चिदंबरम और अय्यर के बयान कांग्रेस को कहां ले जाएंगे ?

लगता है शुरूआती असमंजस के बाद कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने के मुद्दे पर लाइन ले ली है। कांग्रेस ही नहीं पूरे यूपीए ने लाइन ले ली है। कहीं यह काफी ऊहापोह के बाद श्रीमती सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यसक्ष बनाए जाने के बाद का परिणाम तो नहीं ? धारा 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर के अंदरूनी हालात के बारे में सही सूचनाएं किसी के पास भी नहीं है, फिर भी इसको लेकर नया राजनीतिक खेल शुरू हो गया है। कांग्रेस और सहयोगी पार्टियां यह माहौल बनाने में जुट गई हैं कि धारा 370 का हटना भारत के लिए कयामत का सबब बनेगा तो दूसरी तरफ मोदी सरकार हर कीमत यह साबित करने में लगी है कि जम्मू-कश्मीर में सब अमन ओ अमान है। दोनो बातें अतिरेकपूर्ण लगती हैं। धारा 370 को लेकर सोनिया समर्थक कांग्रेस नेताओ ने जैसे बयान देने शुरू कर दिए हैं, उससे यह समझना मुश्किल है कि कांग्रेस को इससे आखिर क्या राजनीतिक लाभ होना है? ऐसे बयान कांग्रेस को मजबूत करने में मददगार होंगे या फिर उसे और गर्त में ले जाएंगे? इसी कड़ी में ताजा बयान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम का है।

तमिलनाडु में एक कार्यक्रम में उन्होंने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को हटाने के लिए मोदी सरकार की जमकर आलोचना की। यहां तक तो ठीक है। लेकिन आगे उन्होंने जो कहा, वह वाकई चिंतनीय है। चिदम्बरम बोले कि जम्मू-कश्मीर से धारा 370 इसलिए हटाई गई, क्योंकि यह राज्य मुस्लिम बहुल है। यदि जम्मू-कश्मीर हिंदू बहुल राज्य होता तो भाजपा उसका विशेष दर्जा नहीं छीनती। इस बयान पर भाजपा ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इसे गैर जिम्मेदाराना और भड़काऊ बताया है। भाजपा नेता और केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने धारा 370 पर केंद्र के फैसले के बचाव करते हुए कहा कि सरकार ने दशकों पहले कांग्रेस द्वारा की गई एक बहुत बड़ी गलती को सुधारा है। यह राष्ट्रहित में है। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने कहा कि यह कांग्रेस की ‘संकुचित मानसिकता’ है कि वह इस मुद्दे को हिंदू-मुस्लिम नजरिए से देख रही है।

तमिलनाडु में डीएमके की एक सहयोगी पार्टी एनडीएम के नेता वायको ने तो यहां तक कह दिया कि धारा 370 हटाने के बहुत गंभीर नतीजे होंगे। देश की आजादी को सौंवे साल में कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं रहेगा। उधर बाकी कमी कांग्रेस से पूर्व में निकाले गए और फिर लोकसभा चुनाव के पहले वापस ले लिए गए नेता मणिशंकर अय्यर ने अंग्रेजी अखबार में लेख लिखकर पूरी कर दी। उन्होंने कहा कि मोदी-शाह ने मिलकर हमारी उत्तरी सीमा पर एक फिलीस्तीन तैयार कर दिया है। जिस तरह फलस्तीनियों ने मनामा पैकेज ठुकरा दिया था, उसी तरह कश्मीरी भी मोदी सरकार के विकास का ऑफर ठुकराने जा रहे हैं।

बता दें कि मनामा पैकेज ‍फिलीस्तीनियों के आर्थिक पुनर्वास का अमेरिकी प्लान है। अय्यर का कहना है कि मोदी सरकार ने 400 स्थानीय नेताओं को हिरासत में रखा है। वहां कश्मीरियों के मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। राज्य में आत्माहीन नीति-निर्देशक तत्व लागू किए जा रहे हैं। करीब एक हफ्तेि पहले जब संसद में जम्मू कश्मीर से धारा 370 ‍हटाने का कांग्रेस ने विरोध किया था, तब पार्टी के ही कुछ बड़े नेताओ ने धारा 370 हटाने का खुल समर्थन देकर यह संदेश देने की कोशिश की कि इस मुद्दे पर पार्टी एकमत नहीं है। इनमें जनार्दन द्विवेदी और ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता शामिल थे।

