदी छात्र-छात्राओं को नर्वस, परेशान और डरा हुआ पाया गया है। 37 फ़ीसदी छात्र-छात्राएं काफी गुस्सैल प्रवृत्ति के पाए गए हैं।32 फ़ीसदी छात्र-छात्राओं ने विभिन्न कारणों से सारे दिन दुखी रहने का इजहार किया है।28 फीसदी छात्र-छात्राएं अपने जीवन से निराश हो चुके हैं।उनका मानना है कि उनके जीवन का अब कोई मकसद नहीं रहा।टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस की यह रिपोर्ट कोटा के सच को सामने लेकर आई है।इससे अभिभावकों को सबक लेने की जरूरत है।

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