दस हजार का दम

आपने भी दस हजार कदम रोज चलने वाला हिसाब सुना होगा। शायद आपको यह लगता हो कि दस हजार कदम चलने का लक्ष्य बहुत हिसाब-किताब लगाकर या बरसों की रिसर्च के बाद तय किया गया होगा। मजे की बात यह है कि ऐसा कोई रिसर्च नहीं मौजूद है, जो यह कहे कि 8 या 12 नहीं, बल्कि 10 हजार कदम चलना ही सेहत के लिए मुफीद है। अगर आप नहीं जानते, तो यह जान लीजिए कि रोज दस हजार कदम चलने का यह नुस्खा एक मार्केटिंग अभियान का हिस्सा था। 1964 में जापान की राजधानी टोक्यो में हुए ओलंपिक खेलों के दौरान पीडोमीटर बनाने वाली एक कंपनी ने अपना प्रचार मैनपो-केई नाम के जुमले के साथ किया था। जापानी भाषा में मैन का मतलब होता है 10,000, पो का मतलब होता है कदम और केई का अर्थ होता है मीटर। पीडोमीटर बनाने वाली कंपनी का यह प्रचार अभियान बहुत कामयाब रहा था। तभी से लोगों के जेहन में बस गया कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए रोजाना दस हजार कदम पैदल चलना चाहिए।

उसके बाद से कई ऐसे रिसर्च किए गए हैं, जो पांच हजार बनाम दस हजार कदमों के फायदे और नुकसान का हिसाब लगाएं। लेकिन, ज्यादातर तजुर्बे इसी नतीजे पर पहुंचे कि रोजाना दस हजार कदम चलना ही बेहतर होता है। क्योंकि यह ज्यादा कदम का आंकड़ा है। लेकिन, हाल के दिनों तक पांच हजार से 10 हजार से बीच चले गए कदमों के फायदे-नुकसान के बारे में कोई रिसर्च नहीं हुई थी।

क्या कहती है रिसर्च : हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के प्रोफेसर आई-मिन ली ने अपनी टीम के साथ 16 हजार से ज्यादा महिलाओं के एक समूह पर रिसर्च किया। ये महिलाएं अपनी उम्र के सातवें दशक में थीं। इनके रोजाना की चहलकदमी का हिसाब लगाया गया। उनकी तुलना की गई। हर महिला को एक उपकरण पहनाया गया था, जो उसने हफ्ते भर तक पहना था, ताकि रोज चले गए फासले का हिसाब रखा जा सके। चार साल और तीन महीने बाद जब रिसर्चर ने इन महिलाओं से दोबारा संपर्क किया, तो इनमें से 504 की मौत हो गई थी। आपको क्या लगता है कि जो महिलाएं जीवित बची थीं, वे रोजाना कितना चलती थीं? दस हजार कदम या इससे भी ज्यादा? सच तो यह है कि जीवित बची महिलाओं ने रोज औसतन 5500 कदम ही चहलकदमी की थी। जिन महिलाओं ने रोज चार हजार से ज्यादा कदम चले, उनके 2700 कदम रोज चलने वाली महिलाओं से ज्यादा जीने की संभावना थी। आपको लग सकता है कि रोज जितना ज्यादा पैदल चला जाए, उतना ही बेहतर होगा। पर, यह सच नहीं है। 7500 कदम तक तो आपको फायदा नजर आ सकता है। लेकिन, इससे ज्यादा और इससे थोड़ा-बहुत कम चलने वालों के बीच ज्यादा फायदा-नुकसान नहीं देखा गया। इसका औसत आयु बढऩे से कोई ताल्लुक नहीं था।

चलने का सच : इस रिसर्च की कमी यह है कि हमें यह नहीं पता कि जिन बीमारियों से रिसर्च में शामिल 504 महिलाओं की मौत हुई, वे रिसर्च से पहले से थीं या बाद में उन्हें हुईं। रिसर्च में वही महिलाएं शामिल थीं, जो अपने घर से बाहर निकलकर चल सकती थीं। लोगों को अपनी सेहत की रेटिंग का अधिकार भी दे दिया गया था। पर शायद कुछ ऐसे लोग भी इस रिसर्च में शामिल थे, जो थोड़ा-बहुत तो पैदल चल सकते थे। लेकिन, ज्यादा दूरी तय करने में सक्षम नहीं थे। ऐसे में उनकी चहलकदमी से सेहत पर कोई खास फर्क नहीं पडऩे वाला था। लेकिन, 70 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं के लिए शायद रोज 7500 कदम पैदल चलना पर्याप्त है। कुछ विशेष हालात में इससे ज्यादा चलने से भी कुछ फायदे संभव हैं। जो लोग इससे ज्यादा चल सकते हैं, उनके बारे में कहा जा सकता है कि वे उम्र के इस पड़ाव पर आने से पहले से ही काफी सक्रिय रही थीं।

थकाऊ है हिसाब-किताब : रोज दस हजार कदम चलने का हिसाब लगाना भी बहुत थकाऊ हो सकता है। रोज यह लक्ष्य हासिल करने के लिए जितनी मेहनत करनी पड़ेगी, उससे भी लोग थक सकते हैं। अमेरिका की ड्यूक यूनिवॢसटी के
मनोवैज्ञानिक जॉर्डन एटकिन ने अपने तजुर्बे में पाया है कि बहुत से लोग दस हजार कदम से भी ज्यादा चलते थे, लेकिन वे पैदल चलने का आनंद नहीं उठा पाते थे। उन्हें पैदल चलना भी काम के बोझ जैसा लगता है। फिट से फिट इंसान के लिए भी रोज हर कदम का हिसाब लगाना थका सकता है। फिर, दस हजार कदम पूरे करने के बाद अगर वह और भी चल सकते हैं, तो भी लक्ष्य पूरा होने पर रुकने के लिए प्रेरित हो जाते हैं। कुल मिलाकर, अगर आपको लगता है कि हर कदम गिनने से और पैदल चलने की प्रेरणा मिलेगी, तो आप हिसाब लगाते रहें। लेकिन, याद रखिए कि दस हजार कदम गिनने ही नहीं, चलने का भी कोई खास फायदा नहीं है। आप वही लक्ष्य रखिए, जो हासिल कर सकें। वह दस हजार कदम से कम या ज्यादा भी हो सकता है।

ट्रिब्यून डेस्क

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