छब्बीस ग्यारह की सालगिरह और प्रज्ञा का अठाइस ग्यारह…

भोपाल: शिवसेना नेता उर्ध्व ठाकरे के सीएम पद पर शपथ लेने के बाद ही अब जाकर महाराष्ट्र में शांति हुयी है वरना पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र में चल रही राजनीतिक उठापटक में पूरे देश में शांति छायी ही दिख रही है चौबीस घंटे चलने वाले हिन्दी न्यूज चैनलों को देखने के बाद तो ऐसा ही लग रहा था। दरअसल महाराष्ट्र की राजनीति की उठापटक किसी भी मायने में फिल्मी कहानी से कम नहीं लग रही थी जिसमें सत्ता संघर्ष, परिवार के झगडे, सत्ता पाने की महत्वाकांक्षा और विश्वासघात सब कुछ था। मुख्यमंत्री प्रदेश का चुना जाना है मगर इज़्ज़त राष्ट्रीय पार्टियों की दांव पर लगी थी शायद यही वजह रही कि महाराष्ट्र के चुनाव के बाद के बनते बिगडते समीकरण जनता की रूचि के विषय रहे और चैनल पर पूरे वक्त जगह पाते रहे। मगर इस बनते बिगडते समीकरण के दिनों में एक ऐसा दिन अनदेखा रह गया जिसकी साल भर प्रतीक्षा की जाती है। वो दिन था छब्बीस ग्यारह यानिकी छब्बीस नवंबर दो हजार आठ का वो हमला जिससे पूरी मुंबई दहल उठी थी। ग्यारह साल पहले के इस दिन को जब पाकिस्तान ये आये लश्करे तैयबा के नौ सदस्यों ने मुंबई के छह ठिकानों पर जो अप्रत्याशित हमला किया उसमें दो सौ से ज्यादा लोग मारे गये और तीन सौ से ज्यादा घायल हुये थे।

ये हमला देश की वाणिज्य राजधानी और सबसे जिंदा शहर पर था इस हमले के घाव आज ग्यारह साल बाद भी जिंदा हैं। आमतौर पर इस दिन पर शोक सभाएँ होती हैं जिनका तकरीबन सारे चैनल प्रसारण करते हैं मगर इस बार ये दिन इस राजनीतिक उठापटक के बीच बिना याद किये ही गुजर गया। टीवी चैनलों पर इतना जिक्र जरूर आया कि चुनाव के बाद दो दिन के लिये बने मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस छब्बीस ग्यारह के शहीदों के चित्रों पर फूल चढाने तो आये मगर नये और उपमुख्यमंत्री अजीत पवार उस समारोह से गायब रहकर अपने विधायकों की गिनती में व्यस्त रहे उधर शिवसेना कांग्रेस और एनसीपी के नेता भी अजित पवार को विरोधी खेमे से तोडने की रणनीति बनाने में ही लगे रहे। छब्बीस ग्यारह को आज यहाँ याद करने की एक वजह ये भी है कि इस हमले से जुडी दो किताबें मेरी शेल्फ में आज भी प्रमुखता से हैं जिनमें से एक किताब मैंने हाल ही में पढकर खत्म की है और उसका नशा आज भी दिमाग से उतरा नहीं है ये दो किताबें हैं एबीपी न्यूज के मेरे साथी पत्रकार जितेंद्र दीक्षित की छब्बीस ग्यारह वो 59 घंटे, एक रिपोर्टर का हलफनामा। और दूसरी किताब है टीवी पत्रकार प्रियदर्शन की जिंदगी लाइव, छब्बीस ग्यारह की वो रात जो कभी खत्म नहीं हुयी।

