देवभूमि के इस मंदिर में चिट्ठी लिखने से हो जाती है मुरादें पूरी

भारत को “विविधता में एकता” वाला देश कहा जाता है। भारत में ऐसी ही कुछ विविधता आपको मंदिरो को लेकर भी देखने को मिलेगी। भारत में वैसे तो हजारों रहस्यमय मंदिर हैं लेकिन जिस मंदिर की हम आज बात करने जा रहे हैं वह अपने ‘न्याय’ के लिए विश्व प्रख्यात है। भारत में देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध उत्तराखंड में न्याय के देवता ‘गोलू देवता’ का एक ऐसा अद्भुत मंदिर है, जो अपने न्याय के लिए पूरे विश्व भर में प्रसिद्ध है।

गोलू देवता(Golu Devta- The God Of Justice) कत्यूरी राजवंश के राजा झोलूराई के इकलौते पुत्र हैं। जो साक्षात भैरव देवता का रूप है। मान्यता के अनुसार ऐसा माना जाता है कि जिस किसी लाचार व्यक्ति को दुनिया में कहीं न्याय नहीं मिलता उसे इस मंदिर में आकर न्याय मिलता है। श्रद्धालु (पीड़ित) चिट्ठी में अपने साथ हो रहे अन्याय को लिखते हैं और यह चिट्ठी पंडित जी को देते हैं, पंडित जी उनके साथ हो रहे अन्याय को चिट्ठी से पढ़कर ‘गोलू देवता’ को सुनाते हैं और उनके लिए न्याय की कामना करते हैं। उसके बाद इस चिट्ठी को मंदिर में टांग दिया जाता है श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण होने पर इस मंदिर में घंटियां बांधने का रिवाज़ है।

सभी जाति के लोगो का विवाह करने का है यहाँ प्रचलन

‘न्याय’ के इस मंदिर में हिंदू धर्म के विभिन्न जाति के लोग यहां आकर अपना विवाह संपन्न करते हैं और गोलू देवता से आशीर्वाद लेकर अपने विवाहित जीवन की मंगल कामना करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार कहा जाता है कि ‘गोलू देवता’ कत्यूरी राजवंश के राजा झालुराई की इकलौती संतान थे। राजा झालुराई एक उदार और प्रजाप्रिय राजा थे। राज्य में चारों ओर खुशहाली थी और राजा अपनी प्रजा का हर परकार से ध्यान रखते थे। राजा की सात रानियां थी परंतु एक भी रानी से उन्हें संतान प्राप्ति नही हुई। संतान प्राप्ति की चिंता को लेकर एक दिन राजा एक ज्योतिष से मिले जिसने राजा को भगवान भैरव की तपस्या करने को कहा। इसके बाद राजा ने घोर तपस्या कर भगवान भैरव को प्रसन्न किया, भगवान भैरव ने दर्शन देकर राजा के तपस्या का कारण पूछा। राजा ने कहा ‘प्रभु आप तो अंतर्यामी हैं आपको तो सब ज्ञात है मेरे पास सात रानियां होने के बावजूद भी एक भी रानी से मुझे संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ है। यह बात सुन भगवान भैरव ने कहा कि तुम एक उदारवादी राजा हो, परंतु तुम्हारे जीवन में संतान सुख नहीं है किन्तु तुमने मुझे प्रश्न कर संतान सुख का वरदान मांगा है तो मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा। मैं स्वयं तुम्हारे घर पुत्र स्वरूप जन्म लूंगा परंतु तुम्हें इसके लिए आठवां विवाह करना होगा।

