क्या पुलवामा हमले को चुनावी रंग दे रहे है पीएम मोदी ?

दिल्ली ब्यूरो: पुलवामा हमले को कहीं से बर्दास्त नहीं किया जा सकता। यह हमला सीधा भारत पर हमला है ,इस हमले का मुहतोड़ जबाव देना जरुरी है ताकि पकिस्तान और उसके पाले आतंकियों को सबक सिखाया जा सके। अगर हम इसका माकूल जबाव नहीं देते तो आने वाली पीढ़ी ना सिर्फ हमें धिक्कारेगी वल्कि दुनिया में भी भारत की जगहसाई होगी। इसलिए सबसे ज्यादा जरुरी है कि किसी भी सूरत में पकिस्तान को सबक सिखाया जाय।

 इधर पिछले एक सप्ताह से और खासकर पुलवामा हमले में हमारे 40 से ज्यादा जवानो के शाहिस होने के बाद देश में बन्दे मातरम् ,पाकिस्तान मुर्दावाद ,भारत जिन्दावाद के नारे गूंज रहे हैं। गली गली में प्रभात फेरियां निकाली जा रही है। नेताओं के बयान सामने आ रहे है और खुद पीएम मोदी बहुत कुछ हुंकार भरते आ रहे हैं लेकिन होता कुछ नहीं दिख रहा। लेकिन जिस तरह के माहौल बनते दिख रहे हैं उससे लगने लगा है कि बीजेपी फुलवाम हमले  को आगामी चुनाव के रंग में रंगने लगी है। खुद पीएम मोदी अपनी सभाओं में पुलवामा हमले को चुनावी रंग देने लग गए हैं! दूसरी बात यह कि बीते 5 साल से जारी मोदी सरकार की कश्मीर नीति की विफलताओं पर पर्दा डालने में यह क़दम प्रधानमंत्री के लिए बड़ा सुविधाजनक उपाय भी हो सकता है! यानी अब आतंकवाद और पाकिस्तान का इलाज सेना को ही करना है, राजनीतिक सत्ता को नहीं!

सवाल यह है कि सेना को किस बात की छूट है? कश्मीर से सारे के सारे आतंकवादियों के पूरे सफ़ाये की या सीमा पार चल रहे आतंकी ठिकानों पर हमला बोल देने की या पाकिस्तान के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ देने की? इसका जवाब स्पष्ट नहीं है।सेना को अगर कश्मीर के भीतर के आतंकवाद से निपटने की ‘खुली छूट’ है, तो वह क्या तरीक़े अपनाएगी? इस ‘खुली छूट’ में सेना जो करेगी, उसका ठीकरा किसके सिर फूटेगा? किस पर उँगलियाँ उठेंगी? सेना पर ही न! और सेना अपना मुँह नहीं खोल सकती। उसे सार्वजनिक रूप से बयान देने का हक़ नहीं है। उस पर ‘अनुशासन’ की तलवार लटकती रहती है।

सेना यह नहीं बता सकती कि उसके पास कितने सीमित संसाधन हैं? बाक़ी देश को तो पता ही है कि सेना में अफ़सरों, गोला-बारूद और अन्य साज़ो-सामान की भारी किल्लत है। यही है तेज़ी से कड़े फ़ैसले लेने वाली मज़बूत सरकार का सबसे बड़ा फ़ैसला। अब बताइए कि क्या 70 सालों में कभी किसी सरकार ने इतना बड़ा फ़ैसला पहले कभी लिया है? यदि नहीं, तो आपके पास ‘मोदी-मोदी-मोदी’ की नारेबाज़ी करने के सिवाय सिर्फ़ एक ही विकल्प है कि आप आगामी आम चुनावों में अपना फ़ैसला सुनाएँ।

  चुनाव अब सिर पर हैं। चुनाव में मोदी सरकार की ओर से गाना गाया जाएगा कि उसने न सिर्फ़ सर्ज़िकल स्ट्राइक की, बल्कि सेना को भी पूरी छूट दी। इसके बावजूद यदि आतंकवाद बेक़ाबू है तो इसके लिए मोदी सरकार की कोई जवाबदेही नहीं है। इसके लिए पूर्ववर्ती काँग्रेसी सरकारें ज़िम्मेदार हैं। अचानक बिन बुलाए लाहौर पहुँच जाने वालों और पठानकोट में पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई के अफ़सरों की अगवानी करने वालों में खोट देखने वालों को तो न जाने कब से राष्ट्रद्रोही बताया ही जा रहा है।

