जानिए श्रावण सोमवार का महत्व

हिन्दू धर्म के अनुसार श्रावण मास सर्वश्रे… मास माना गया है, क्योंकि यह मास भगवान शंकर का अतिप्रिय मास है, इस मास में जाप, अनुष्ठान, रूद्राभिषेक पूजन और भिन्न-भिन्न रूपों में भगवान शंकर की महिमा का गुणगान किया जाता है, श्रावण मास में सोमवार का विशेष महत्व होता है, श्रावण मास के समस्त सोमवारों को यह व्रत रखना चाहिए इस व्रत में शिव पार्वती गणेश, कार्तिक तथा नन्दी भगवान की पूजा की जाती है, जल, दूध, दही, चीनी, घी, मधु, पंचामृत, कलावा, यज्ञोपवीत, चन्दन, रोली चावल, फूल, विल्व पत्र, दूर्वा, विजया, अर्क, धतूरा, कमल-गट्टा, पान, सुपारी, लौंग-इलायची, पंचमेवा, धूप-दीप तथा दक्षिणा सहित भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। पूजन के बाद दिन में केवल एक बार भोजन करना चाहिए इन दिनों श्रावण मास के महात्मय की कथा सुननी चाहिए इस प्रकार व्रत करने से मनुष्य की समस्त मनोकामनाएँ पूरी होती है और अभीष्ठ फल की प्राप्ति होती है।
श्रावण मास में सोमवार का विशेष महत्व :-
श्रावण मास में भी सोमवार का विशेष महत्व होता है, वार प्रवृत्ति के अनुसार सोमवार भी हिमांषु अर्थात चन्द्रमा का ही दिन है। स्थूल रूप में अभिलक्षणा विधि से भी यदि देखा जाए तो चन्द्रमा की पूजा भी स्वयं भगवान शिव को स्वत: ही प्राप्त हो जाती है, क्योंकि चन्द्रमा का निवास भी भुजंग भूषण भगवान शिव का सिर ही है, रौद्र रूप धारी देवाधिदेव महादेव भस्माच्छादित देह वाले भूत भावन भगवान शिव जो जप-तप तथा पूजा आदि से प्रसन्न होकर भस्मासुर को ऐसा वरदान दे सकते हैं कि वह उन्हीं के लिए प्राणघातक बन गया, वह प्रसन्न होकर किसको क्या नहीं दे सकते हैं?
असुर कुलोत्पन्न कुछ यवनाचारी कहते हुए नजर आते हैं कि जो स्वयं भिखमंगा है, वह दूसरों को क्या दे सकता है? किन्तु संभवत: उसे या उन्हें यह नहीं मालूम कि किसी भी देहधारी का जीवन यदि है तो वह उन्हीं दयालु शिव की दया के कारण है अन्यथा समुद्र से निकला हलाहल पता नहीं कब का शरीरधारियों को जलाकर भस्म कर देता किन्तु दया निधान शिव ने उस अति उग्र विष को अपने कण्ठ में धारण कर समस्त जीव समुदाय की रक्षा की। उग्र आतप वाले अत्यंत भयंकर विष को अपने कण्ठ में धारण करके समस्त जगत की रक्षा के लिए उस विष को लेकर हिमाच्छादित हिमालय की पर्वत श्रृंखला में अपने निवास स्थान कैलाश को चले गए।
हलाहल विष से संयुव्त साक्षात मृत्यु स्वरूप भगवान शिव यदि समस्त जगत को जीवन प्रदान कर सकते हैं। यहाँ तक कि अपने जीवन तक को दाँव पर लगा सकते हैं तो उनके लिए और क्या अदेय ही रह जाता है? सांसारिक प्राणियों को इस विष का जरा भी आतप न पहुँचे इसको ध्यान में रखते हुए वे स्वयं बर्फीली चोटियों पर निवास करते हैं। विष की उग्रता को कम करने के लिए साथ में अन्य उपकारार्थ अपने सिर पर शीतल अमृतमयी जल किन्तु उग्रधारा वाली नदी गंगा को धारण कर रखा है, उस विष की उग्रता को कम करने के लिए अत्यंत ठंडी तासीर वाले हिमांशु अर्थात चन्द्रमा को धारण कर रखा है। और श्रावण मास आते-आते प्रचण्ड रश्मि-पुंज युव्त सूर्य ( वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ में किरणें उग्र आतपयुव्त होती हैं।) को भी अपने आगोश में शीतलता प्रदान करने लगते हैं। भगवान सूर्य और शिव की एकात्मकता का बहुत ही अच्छा निरूपण शिव पुराण में किया गया है।
