जानिये यूपी में महागठबंधन के पीछे का सच

दिल्ली ब्यूरो: जिस समय लखनऊ के ताज होटल में सपा -बसपा गठबंधन का ऐलान हो रहा था ,दिल्ली के सियासी हलकों में कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे। कांग्रेस के लोग अपनी तरह से इस गठबंधन कोदेख रहे थे तो बीजेपी के लोग चुप्पी मारे बहुत कुछ समझ रहे थे। दिल्ली के रामलीला मैदान में जहाँ अभी बीजेपी राष्ट्रीय परिषद् की बैठक चल रही है ,यूपी के गठबंधन की सुचना मिलते ही यूपी से जुड़े नेताओं के माथे पर बल पड़ गए। कई नेता बाहर निकले और अपने अपने लोगों से पूरी जानकारी मांगे। बीजेपी को अब लगने लगा है कि इस बार यूपी में उसकी घेराबंदी मजबूत होनी है। बीजेपी के एक नेता का कहनाहै कि ”इस बार की लड़ाई आसान नहीं है। सबके सामने चुनौती है। बीजेपी के पास फिर से सरकार में लौटने कीचुनौती है तो दूसरी पार्टियों के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है। ऐसे में अब वादों का खेल नहीं चलने वाला।

बता दें कि सपा -बसपा यूपी की कुल 80 सीटों में 38-38 सीटों चुनाव लड़ेंगे। जबकि बिना गठबंधन के दो सीटें कांग्रेस व दो सीटें कुछ अन्य पार्टियों के लिए छोड़ दी गई हैं।इस गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नही करने को लेकर कई तर्क दिए जा रहे हैं लेकिन अभी सबसे ज्यादा जरुरी यह जानना है कि आखिर एक दूसरे की घोर विरोधी होने बाद भी सपा -बसपा साथ साथ क्यों आये ? लोकसभा चुनाव 2014 में सपा को करीब 22 फीसदी वोट मिले थे। जबकि बसपा को 20 फीसदी वोट मिले थे। दोनों को जोड़ दें यह 42 फीसदी के पार पहुंच जाते हैं। दिलचस्प ये है कि भारतीय जनता पार्टी ने मोदी लहर में 42 फीसदी वोट ही पाया था। ऐसे में सपा-बसपा दो से पांच फीसदी वोट और जुटाती हैं तो सीटों में भारी अंतर डाल सकती हैं।

अव्वल तो लोकसभा चुनाव 2014 में सपा-बसपा को मिलाकर महज 5 सीटें मिली थीं। इसमें भी बसपा का योगदान शून्य सीट का है। लेकिन दूसरे बसपा 30 सीटों पर नंबर पर रही थी, जिनमें सपा उम्मीदवारों के वोट जोड़ते ही बीजेपी से कहीं आगे निकल जाते हैं। इसी तरह 22 सीटों पर सपा दूसरे नंबर रही थी। इनमें बसपा उम्मीदवारों के वोट जोड़ते ही बीजेपी बौनी हो जाती है।ऐसे में बीजेपी पांच, 30 व 22 कुल 57 सीटों का आंकड़ा पहुंचता है। लेकिन इस गठबंधन पहले ही फुलपुर, कैराना और गोरखपुर की सीटें बीजेपी से छीन ली हैं। ऐसे में यह आकड़ा 60 सीटों पर पहुंच जाता है।

अहम् बात यह भी है कि उत्तर प्रदेश में 12 फीसदी यादव, 22 फीसदी दलित और 18 फीसदी मुस्लिम हैं। इन तीनों वर्गों पर सपा-बसपा की मजबूत पकड़ है और इन्हें जोड़ दें तो यह वोट फीसदी 52 को पार कर जाती है। यह बीजेपी को मिले वोटों से कहीं ज्यादा है। बता दें कि साल 1991 विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने 221 सीटें जीती थीं। लेकिन 1993 में सपा-बसपा गठबंधन कर विवादित ढांचे के गिरने के बाद भी बीजेपी को बेदखल करने में सफल रही हैं। इस ऐतिहासिक पहलू को भी सपा-बसपा ध्यान में रखे हुए है।

और सबसे बड़ी बात है कि लोकसभा चुनाव 2014 में दोनों पार्टियों की करारी हार हुई थी। इसके अलावे विधानसभा चुनाव 2017 में भी सपा-बसपा की बड़ी हार हुई। इसे बाद 2018 फूलपुर, गोरखपुर और कैराना लोकसभा उपचुनावों में सपा-बसपा गठबंधन की सफलता से नए समीकरण बनते दिखे। बीजेपी का काट के तौर पर 2015 में बिहार के जद-यू/राजद/कांग्रेस महागठबंधन की जीत भी सपा -बसपा को आपस में मिलने कोविवास किया। इसके अलावे 2018 में कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस का पोस्ट एलाएंस का सफल होना भी सपा -बसपा की समझ को मजबूती दे दी। और सबसे बड़ी बात कि यूपी में मुस्लिम, यादव , एससी-एसटी वोट बैंक का बड़ा मजबूत आधार है जो सपा -बसपा के साथ है।

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