खुद नेताओं के लिए भी घातक है सियासी दुश्मनी का ‘एफआईआरवाद’

लखनऊ: कोरोना समय में देश में राजनेताओं द्वारा एक दूसरे को निपटाने के लिए एफआईआर पा‍ॅलिटिक्स का बढ़ता चलन और लोकतंत्र का गला घोंटने के लिए आपराधिक मानहानि के इस्तेमाल पर मद्रास हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणी काबिले गौर है। पहले मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ पीएम केयर्स फंड पर सवाल उठाने से नाराज भाजपा ने अपने ही शासित राज्य में सोनिया के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी तो पिछले माह एक मोदी समर्थक वरिष्ठ पत्रकार के खिलाफ कांग्रेस शासित राज्यों में सौ से अधिक एफआईआर दर्ज करवाई गईं। पश्चिम बंगाल मं तो ममता दी की राजनीति के तहत कई विरोधी भाजपा नेताओं के खिलाफ पुलिस प्राथमिकियां दर्ज हो चुकी हैं। यानी जो जिस राज्य में सत्ता में है, वह विरोधी को निपटाने के लिए अब शाब्दिक प्रतिवार की जगह सीधे थाने में रपट लिखाने रास्ता चुनता है।

राजनीतिक रूप से सियासी दुश्मन को घेरने अथवा निपटाने के लिए पहले भी यदा-कदा एफआईआर ( प्रथम सूचना रिपोर्ट) का सहारा लिया जाता था। लेकिन वह अपवाद स्वरूप अथवा किसी जांच की प्राथमिक रिपोर्ट के आधार पर ही होता था। लेकिन अब स्थिति इतनी बदल गई है कि आपका एक ट्वीट भी आपको हवालात पहुंचा सकता है। यकीनन सोशल मीडिया में किसी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का अधिकार किसी को नहीं है। लेकिन राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोपों को कानूनी अपराध की श्रेणी में शिफ्टप करने की प्रवृत्ति न सिर्फ स्वस्थ लोकतंत्र बल्कि खुद राजनेताअों के लिए भी घातक है।

सोनिया गांधी ने कोरोना संकट के दौरान मोदी सरकार द्वारा स्थापित ‘पीएम केयर्स फंड’ पर जो सवाल उठाएं हैं, वो कई दिनों से मीडिया में उठ रहे हैं। सवाल इस फंड की पारदर्शिता, उपयोग और नीयत को लेकर है। बहुत से लोग मोदी की नीयत को सही मानते हैं, लेकिन इससे असहमत होने का लोकतांत्रिक अधिकार भी सभी को है। कर्नाटक के शिमोगा जिले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ दर्ज एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि वो और उनकी पार्टी केन्द्र सरकार को लेकर सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैला रही है। ‘पीएम केयर्स फंड’ से जुड़े आरोप बिल्कुल गलत थे।

इसीलिए आईपीसी की धारा 153,505 के तहत प्राथमिकी दर्ज करते हुए सोनिया गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की मांग की गई। यह एफआईआर प्रवीण नामक स्थानीय वकील ने दर्ज कराई है। जाहिर है कि यह राज्य की भाजपा सरकार के इशारे पर ही हुई है। इससे भड़की कांग्रेस ने मोदी सरकार पर कांग्रेस शासित राज्यों के साथ सौतेला बर्ताव करने का आरोप लगाया तथा पीएम केयर्स फंड के बारे में जानकारी सार्वजनिक करने की मांग भी की। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भाजपा की राजनीति से परेशान मुख्यिमंत्री ममता बैनर्जी ने भाजपा नेताओं कैलाश विजयवर्गीय तथा भाजपा सांसदों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवा दी।

एफआईआर के माध्यम से राजनीतिक बदले भुनाने का यह खेल और जगह भी खेला जा रहा है। फर्क इतना है कि बड़े नेता के खिलाफ एफआईआर करवाने से मीडिया में पब्लिसिटी ज्यादा मिल जाती है। एक फर्क और। राजनेताअोंके‍ ‍खिलाफ राजनेताओं के इशारे पर ऐसी एफआईआर पुलिस तुरंत दर्ज भी कर लेती है। वरना सामान्य फरियादी को अपनी जायज रपट लिखाने में भी पसीना आ जाता है। हमने देखा कि दिल्ली दंगों के बाद भड़काऊ बयान देने वाले चार भाजपा नेताअों के खिलाफ कोर्ट द्वारा आदेश दिए जाने के बाद भी एफआईआर नहीं लिखी गई। उल्टे इस पर नाराजी जताने वाले जज को ही चलता कर दिया गया।