पी.चिदम्बरम ने जो कहा, उसे थोड़ी देर के लिए सही मान लें तो सवाल यह उठता है कि ‍यदि कश्मीर घाटी हिंदू बहुल होती तो वहां धारा 370 लगाने की जरूरत ही क्यों पड़ती? उसका विलय तो बड़ी आसानी से भारत संघ में हो जाता। चूंकि मुस्लिम बहुल कश्मीर के भारत में विलय को लेकर विवाद की स्थिति बनी, इसलिए कश्मीरी भावनाओं के तुष्टीकरण के लिए धारा 370 लागू की गई। मानकर कि इससे उनके और शेष भारत के बीच अलगाव की भावना धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी। इसी तरह एमडीएमके नेता वायको का यह बयान भी खीज भरा है कि कश्मीर आने वाले सालों में भारत का ‍हिस्सा नहीं रहेगा। क्या वो कश्मीर की आड़ में तमिलनाडु के भारत से अलग होने की चेतावनी दे रहे हैं या फिर भारत को एक रखने के लिए कोई सकारात्मक चेतावनी दे रहे हैं? यह समझना भी मुश्किल है कि चिदम्बरम और वायको के बयान किस बात से प्रेरित हैं?

क्या उन्होंने भावी अनिष्ट को पढ़ लिया है या ‍िफर वो चाहते हैं कि वहां ऐसा ही हो? इन दोनो नेताओं को तमिलनाडु की राजनीति करनी है। उस तमिलनाडु में करनी है, जहां कश्मीर की खबरें अखबार के किसी कोने में या भीतर सिंगल काॅलम में छपती हैं। धारा 370 से तमिलनाडु के लोगों को कुछ खास लेना-देना नहीं रहा है। उधर एक और तमिलभाषी कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने तो मानो हर संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस को निपटाने की अघोषित सुपारी ले रखी है। अफसोस कि वो जितना धर्मनिरपेक्ष हुए जाते हैं, कांग्रेस उतनी ही हाशिए पर चली जाती है। अय्यर हर उस मौके पर बोलने से नहीं चूकते, जो कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से परीक्षा का क्षण होता है। दरअसल कश्मीर मुद्दे की फिलीस्तीन से तुलना करना ही गलत है। फिलीस्तीन समस्या दरअसल एक ही जमीन पर दो समूहों ( इजराइल और फिलीस्तीन ) के दावों का विवाद है।

जबकि कश्मीरियों को ( कश्मीरी पंडितों को छोड़कर ) किसी ने अपनी जमीन से बेदखल नहीं किया है न ही कर सकता है। अपने देश में ‍कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों वाली धारा 371 अभी भी 11 राज्यों में लागू है। इनमे 8 राज्य ऐसे हैं, जहां की आबादी हिंदू बहुल है। चिदम्बरम के चश्मे से इसे किस रूप में देखा जाए? लग तो ऐसा रहा है कि ये नेता कश्मीर के प्लेटफार्म पर तमिल राजनीति की रोटियां सेंकने में लगे हैं। हो सकता है ऐसा करने से उन्हें कोई निजी लाभ मिले भी, लेकिन भारत के बाकी हिस्सों में लोग कांग्रेस की सियासी कंगाली को देखकर हैरान हैं। राष्ट्रीय पार्टी होकर भी वह किसी क्षे‍त्रीय पार्टी की माफिक बर्ताव कर रही है। जबकि कश्मीर मुद्दे पर कोई भी बयान बेहद सावधानीपूर्वक देने की जरूरत है। कहीं ऐसा न हो कि कश्मीर तो अपनी जगह रहे, लेकिन कांग्रेस इस मुददे पर दो फाड़ हो जाए। यूं भी कांग्रेस में राहुल खेमा धारा 370 हटाने के विरोध में अपना राजनीतिक घाटा ही देख रहा है।

सुबह सबेरे से साभार

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