क्षेत्रीय पार्टियों समेत बीजेपी को भी ख़ास मैसेज दे रहे हैं कर्नाटक के परिणाम

Published: 16/05/2018 4:50 PM

अखिलेश अखिल

कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के नतीजों में बहुत कुछ छुपा है। खासकर विपक्ष की राजनीति करने वाले दलों के लिए कर्नाटक के परिणाम सबक लेने जैसा है। यह परिणाम कांग्रेस को तो बहुत कुछ सीखा ही रहा है खास कर क्षेत्रीय दलों को सतर्क भी कर रहा है। अगर क्षेत्रीय दल इस परिणाम के मुताविक अपने को नहीं बदल पाए तो उनकी राजनीति भी ख़त्म हो सकती है। कर्नाटक चुनाव के बाद यह साफ़ हो गया है कि अभी के हालत में बीजेपी को हराना मामूली काम नहीं। उसकी जड़े काफी मजबूत हो चुकी है। संघ की घर घर पैठ से बीजेपी के प्रति लोगों में हिंदुत्व के प्रति रुझान भी बढे हैं। ऐसे में बीजेपी अभी अमर होती दिख रही है। इस चुनाव परिणाम में क्षेत्रीय पार्टियों के लिए बड़ा मैसेज है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जेडीएस ने बहुत शानदार प्रदर्शन किया है। पिछले चुनाव का प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद किसी को नहीं थी। सारे चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के सर्वेक्षणों में जेडीएस को नुकसान होने का अंदाजा लगाया जा रहा था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह किंग मेकर की जगह किंग बनते नजर आ रही है। जेडीएस ने उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया है। उसके अकेले लड़ने से पिछली बार कांग्रेस को फायदा हुआ था और इस बार भाजपा को फायदा हो गया।

यह कर्नाटक चुनाव का सबसे बड़ा निष्कर्ष है कि जेडीएस, बसपा के तालमेल और इसे मिले एमआईएम के समर्थन ने कांग्रेस को चुनाव हरा दिया। बेंगलुरू और मैसुरू के चुनाव नतीजों में इसकी झलक मिलती है। देश की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों के लिए इस नतीजे का दो तरह से मैसेज निकलता है। पहला मैसेज तो भाजपा के अजेय होने का है। यह कर्नाटक से स्थापित हुआ है कि भाजपा को हराना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। इस वजह से देश भर की पार्टियों को सावधान हो जाना चाहिए। खास कर उन क्षत्रपों को जो भाजपा के इस अश्वमेध के बावजूद अपनी सत्ता बचाने में कामयाब रहे हैं। क्योंकि अगले चुनावों में भाजपा उनके राज्य छीनने के लिए लड़ेगी। खास तौर से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल, ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में। बीजेपी का अगला अटैक इन्ही राज्यों में होना है और बड़ी सावधानी से वहाँ संघ काम कर रहा है।

दूसरा मैसेज यह है कि अगर कांग्रेस और जेडीएस मिल कर लड़े होते या बसपा ने जेडीएस से तालमेल नहीं किया होता तो शायद कर्नाटक में ऐसे नतीजे नहीं आते। कांग्रेस का हारना थोड़े समय के लिए क्षत्रपों को संतोष और खुशी दे सकता है क्योंकि इससे उनके मोलभाव की ताकत बढ़ती है पर इसके बावजूद यह तय माना जाना चाहिए कि भाजपा को रोकने के लिए प्रादेशिक क्षत्रपों को मिल कर चुनाव लड़ना होगा। उधर बीजेपी भले ही कर्नाटक में सरकार बनाने के करीब पहुँच गयी पर कांग्रेस की हार का भाजपा के लिए भी एक बड़ा मैसेज है। कर्नाटक का चुनाव खत्म होने के बाद उन राज्यों में चुनाव होने हैं, जहां बीजेपी का शासन है। कर्नाटक के नतीजे इस बात का संकेत हैं कि सरकार चाहे काम जैसा करती हो पर लोगों में बदलाव की चाह है। लोग बहुत एंटी इन्कंबैंसी नहीं होने के बावजूद सत्ता बदल रहे हैं। ध्यान रहे चुनाव से पहले जितने भी सर्वेक्षण हुए थे उनमें कहीं भी कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया को लेकर बहुत निगेटिव माहौल देखने को नहीं मिला। लोगों के कई मामलों में उनके कामकाज को सराहा था। उनकी कई योजनाएं लोगों में हिट रही थीं। इसके अलावा राजनीतिक दांवपेंच भी उन्होंने खूब चले थे। लिंगायत को बांटने का मामला हो, पिछड़ी व दलित जातियों के साथ साथ मुस्लिम का समीकरण बनाने का मामला हो या कन्नड़ अस्मिता का दांव हो, उन्होंने बिसात बहुत अच्छी बिछाई थी। इसके बावजूद कांग्रेस हार गई।

इसलिए भाजपा के लिए यह बड़ा संकेत है क्योंकि अब उसके शासन वाले राज्यों में चुनाव होने वाले हैं। इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ कर हर जगह मतदाताओं ने बदलाव को प्राथमिकता दी है। इस साल पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में चुनाव हुए और तीनों जगह सत्ता बदली। उससे पहले दो राज्यों गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव हुए। इनमें भाजपा जैसे तैसे गुजरात बचाने में कामयाब रही पर हिमाचल में सत्ता बदल गई। उससे पहले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब में चुनाव हुए थे। इन पांचों राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टियां हारी थीं। ध्यान रहे भाजपा भी गोवा में हारी थी, हालांकि उसने सरकार बना ली। बहरहाल, इससे भी पहले 2016 में पांच राज्यों में चुनाव हुए थे, जिनमें बंगाल और तमिलनाडु में सत्तारूढ़ पार्टी जीती थी, पर केरल, असम और पुड्डुचेरी में सत्तारूढ़ पार्टियों की हार हुई थी। कुल मिला कर पिछले दो साल में 16 राज्यों में चुनाव हुए हैं, जिनमें से सिर्फ तीन राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी जीत सकी थी बाकी 13 राज्यों में लोगों ने सत्ता पलट दी। इसलिए कहा जा सकता है कि कर्नाटक के नतीजे भाजपा की राज्य सरकारों और केंद्र की सरकार के लिए भी एक बड़ा संदेश देने वाले हैं।

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