चुनावी गुप्तदान का पाप-पुण्य

राजनीतिक पार्टियों की चंदा उगाही में पारदर्शिता लाने के नाम पर मोदी सरकार द्वारा पिछले साल जारी इलेक्टोरल बांड (चुनावी बांड) को लेकर संसद के दोनों सदनों में सियासी बवाल मचा है। कारण पारदर्शिता के नाम पर इसकी अपारदर्शिता। चंदा कौन दे रहा है, कैसे दे रहा है, यह बताने की जरूरत नहीं। बैंकों से बांड खरीदो और राजनीतिक दलों को दो। पार्टी 15 दिनों में इस पैसे को अपने खाते में जमा कर लेती है। आम भाषा में कहें, तो यह एक तरह का सियासी ‘गुप्तदान’ है। न देने वाला बोलता है और न ही लेने वाला।

लोकसभा में कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने इलेक्टोरल बांड का मुद्दा उठाते हुए कहा कि इसके जरिए सरकारी भ्रष्टाचार को स्वीकृति दे दी गई है। बकौल तिवारी इस देश में 2017 से पहले (राजनीतिक चंदा उगाही का) एक मूलभूत ढांचा था। जिसके तहत धनी लोगों का पैसे के माध्यम में भारतीय राजनीति में हस्तक्षेप पर एक नियंत्रण था। लेकिन जबसे मोदी सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड जारी करने की व्यवस्था लागू की है, न दानदाता का पता है और न ही दान लेने वाले का। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘न्यू इंडिया’ की नई रिश्वत और कमीशनखोरी करार दिया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल का सवाल था कि इलेक्टोरल बॉन्ड का 95 फीसदी पैसा भाजपा को गया, यह क्यों हुआ?

गौरतलब है कि मोदी सरकार ने राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता लाने के दावे के साथ पिछले साल इलेक्टोरल बांड व्यवस्था की शुरुआत की थी। इसके लिए इलेक्टोरल बांड फाइनेंस एक्ट 2017 पारित किया गया था। तब कहा गया था कि इससे राजनीतिक पार्टियों के बटुए में साफ-सुथरा धन आएगा। मार्च 2018 से अक्टूबर 2019 तक देश में कुल 12,313 इलेक्टोरल बॉन्ड जारी किए गए, जिनके जरिए राजनीतिक दलों को 6,128 करोड़ रुपए का चंदा दिया गया। भाजपा की चुनाव आयोग को दी गई जानकारी के मुताबिक 2018-19 में उसे 800 करोड़ रुपए का चंदा मिला। पैसा ऑनलाइन पेमेंट और चेक से मिला था, जबकि कांग्रेस के हिस्से में 146 करोड़ का चंदा आया।

यहां सवाल पूछा जा सकता है कि राजनीतिक पार्टियों को चंदा आखिर मिलता कहां से है? इलेक्टोरल बांड आने के पहले यह पैसा किस तरीके से दिया और लिया जाता था? चुनावी बांड के पहले तक देश में राजनीतिक पार्टियां स्वैच्छिक दान, क्राउड फंडिंग, कूपन व प्रचार साहित्य के विक्रय, सदस्यता शुल्क और कॉरपोरेट चंदे से पैसा जुटाती थीं। तब भी माना जाता था कि राजनीतिक पाॢटयों को चंदे की आड़ में कालाधन खपाया जाता है। लिहाजा मोदी सरकार ने पारदॢशता के नाम पर राजनीतिक चंदे की प्रक्रिया में तीन बड़े बदलाव किए। इसके मुताबिक कोई भी राजनीतिक पार्टी विदेशी चंदा भी ले सकती है, कोई भी कंपनी मनचाही रकम चंदे के रूप में किसी भी पार्टी को दे सकती है तथा कोई भी व्यक्ति या कंपनी गुप्त रूप से चुनावी बॉन्ड के जरिए किसी पार्टी को चंदा दे सकती है। साथ ही बेनामी नकद चंदे की सीमा 20 हजार से घटाकर 2 हजार रुपए कर दी गई।

