जबलपुर मेडिकल काॅलेज में हैवान बने सीनियर, रैगिंग के नाम पर हैवानियत का नंगा नाच

मध्य प्रदेश का दूसरा सबसे पुराना मेडिकल काॅलेज नेताजी सुभाष चंद्र बोस चिकित्सा महाविद्यालय इन दिनों सीनियरों की बेरहम रैगिंग का गवाह बन गया है। जूनियरों से रैगिंग के नाम पर हैवानियत के नजारे आम हैं… प्रबंधन मूक दर्शक बना है और डरे हुए पीड़ित छात्र और उनके परिजन मेडिकल की पढ़ाई से तौबा करने का मन बना रहे हैं।

अब जरा सीनियर छात्रों की हैवानियत पर भी एक नजर डालिए…. रैगिंग के नाम पर बच्चों को पूरी तरह निर्वस्त्र करके बेल्टों से पीटा जा रहा है तो मुंह में हवा भरकर थप्पड़ों की बरसात की जा रही है ताकि बच्चों के कान से खून न निकल पाए। पढ़ाई छोड़ कर इंट्रोडक्शन के नाम पर हैवान बने सीनियर छात्रों ने बेरहमी की सारी सीमाएं पार कर दी हैं। डर के मारे छात्र प्रबंधन या पुलिस में शिकायत तो नहीं कर रहे हैं लेकिन जब यह बात उन्होंने अपने घरों में माता पिता को बताई और अपनी दुर्दशा बयां की तो माता पिता के रोंगटे खड़े हो गए और वे अपने बच्चों को काल कोठरी बने इस मेडिकल काॅलेज से बाहर निकालने का ताना बाना बुनने में लग गए हैं। कुछ पीड़ित बच्चों के माता पिता ने यह दास्तां हमसे बयां की है साथ ही यह भी निवेदन किया है कि हमारी पहचान उजागर न हो… कहीं बच्चों के साथ कोई अनहोनी न हो जाए…

जबलपुर के नेताजी सुभाष चंद्र मेडिकल काॅलेज में भयावह रैगिंग का यह कोई पहला कारनामा नहीं है इससे पहले भी 2017 में इसी काॅलेज के छात्रों की रैगिंग का एक वीडियो वाॅयरल हुआ था जिसमें 2016 बैच के सीनियर छात्रों ने 2017 बैच के छात्रों को नंगा करके नाचने पर मजबूर किया था… हालांकि वीडियो वाॅयरल होने के बाद हैवान छात्रों को सस्पेंड करते हुए उन्हें छात्रावास से बर्खास्त करने की कार्यवाही की गयी थी।

यह सब ऐसे समय हो रहा है जब सरकार और प्रशासन सबकी मंशा रैगिंग के मामले में जीरो टाॅलरेंस की है लेकिन इसे प्रबंधन की लापरवाही कही जाए या फिर सीनियरों को यह नंगा नाच खेलने की खुली छूट देना….. जिसके चलते चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे की पढ़ाई करने आने वाले छात्रों को यह सब भोगना पड़ रहा है। वैसे नेताजी सुभाष मेडिकल काॅलेज जबलपुर अपने कारनामों के लिए पहले से ही प्रसिद्ध है। एक बार यहां एक जिंदा मरीज को मृत घोषित करते हुए उसका डेथ सर्टिफिकेट भी जारी कर दिया गया था। स्वाईन फ्लू से पीड़ित महिला बेनीबाई नामदेव को यहां के चिकित्सकों ने मृत घोषित कर दिया लेकिन उनके परिजनों द्वारा मरीज की सांसे चलना बताए जाने पर दुबारा परीक्षण हुआ तो पता चला कि नेमीबाई मरी नहीं बल्कि जिंदा है। आनन फानन में परिजनों से डेथ सर्टीफिकेट लेकर फाड़ कर फेंक दिया गया था, जिसे लेकर खूब हंगामा हुआ था।

लेकिन यहां प्रथम वर्ष में पढ़ रहे तमाम ऐसे छात्रों की जिंदगी का सवाल है जो रात दिन पढ़ाई करने के बाद सफल हुए हैं और इस मेडिकल काॅलेज में उन्हें प्रवेश मिला है। रैगिंग का दंश कहीं उनकी पढ़ाई के साथ उनकी जिंदगी पर भी ग्रहण न लगा दे.. यह देखना प्रबंधन प्रशासन और पुलिस तीनों का ही काम है। देखना है इस भयावह बेरहम रैगिंग से कब और कैसे छात्रों और उनके परिजनों को निजात मिलता है।

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