यदि मोदी सरकार की कश्मीर नीति को आँकड़ों के साँचे में ढालकर देखना राष्ट्रद्रोह नहीं हो तो लगे हाथ यह भी जान लीजिए कि कड़े फ़ैसले लेने वालों के शासनकाल में जम्मू-कश्मीर में हुए आतंकी हमलों की संख्या में ख़ासी तेज़ी ही दर्ज़ हुई है। इसकी वजह से इन हमलों में हताहत हुए सैनिकों की संख्या भी बढ़ी है।  यूपीए-2 के मुक़ाबले मोदी राज में आतंकवाद की राह पकड़ने वाले कश्मीरी युवाओं की संख्या भी दस गुना इज़ाफ़ा हुआ है। ये आँकड़े भी उसी सरकारी तंत्र के हैं, जिस पर उसके ही आला अफ़सरों ने आँकड़ों को छिपाने का आरोप लगाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया है।

मोदी सरकार की कश्मीर नीति सही है या नहीं? इस सवाल पर अनन्त चर्चा और बहस हो सकती है। लेकिन बीते 5 साल के अनुभव ने इतना तो साफ़ कर ही दिया है कि पूर्ववर्ती सरकारों की नीति ग़लत नहीं थी, क्योंकि नीतिगत स्तर पर तो बयानबाज़ी के सिवाय मोदी राज में कुछ भी नया नहीं हुआ।सेना की ओर से आतंकवादियों के ख़िलाफ़ पहले भी ज़ोरदार कार्रवाई ही हुआ करती थी। सीमा पार से होने वाली अकारण गोलीबारी का पहले भी मुँहतोड़ जवाब देने की सेना को पूरी छूट हुआ करती थी। सर्ज़िकल हमले भी पहले होते ही रहे हैं। ‘आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं चल सकते’ वाली नीति भी पुरानी ही है। पाकिस्तान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग करने की नीति में भी नया कुछ नहीं है।

ज़ाहिर है कि यदि पुरानी नीति ही क़ायम है तो फिर मोदी राज और पूर्ववर्ती शासनों के बीच उपलब्धियों और नाकामी की ही तुलना हो सकती है। इसी तुलना से पता चलता है कि मोदी राज में आतंकी हमलों, इसमें मारे जाने वाले सैनिकों और नागरिकों की संख्या और आतंकवाद की राह पकड़ने वाले युवाओं की संख्या में इज़ाफ़ा हुआ है। इसका मतलब यह हुआ कि पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में मोदी सरकार कश्मीर मोर्चे पर कहीं अधिक नाकाम रही है।

सियासी मोर्चे पर भी बीजेपी-पीडीपी गठबन्धन का हश्र हमारे सामने है। बीजेपी का चुनावी वादा था कि कश्मीरी पंडितों को उनके घरों में वापस भेजा जाएगा। लेकिन बीते 5 साल में एक भी कश्मीरी पंडित की घाटी में वापसी नहीं हुई। मोदी सरकार यह सब जानती है। चुनाव में इन सभी मुद्दों का उभरना स्वाभाविक है। इससे बचाव के लिए ही प्रधानमंत्री ने सेना को ‘पूरी स्वतंत्रता’ देने का दाँव चला है। सेना सफल हो गई, तो श्रेय मोदी सरकार का, सेना अगर इच्छित परिणाम न ला पाई, तो ठीकरा सेना के मत्थे क्योंकि सरकार ने तो सेना को ‘खुली छूट’ दे ही रखी थी। लेकिन इस दाँव का एक और बड़ा ख़तरा है। कश्मीर जैसे मामलों में अगर सेना मनमर्ज़ी से सब कुछ करने लगे, तो एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कहीं हम सेना के ‘निरंकुश’ हो जाने का जोखिम नहीं ले रहे हैं।

और अंत में सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर पुलवामा की घटना कैसे घटी। पुरे जम्मू कश्मीर में हमारे कई तरह की खुफिया एजेंसी तैयार है। सेना की अपनी खुफिया एजेंसी है तो सीआरपीएफ की खुफिया एजेंसी अलग। बीएसएफ की खुफिया एजेंसी है तो स्थानीय पुलिस की खुफिया एजेंसी भी मौजूद है। ऐसे में पुलवामा की घटना को आतंकियों ने अंजाम दे दिया और हमारे दर्जनों जवानो को मार गिराया ,घायल कर दिया। क्या यह सब सरकार की नाकामी नहीं। लगता तो ऐसा है कि सरकार अपनी नाकामी को छुपाने के लिए सेना को हर तरह की छूट देने की बातें कर रही है।

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