गैर पुरुष से संबंध बनाने पर विवाहित महिला के खिलाफ मुकदमे से असहमत सरकार

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत गैर पुरुष से संबंध बनाने पर विवाहित महिला के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की मांग का विरोध किया है। केंद्र सरकार ने आज सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर इस याचिका को निरस्त करने की मांग की है।

केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि ये धारा शादी जैसी संस्था को बचाने का काम करता है। अगर इसमें छेड़छाड़ की गई तो ये वैवाहिक बंधन को नष्ट कर देगा। केंद्र के हलफनामे में कहा है कि इस मामले पर लॉ कमीशन लोगों से राय ले रही है। उसकी अंतिम रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। भारतीय दंड संहिता की धारा 497 में व्यभिचार के लिए सिर्फ मर्द को सज़ा का प्रावधान है। अगर विवाहित महिला गैर मर्द से संबंध बनाती है, तो सिर्फ उस मर्द पर मुकदमा चलता है, औरत पर नहीं।

8 दिसंबर 2017 को सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर पूछा था कि अपराध में बराबर का भागीदार होने के बावजूद महिला को भी पुरुष की तरह सजा क्यों नहीं दी जाए।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा था कि पति की सहमति के बाद भी दूसरे विवाहित पुरुष से संबंध बनाना इस क़ानून के दायरे में आना चाहिए। कोर्ट ने कहा था कि अगर पति की सहमति इस अपराध के परिणामों से बचाती है तो ये महिला को वस्तु बनाने की तरह है जिसकी अनुमति हमारा संविधान नहीं देता है।

केरल के एक्टिविस्ट जोसफ साइन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर भारतीय दंड संहिता की धारा 497 की वैधता को चुनौती दी है। उनका कहना है कि पहले के तीन फैसलों में इसे बरकरार रखा गया और संसद को कानून में संशोधन करने की छूट दी गई। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील कलीश्वरम राज ने कहा कि ये संविधान की धारा 14 और 15 का उल्लंघन है। महिला को कार्रवाई से संरक्षण मिला हुआ है। भले ही वो उकसाने वाली हो।

याचिका में कहा गया है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 पिछले 157 सालों से है लेकिन सजा केवल पुरुषों को ही होती है। धारा 497 के तहत एक विवाहिता द्वारा अपने पति के अलावा दूसरे विवाहित पुरुष के साथ संबंध बनाने पर सजा देने का प्रावधान है।

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