जाहिर है कि चंदे के रूप में पार्टियों के पास सबसे ज्यादा पैसा कॉरपोरेट क्षेत्र से आता है। यह चंदा भी कोई निस्वार्थ दान न होकर एक तरह का इन्वेस्टमेंट होता है, जिसके बदले में दानदाता सरकारों से दूसरे तमाम लाभ और रियायतें उठाता है। लेकिन सियासी दलों को दिया गया चंदा किन स्रोतों से आता है, इसकी सही जानकारी किसी को नहीं होती। पिछले दिनों आई एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉम्र्स (एडीआर) की रिपोर्ट में कहा गया कि देश की पांच राष्ट्रीय पार्टियों को चंदे के रूप में जो पैसा मिला, उसमें से 53 फीसदी रकम का स्रोत अज्ञात था। 36 फीसदी आय ही ज्ञात स्रोतों से आई थी। अज्ञात स्रोतों से मतलब कालाधन से है।

अब ये इलेक्टोरल या चुनावी बांड हैं क्या? चुनावी बॉन्ड एक ऐसा बॉन्ड है जिसमें एक करेंसी नोट लिखा रहता है, जिसमें उसकी वैल्यू होती है। यह बॉन्ड पैसा दान करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसके जरिए कोई भी व्यक्ति किसी राजनीतिक पार्टी, व्यक्ति या किसी संस्था को पैसे दान कर सकता है। चुनावी बॉन्ड 1 हजार, 10 हजार, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ रुपए के मूल्य में उपलब्ध हैं। सरकार के मुताबिक, चुनावी बांड पारदर्शी इसलिए है, क्योंकि दानदाता इसे डिजिटल या चेक के जरिए भुगतान करके ही खरीद सकता है। जिसके खाते में यह रकम जाएगी, उसका नाम भी पता चल जाएगा।

लेकिन इसमें यह कहीं भी स्पष्ट नहीं है कि बॉन्ड खरीदने के लिए पैसा किस स्रोत से आया। विडंबना यह है कि इलेक्टोरल बांड व्यवस्था वही भारतीय जनता पार्टी लेकर आई, जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में कालाधन को अहम मुद्दा बनाया था। लेकिन जो नई व्यवस्था आई वह खुद संदेह के घेरे में है। इस तरह धन जुटाने पर चुनाव आयोग ने भी आपत्ति की थी। इलेक्टोरल बॉन्ड बिल लाने से कुछ दिनों पहले ही रिजर्व बैंक ने एक चिट्ठी लिखकर सरकार को चेताया था कि सियासी पार्टियों द्वारा चंदा लेने की प्रचलित व्यवस्था को बदलने की जरूरत नहीं है। लेकिन सरकार ने आपत्ति को खारिज कर एक्ट में ही संशोधन कर दिया।

तमाम बवाल के बावजूद सरकार का मानना है कि चुनावी बॉन्ड एक बेहतर और पारदर्शी व्यवस्था है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि इसके जरिए सबसे ज्यादा चंदा भाजपा के खाते में ही आया है। वैसे भी जो पार्टी सत्ता में होती है, चंदा उसी को मिलता है। यहां सवाल यह है कि जिन राजनीतिक पार्टियों पर संवैधानिक व्यवस्था के तहत सरकारें चलाने की जिम्मेदारी होती है, वे स्वयं किसी भी तरह की पारदर्शिता और जवाबदेही से क्यों बचती हैं?

माना कि हिंदू और कुछ दूसरे धर्मों में भी ‘गुप्त दान’ पुण्यदायी माना गया है, लेकिन राजनीतिक मकसद से लिया गया ‘गुप्तदान’ तो शुद्ध सांसारिक कर्म है, जिसका मकसद केवल सत्ता के प्रति गहरी आसक्ति और उसे किसी भी तरीके से हासिल करने का आग्रह है। जिसका पुण्य फल नेताओं के अकाउंट में ही ज्यादा जमा होता है, बजाय जनता के। ऐसा ‘चुनावी गुप्तदान’ वाजिब होता अगर इससे चुनावी अर्थतंत्र में सचमुच कुछ पारदर्शिता आती। जो हो रहा है, उससे तो ऐसा नहीं लगता।

ट्रिब्यून डेस्क

नोट: अगर आपको यह खबर पसंद आई तो इसे शेयर करना न भूलें, देश-विदेश से जुड़ी ताजा अपडेट पाने के लिए कृपया The Lucknow Tribune के  Facebook  पेज को Like व Twitter पर Follow करना न भूलें...
Loading...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
E-Paper