जितेद्र की किताब जहां करीब से देखी सच्चाई है तो प्रियदर्शन ने इस आतंकी घटना की पृप्टभूमि में टीवी चैनल में काम करने वालों की ऐसी कहानी लिखी है जो तेज गति से भागती है और किताब हाथ से छूटने नही देती। इस कहानी में कुछ सच्चाई है तो अधिकतर कल्पना। मगर 2009 में आयी जितेद्र की किताब दरअसल एक रिपोर्टर की उन तीन दिन की आंखों देखी दास्तान है जिसमें उसने हमले की शुरूआत से लेकर हमले के अंत तक उसकी रिपोर्टिंग की जिसमें उसने अपने सामने लोगों को मरते देखा और इस दरम्यान एकाध बार वो भी मरते मरते बचा। ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग करना उतना आसान नहीं होता जितनी आसानी से हम अपने घरों के डाइंग रूम में बैठकर देख लेते हैं। टीवी की रिपोर्टिग के दौरान हमें घटनास्थल पर हो रही गतिविधियों तो कैमरामने साथी की मदद से संयत और सुरक्षित होते हुये शूट कर दफतर भेजते ही रहनी होती है साथ ही घटनास्थल से ऐसे मौकों पर लंबे लंबे फोनो देना मतलब फोन पर घटना का ब्यौरा देना और थका देता है।

जितेंद्र ने इस किताब की भूमिका में लिखा भी है कि किताब लिखने की एक वजह यह भी है कि अब आतंकवाद कडवी सच्चाई है आने वाले दिनों में इस जैसे या इससे भी दुर्दांत हमले और हो सकते हैं तो ऐसे हालात में इस किताब को पढने के बाद दूसरे टीवी पत्रकार ऐसे हमलों की रिपोर्टिंग ओर बेहतर ढंग से सुरक्षित रहते हुये ओर सुरक्षा एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल कर विश्वसनीय तरीके से रिपोर्टिंग कर पायेगे। इतनी कडवी बात इतनी सच्चाई से कोई टीवी रिपोर्टर ही लिख सकता है। जितेंद्र की ये किताब पढकर वो हमला जिंदा हो उठता है और हमले के ब्यौरे पढ कई बार हम सिहर भी उठते हैं। मुंबई के जिन परिवारों ने अपने तकरीबन ढाई सौ से ज्यादा लोग खोये है उनको याद करने का दिन होता है छब्बीस ग्यारह। उसी छब्बीस ग्यारह की रात को आतंकियों की गोली से मुंबई पुलिस के एक बेहद काबिल अफसर हेमंत करकरे भी शहीद हुये थे। इधर मैं अपने लेपटाप पर बैठकर ग्राउंड रिपोर्ट लिख रहा हूं मेरे सामने टीवी चैनल पर भोपाल से बीजेपी की सांसद प्रज्ञा भारती के संसद में गोडसे के देशभक्त बताने वाले कथित बयानों को लेकर हो रहे हंगामे की खबर भी चल रही है।

इस साल मई में लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान प्रज्ञा भारती पहली बार निशाने पर तब ही आयीं थी जब उन्होंने बीजेपी कार्यकर्ताओं की एक बैठक में हेमंत करकरे की शहादत पर सवाल खडे कर उनके बारे में अनर्गल प्रलाप किया था। तब पता चला था कि बीजेपी की ये उम्मीदवार इस कदर वाचाल हैं कि उनको उनकी जबान पर काबू ही नही हैं। चुनाव जीतने के बाद अब वो हेमंत करकरे से और आगे बढकर बापू के हत्यारे का महिमामंडन करने मे लगी हैं वो भी उस संसद में जहंा बैठने का हक महात्मा गांधी ने ही दिलाया है। राप्टपिता और बहादुर पुलिस आफीसर की शहादत पर सवाल उठाने वाले लोग हमारी संसद में आ बैठे हैं ऐसे लोकतंत्र की कल्पना तो बापू ने भी नही की होगी। खैर मुंबई से लेकर दिल्ली में संसद में बैठे नेता भले ही भूल जायें मगर हम जनता उन छब्बीस ग्यारह के शहीदों के साथ ही हताहत हुये बेगुनाह लोगों को ना भूलें क्योकि इतिहास अपने को दोहराता है। और अपने को भूलने वालों को कभी माफ नहीं करता।

ब्रजेश राजपूत/सुबह सबेरे से साभार

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