गूढ़ रहस्यों को समेटे है चौगान का किला, पर्यटन की असीम संभावना

करेली: जिले के रहस्यों में शामिल है चौगान के किले का रहस्य यहां के तालाब के बारे में अनेक किवदंती मशहूर है। करेली से 22 कि.मी दूर स्थित चौगान के किले को गौंछवाना राजवंश के उत्राधिकारी संग्राम सिंह ने वावनगढ़ के राजा के तौर पर 1543 में इसका निर्माण कराया था यहां का प्राचीन तालाब अन्य कलाकृतियां बेजोड है। 18 वीं सदी में मां नर्मदा व मां दुर्गा के अनन्य भक्त राजा प्रेमनारायण ने यहां की बागडोर संभाली। वह प्रतिदिन मां नर्मदा के स्नान के लिए जाते थे उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां नर्मदा इस तालाब में प्रगट हो गई यही कारण है कि भीषण गर्मी में भी यह तालाब नहीं डूबता है। जबकि तालाब किले में स्थित है और नीचे की तलहटी के जलस्त्रोत सूख जाते है।

14वीं सदी में निर्माण

राजगौंड़ शासन की स्थापना से जिले में नये व्यवस्थित शांतिपूर्ण एवं खुशहाली का दौर प्रारंभ होता है। इस राजवंश के उदय का श्रेय यादव राव (यदुराव) को दिया जाता है। जिनने चौदहवीं शताब्दी के अंतिम वर्षे में इसी राजवंश के प्रसिद्ध शासक संग्राम शाह (1400-1541) ने 52 गढ़ स्थापित कर अपने साम्राज्य को सु.ढ़ बनाया। नरसिंहपुर जिले में चौरागढ़ (चौगान) किले का निर्माण भी उनने ही कराया था जो रानी दुर्गावती के पुत्र वीरनारायण की वीरता का मूक साक्षी है। संग्राम शाह के उत्तराधिकारियों में दलपति शाह ने सात वर्ष शांति पूर्वक शासन किया। उसके पश्चात उसकी वीरांगना रानी दुर्गावती ने राज्य संभाला और अदम्य साहस एवं वीरता पूर्वक 16 वर्ष (1540-1564) शासन किया । सन्् 1564 में अकबर के सिपहसलार आतफ खां से युद्ध करते हुये रानी ने वीरगति पाई। नरसिंहपुर जिले में स्थित चौरागढ़ एक सु.ढ़ पहाड़ी किले के रूप में था जहां पहुंच कर आतफ खां ने राजकुमार वीरनारायण को घेर लिया और अंतत: कुटिल चालों से उनका वध कर दिया।

तालाब में पारस पत्थर

प्रकृति की बेजोड़ व अनुपम कलाकृति, दिलकश मनोरम वादियां, पर्वत श्रंखलाएं, घने जंगल के बीच नरसिंहपुर जिले के चौगान किले में भी काफी समय से यह किवदंती चर्चित है कि यहां के तालाब में पारस का पत्थर है अंग्रेजो ने इसे ढूंढने के लिए हाथी की सहायता ली थी तब जिस चेन से हाथी बांधा गया था तब पारसमणि तो नही मिली परन्तु उस चेन की दो कडियां सोने की हो गई थी। इतिहास में दर्ज जानकारी के अनुसार संग्राम शाह ने चौरागढ का किला स्थापित कराया था। संग्राम शाह जिसे अकबर नामा में अमानदास कहा है। ये गौड़ वंश के प्रथम इतिहास पुरूष थे। चौरागढ जिसे स्थानीय लोग चौगान कहते है के किले मे एक तालाब है। कहा जाता है वही के पास स्थित मंदिर है उसमे एक स्वामी जी आए थे उन्होने ही पारस पत्थर होने की बात कही थी।

अंगेजो ने किया था ध्वस्त

चौरागढ़ किले को जब अंग्रेजो ने मराठा पेशवाओ से छीना तो उन्होने इस डर से कि कही फिर से मराठा पेशवा इस पर कब्जा न कर ले तोप से इस किले को ध्वस्त कर दिया। यह खंडहर आज भी अपने वैभवशाली अतीत की कहानी कह रहा है। शासन के ध्यान न देने के कारण लोगो ने भी इसे छतिग्रस्त करने में कोई कोर कसर नही छोड़ी। यहां जाने का कोई सुगम मार्ग तो कोई नही है परन्तु करपगांव-शाहपुर व आमगांव बडा होते हुए पहुंचा जा सकता है।

दौड़ रहे कागजी घोड़े

जिले की धरोहर को संरक्षित करने के लिए वर्षो से कागजी घोडे दौड़ रहे है बैठको की अखबारों की कतरनें संहेजने के अलावा कुछ नहीं हुआ होता तो धरातल पर तो दिखता। पुरात्तव विभाग, पर्यटन विभाग जिला प्रशासन व जनप्रतिनिधियो ने कभी भी इस धरोहर को संजोने की दिशा में सजगता से कोई पहल नही की है। इस कारण यह किला पर्यटन केन्द्र नही बन पाया और न आगे बन पाने की कोई संभावना है क्योकि सब नकारा है इन्होने कभी भी इस दिशा कुछ नहीं किया न इनकी इच्छा शक्ति है और ना इनका इनका होमवर्क है ना कोई विजन है। जिससे इस क्षेत्र को पर्यटन केन्द्र बनाया जा सके।

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