अर्थात् भगवान सूर्य महेश्वर की मूर्ति हैं, उनका सुन्दर मण्डल दीप्तिमान है, वे निर्गुण होते हुए भी कल्याण मय गुणों से युव्त हैं, केवल गुणरूप हैं, निर्विकार, सबके आदि कारण और एकमात्र (अद्वितीय) हैं। यह सामान्य जगत उन्हीं की सृष्टि है, सृष्टि, पालन और संहार के प्रम से उनके कर्म असाधारण हैं, इस तरह वे तीन, चार और पाँच रूपों में विभव्त हैं, भगवान शिव के चौथे आवरण में अनुचरों सहित उनकी पूजा हुई है, वे शिव के प्रिय, शिव में ही आशव्त तथा शिव के चरणारविन्दों की अर्चना में तत्पर हैं, ऐसे सूर्यदेव शिवा और शिव की आज्ञा का सत्कार करके मुझे मंगल प्रदान करें तो ऐसे महान पावन सूर्य-शिव समागम वाले श्रावण माह में भगवान शिव की अल्प पूजा भी अमोघ पुण्य प्रदान करने वाली है तो इसमे आश्चर्य कैसा?
जैसा कि स्पष्ट है कि भगवान शिव पत्र-पुष्पादि से ही प्रसन्न हो जाते हैं तो यदि थोड़ी सी विशेष पूजा का सहारा लिया जाए तो अवश्य ही भोलेनाथ की अमोघ कृपा प्राप्त की जा सकती है। शनि की दशान्तर्दशा अथवा साढ़ेसाती से छुटकारा प्राप्त करने के लिए श्रावण मास में शिव पूजन से बढ़कर और कोई उपाय हो ही नहीं सकता है।
श्रावण मास में सोलह सोमवार का विशेष महत्व :-
श्रावण मास में भगवान त्रिलोकीनाथ, डमरूधर भगवान शिवशंकर की पूजा अर्चना का बहुत अधिक महत्व है, भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास में भव्त लोग उनका अनेक प्रकार से पूजन अभिषेक करते हैं। भगवान भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं, वह प्रसन्न होकर भव्तों की इच्छा पूर्ण करते हैं। इस छोटे से मंत्र से स्पष्ट होता है कि शिवजी को एक बिल्वपत्र चढ़ाने से तीन जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं। मंत्र इस प्रकार है-
‘‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्र्यायुधम् त्रिमग्न पाप-संहारमं एकं विल्वं शिवार्पणम”।।
महिलाएँ श्रावण मास से सोलह सोमवार का व्रत धारण (प्रारंभ) करती है, सुहागिन महिलाएँ अपने पति एवं पुत्र की रक्षा के लिए कुँवारी कन्या इच्छित वर प्राप्ति के लिए एवं अपने भाई पिता की उन्नति के लिए पूरी श्रद्धा के साथ व्रत धारण करती है। श्रावण से सोलह सोमवार कुल वृद्धि के लिए, लक्ष्मी प्राप्ति के लिए, सम्मान के लिए भी किया जाता है। इस व्रत को प्रारंभ करने के लिए विशेष मुहुर्त एवं शिवजी का निवास का ध्यान रखना चाहिए। शिव अलग-अलग स्थान पर रहते हैं, अत: जिस दिन से आप सोमवार व्रत प्रारंभ करें। शिवजी का निवास अवश्य देखे क्योंकि शिवजी वृषभ पर बैठे हो तो लक्ष्मी प्राप्ति, गौरी के साथ हो तो शुभ, कैलाश पर बैठे हो, तो आपको सौख्य की प्राप्ति होती है। सभा में बैठे हों, तो कुल वृद्धि होती है। भोजन कर रहे हो तो अन्न की प्राप्ति, प्रीड़ा कर रहे हो, तो संतापकारक होता है। यदि शिवजी श्मशान घाट में हो तो मृत्यु के समान होता है अत: सोच-विचार करके सोलह सोमवार प्रारंभ करे। इस प्रकार शिव निवास देखकर व्रत आरंभ किया जाता हैं, तो भगवान भोलेनाथ हर मनोकामना पूर्ण करते हैं, मैं भगवान भोलेनाथ को प्रणाम करता हूँ।

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