गुम हो गई ‘जागते रहो’ की आवाज, अब सिर्फ थाने में तैनाती

1990 तक के दशक का एक जमाना था जब रात को गांवों में जागते रहो की आवाज सुनाई पड़ती थी। उस वक्त गांव, टोले, मुहल्ले में पुलिस के सबसे छोटे कर्मी चौकीदार रातभर जागते रहो की आवाज लगाते थे। मुगलों के समय से चले आ रहे चौकीदारी का चलन मुगलों के पतन के बाद भी ग्रामीण शासन की परंपरा में चलता रहा। सन 1765 में जब अंग्रेजों ने जनता का दायित्व अपने ऊपर लिया तो वारेन हेस्टिंग्ज ने 1781 तक फौजदारों और ग्रामीण पुलिस की सहायता से पुलिस शासन की रूपरेखा बनाने के प्रयोग किए और इनमें सफल हुआ।

लार्ड कार्नवालिस का यह विश्वास था कि अपराधियों की रोकथाम के लिए वेतन भोगी स्थायी पुलिस दल की आवश्यकता है। इसके बाद अंग्रेजों ने प्रत्येक गांव में चौकीदार रखा जो टैक्स भी वसूल करते थे। चौकीदार सोते लोगों को जागते रहो की आवाज के साथ जगाते थे। भरोसा इतना कि लोग बेखौफ आराम की नींद सोते थे।

ऐसा नहीं कि अब चौकीदार का पद खत्म कर दिया गया। आज भी अधिकांश गांव में चौकीदार मौजूद हैं, लेकिन अब उनके काम बदल गये। कहीं ये थाने की शोभा बढ़ाते हैं तो कहीं बैंक और कहीं साहब के बंगले की। थाने में मुखबिर की भूमिका निभाते हुए ये अपने मुख्य कार्य से विमुख कर दिए गए हैं। गावों की गलियों में जागते रहो की आवाज के साथ लोगों को रात के प्रहर चौकीदारों द्वारा सजग रहने की पहरेदारी अब बीते जमाने की बात दिखाई देने लगी है। गांव के गलियों-मुहल्लों में गांव के बुजुर्गों का नाम लेते हुए चौकीदार आवाज लगाकर कहते थे हरि भाय, विजय भाय जागते रहो, मोहन दादा जागते रहो। इस आवाज को सुनकर जहां एक तरफ लोग जग जाते थे।

दूसरी तरफ चोर एवं अपराधी भी सजग हो जाते थे। गहरी नींद में सोए लोगों को चौकीदारों द्वारा की जा रही पहरेदारी न सिर्फ उनकी हिफाजत के लिए सजग होने को कहता था। बल्कि रोज निश्चित समय पर आने के कारण नियमित रूप से लोगों को समय की जानकारी भी मिल जाती थी। चौकीदारों को समाज के हर वर्ग के लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी होती थी और ये समाज की हर गतिविधियों पर निगरानी रखते थे। थाना प्रभारियों को इसकी सूचना उपलब्ध कराने का एक बेहतर जरिया हुआ करता था।

थाना प्रभारी भी चौकीदारों से प्राप्त सूचना का बेहतर इस्तेमाल किया करते थे। किसी भी घटना पर अग्रेतर कार्रवाई से पूर्व वे चौकीदारों से इसकी विस्तृत जानकारी प्राप्त करते थे। पर समय के साथ चौकीदारों की भूमिका भी बदल गई। अब ये चौकीदार बैंक, चौराहे तथा व्यावसायिक प्रतिष्ठान की पहरेदारी के लिए सिमट कर रह गए हैं। गांव की गलियों में अब रात की चौकीदारी की प्रथा समाप्त हो गई।

प्रतिदिन पहरेदारी की प्रथा समाप्त होने से गांव एवं शहरों में चोरी की घटना बढ़ रही हैं । बुजुर्गों का कहना है कि चौकीदारों द्वारा की जाने वाली रात्रि पहरेदारी से चोरी की घटना कम होती थी। लोग इनकी आवाज सुनकर सजग हो जाया करते थे और अपराधी प्रवृति के लोग भी सहम जाते थे। आज भी इस आवाज की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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