कोरोनाकाल में रक्षाबंधन के सात संयोग और शिव के सात आशीर्वाद

मनोज वार्ष्णेय

इस बार रक्षाबंधन सोमवार को है और सावन का आखिरी सोमवार भी इसी दिन है। इसी दिन श्रावण नक्षत्र ,सर्वार्थ सिद्धि योग,दीर्घायु आयुष्मान का शुभ संयोग तो है ही साथ ही सोमवती पूर्णिमा भी है। भद्रा और ग्रहण की छाया भी नहीं है। इस तरह से रक्षाबंधन पर इस बार सात संयोग बन रहे हैं। शिव, सावन, श्रावणी पूर्णिमा ,सोमवार और रक्षाबंधन इन सभी शब्दों को मिलाकर अगर एक शब्द सहेजें तो वह बनता है शिवशक्ति की भक्ति। ऐसे इन संयोगों के साथ ही शिव का आशीर्वाद भी इस दिन मिलता ही है।

शिवशंभु की पूजा के बाद जब बहनें भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधेंगी तो अपने आप शिव के सात आशीर्वाद भी मिल जाएंगे। जब से कोरोना आया है तब से वर्ष 2020 को खराब कहा जा रहा है। हर कोई इसी बात को कह रहा है कि यह वर्ष बहुत खराब निकला। ऐसे अभी 2020 का आधा समय ही निकला है, लेकिन जनसामान्य के मन में धारणा हो गई है कि आने वाला समय भी कहीं ऐसा ही नहीं निकले। अगर दिन खराब निकले हैं तो इस पूर्णिमा के बाद शिव सब शुभ करेंगे। तो देखते हैं कि यह आशीर्वाद कैसे बदल देंगे हमारी जिंदगी?

आशीर्वाद
मानव जीवन में हर कोई किसी न किसी की भक्ति करता ही है और उसे उसका प्रतिफल भी मिलता है। भगवान राम की भक्ति का प्रसाद सुग्रीव को मिला लंका के राजा के रूप में तो हनुमान जी को मिला हर काल में उनके अन्यन्य भक्त के रूप में। इसी तरह शिव के आशीर्वाद के लिए ही हर सोमवार का व्रत रखने की परंपरा हमारे समाज में है। सनातन काल से कहते भी आ रहे हैं कि सावन में सोमवार के व्रत रखने से सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। तो मिल जाए अगर शिव का आशीर्वाद तो दूर हो जाएंगे सारे कष्ट।

शिव की भक्ति
यह हर कोई कर सकता है। शिव हैं ही इतने सीधे की वह फूल पत्तों से ही प्रसन्न हो जाते हैं। शिव की भक्ति की कथाएं आज भी हर कहीं बड़े प्रेम से सुनी जाती हैं। भस्मासुर जैसे राक्षस ने उन्हें अपनी भक्ति के जाल में ऐसा उलझाया कि वह उसे ऐसा वरदान दे बैठे,जिसमें उसे मार पाना मुश्किल था। पर कहते हैं कि भक्ति से बड़ी होती है शक्ति। भस्मासुर ने शिव की भक्ति करके उनसे जो वरदान मांगा उसका वह दुरुपयोग करने लगा, तो शिव ने उसे उसी की भक्ति से शिवधाम भेजने में कोई देर नहीं की।

साहस
बाबा केदरनाथ की यात्रा हो या फिर मानसरोवर की यात्रा सभी साहस के बिना हो ही नहीं सकतीं। कोई भी शिवभक्त शिव जैसा साहस पाकर इन यात्राओं को आराम से पूरा कर सकता है। कहते हैं कि जब शिव की बारात निकलती है तो उसमें भूत-प्रेत,अघोरी और भी न जाने कौन-कौन शामिल होते हैं। इस बारात को देखने के लिए साहस चाहिए जो शिव की कृपा से सहज ही मिल जाता है।

त्याग
संतोषी सदा सुखी। यह बात सभी पर लागू होती है। जिस व्यक्ति ने त्यागी प्रवृति अपना ली उसके आगे सबकुछ बेकार है। खुद शिव ने दुनिया जहान को छोड़कर हिमालय पर अपना धाम बनाया है। यहां पर पहुंचना ही अपने आप में बहुत बड़ा त्याग है। जब आप सभी मोह-माया से मुक्त हो जाते हैं तभी इस हिमालय की ओर प्रस्थान करते हैं। महाभारत के बाद पांडवों का हिमालय की ओर प्रस्थान भी तभी हुआ था जब वह सबकुछ त्याग चुके थे ।

शिव का साथ और तपोबल
शिव का साथ जिस किसी को मिल जाता है वह हर लोक में विजयी होता है। किसी भी काल में देख लें शिव की भक्ति और उनके साथ की कथाएं हमारी धार्मिक आस्थाओं को बल देती हैं। मां पार्वती और शिव की कथा तो सभी को पता है,लेकिन शिव का साथ जब भगवान राम को मिला तो उन्होंने लंका को जीतकर मां सीता को वापस पाया। जब रामजी लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे तब उन्होंने रामेश्वरम में शिव की पूजा की थी उसके बाद ही वह लंका की ओर गए थे। यही शिव का साथ है और उनकी शक्ति पाने के लिए तप करने पर मिलने वाला बल।

शिव सी शान
शिव जैसी शान तो किसी को मिलती ही नहीं है। चाहे वह हिमालय पर विराजें या फिर धरती पर या किसी और लोक में। गले में नागों की माला, नीलकंठ, हाथ में त्रिशुल और मुक्त मन से नृत्य। इस शान को देखने के लिए सभी देवी-देवता उनकी वंदना करते हैं। ऐसे शिव के सात आशीर्वाद जिसे मिल जाएं वह निश्चय ही भवसागर से तर जाएगा।

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