एक तरफ राजनेताओं की यह राजनीतिक दुश्मनी तो दूसरी तरफ मीडिया को खामोश करने के लिए मानहानि कानून का सहारा लेने की निंदनीय प्रवृत्ति। इस संदर्भ में मद्रास हाईकोर्ट का फैसला अहम है। तमिलनाडु सरकार द्वारा साल 2011 से 2013 के बीच दायर मानहानि मुकदमों के खिलाफ मीडिया घरानों द्वारा दायर 25 याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अब्दुल कुद्दोज ने कहा कि, ‘यदि राज्य (स्टेट) सोशल मीडिया के समय में भी, जहां सार्वजनिक व्यक्तियों के खिलाफ गालियों की भरमार है, आपराधिक मानहानि का इस्तेमाल करता है तो सत्र न्यायालय इस तरह के मामलों से भर जाएंगे जिसमें कुछ मामले प्रतिशोधी प्रवृति के होंगे जिसका उद्देश्य विपक्षी दलों के साथ हिसाब बराबर करना होगा। राज्य को आपराधिक मानहानि के मुकदमे दायर करने में बेहद संयम और परिपक्वता दिखानी होगी। कोर्ट ने कहा कि मीडिया के खिलाफ आपराधिक मानहानि को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की सरकारों की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना होगा।’ मीडिया पर दायर ये मामले उस वक्त के हैं, जब राज्य की मुख्यमंत्री अम्मा जयललिता थीं।

इस बढ़ती कु-प्रवृत्ति से सवाल उठ रहा है कि आजादी के 73 साल बाद हम राजनीतिक रूप से सभ्य हो रहे या हैं या ज्यादा असभ्य और असहिष्णु बनते जा रहे हैं? एफआईआर की आड़ में विरोधियों को ठिकाने लगाने का जो तरीका अपनाया जाने लगा है, वह आधुनिक कम मध्यीयुगीन मानसिकता से भरा ज्यादा लगता है, जहां राजनीतिक विरोध की गली सजा-ए- मौत पर ही बंद होती थी। उसमें संवाद की कोई गुंजाइश न होती थी।

दोनो मामलों में समानता बदले की भावना के तहत कार्रवाई करने की है। यह साबित करने की कोशिश है कि आलोचना का मतलब केवल दुर्भावना है और इसकी सजा जेल है तथा ऐसी प्रतिरोधी आवाजों को निकलने का भी हक नहीं है। ऐसा इसलिए है ‍कि अब आलोचना को निंदा तथा सत्ता के काम में अड़ंगा डालने की वृत्ति माना जाने लगा है, जबकि राजनेता खुद अच्छी तरह जानते हैं कि वो जो आरोप लगाते हैं, यथार्थ के स्तर पर उसमें कितनी सचाई और कितनी सियासी रंगरेजी होती है। यहां सत्ता के समर्थन में भी एक ‘पाॅलिटिकल डिस्टेसिंग’ हमेशा कायम रखी जाती है, जो विचारधारागत भिन्नता की दृष्टि से ठीक भी है।

लेकिन सियासी विरोध कोई जाती दुश्मनी और खून का बदला खून से प्रेरित नहीं होता। फिर भी ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज कराने के पीछे सम्बन्धित नेता को पुलिस और अदालतों के चक्कर लगवाने तथा ‘कैसा मजा चखाया’ यह जताने का भाव निहित है। अर्थात आप ने खिलाफ बोलने की जुर्रत की तो थाने और कोर्ट की चप्पलें घिसनी ही होंगी। भले बाद में निर्दोष साबित हो जाओ, लेकिन आज तो हम तुम्हारा काम लगा देंगे। इस दुनिया में अपराधी भले एफआईआर से न डरते हों, लेकिन एक एफआईआर कितना राजनीतिक नुक्सान कर सकती है, यह मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यामंत्री उमा भारती से बेहतर कोई नहीं जानता।

गंभीर अपराधों को छोड़ दें तो महज सोशल मीडियाई आरोप-प्रत्यारोप के मामले में भी एफआईआर करना शुद्ध रूप से मानसिक प्रताड़ना का परियाचक है। ऐसे मामले कोर्ट में नहीं टिकते। लेकिन एक बार दर्ज एफआईआर को रद्द करवाना अथवा हटवाना उतना ही कठिन है, जितना कि चक्रव्यूह से बाहर ‍िनकलना। एफआईआर रद्द करने का अधिकार केवल हाई कोर्ट को है और उसकी भी एक प्रक्रिया है। और जरूरी नहीं कि एफआईआर हट ही जाए।

जाहिर है कि सोशल मीडिया के बयानों राजनीतिक आरोप- प्रत्यारोपों की बिना पर नेताओं को एफआईआर के जाल में फंसाना घटिया परपीड़क राजनीति का ‍परिचायक है। फिर चाहे वह किसी के खिलाफ क्यों न हों। यह ‘एफआईआरवाद’ इस बात का प्रतीक है कि राजनीति में अब सहनशीलता के लिए कोई जगह नहीं बची है। या तो आप हमारे दास हैं या फिर दुश्मन। और दुश्मन को सांस लेने का भी हक नहीं है।

अजय बोकिल/सुबह सबेरे से साभार

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