यह सुन राजा की खुशी का ठिकाना न रहा और भगवान भैरव से पूछा कि इस संसार में ऐसी सौभाग्यशाली स्त्री कौन होगी जिसके गर्व से आप जन्म लेंगे। भगवान भैरव ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि, उचित समय आने पर तुम्हारा उससे स्वयं मिलाप हो जाएगा। कई दिन बीतने के पश्चात एक दिन जब राजा शिकार पर गए हुए थे। शिकार के पश्चात जब उन्हें प्यास लगी तो उन्होंने सेवकों से पानी मांगा, परंतु पानी खत्म हो चुका था। इसलिए सेवक पानी की तलाश में निकल गए और काफी देर तक न लौटे, तो राजा उनकी तलाश में एक तालाब के किनारे पहुंचे, जहां उनके सिपाही मूर्छित पड़े थे। यह देख राजा चौक गए और जैसे ही पानी पीने वाले थे, उनको एक स्त्री की आवाज सुनाई दी “रुक जाओ, इन सभी ने भी यही गलती की थी। यह तालाब मेरा है और मेरी आज्ञा के बिना तुम पानी नहीं ले सकते हो।

वह स्त्री बहुत सुंदर थी राजा उसे देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। राजा ने बताया कि वह इस राज्य के राजा झोलूराई हैं। राजा ने उस स्त्री से कहा किंतु ‘देवी आप कौन हैं?’ और इस वन में अकेले क्या कर रही है। स्त्री ने राजा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि मैं पंच देवताओं की बहन कलिंगा हूं। परंतु कलिंगा को इस बात पर विश्वास न हुआ की यह राजा झोलूराई हैं। उसने पास में लड़ रही दो भैंसों को देखते हुए राजा को कहा कि यदि आप इन दो भैंसों की लड़ाई छुड़ाने मैं सफल हुए तो में मान जाऊंगी कि आप ही राजा झोलूराई हो। राजा ने काफी प्रयास किये पर सफल न हो सके। यह देख कलिंगा ने स्वयं उन दो भैंसों को अलग कर उनकी लड़ाई समाप्त करवा दी। राजा यह देख काफी प्रभावित हुए और देवी कलिंगा को अपनी आठवीं पत्नी बनाने का मन ही मन ठान लिया । राजा ने विवाह का प्रस्ताव पंच देवताओं के सम्मुख रखा। पंच देवता भी राजा झालुराई की महानता से प्रभावित थे इसलिए दोनों का विवाह कर दिया गया।

कुछ ही वक्त बाद रानी कलिंगा गर्भवती हो गई यह देख सातों रानियां,रानी कलिंगा से जलने लगी,यदि कलिंगा की संतान हो गई तो राजा का हमारे प्रति लगाव कम हो जाएगा। सातों रानियों ने रानी कलिंगा की संतान को खत्म करने की योजना बनाई और रानी कलिंगा से कहा कि एक ज्योतिषी ने उन्हें बताया कि जन्म के वक्त अगर तुम अपनी संतान को देखोगे तो वह मर जाएगी। जल्दी ही प्रसव पीड़ा का दिन आया,रानी कलिंगा के आंखों पर पट्टी बांधी गई। रानी ने पुत्र को जन्म दिया। सातो रानियों ने बच्चे को गौशाला में फेंक दिया ताकि बच्चा पशुओं की पैरों तले आ कर मर जाए और रानी कलिंगा को बताया कि उसने सिलबट्टे (पत्थर) को जन्म दिया है और खून से लतपत पत्थर को रानी कलिंगा की गोद में दे दिया। रानी कलिंगा यह देखकर रो-रो कर बिलखने लगी। तो वहीं गौशाला में बच्चा बिल्कुल सुरक्षित था उसे एक खरोच तक नहीं आई। रानियों ने बच्चे को मारने के कई प्रयास किए परंतु सब विफल हुए। बाद में उन्होंने बच्चे को संदूक में बंद कर के काली नदी में बहा दिया। बहते-बहते वह बक्सा एक मछुआरे के जाल में जा फंसा । जैसे ही वहां मछुआरा उस बक्से को खोलता है तो उसमें से एक तेजस्वी बालक निकला हैं। उस मछुआरे की भी कोई संतान नहीं थी तो वह उस बालक को खुशी-खुशी अपनी पत्नी के पास ले जाता है और उसका अच्छे ढंग से पालन-पोषण करता है। जैसे-जैसे यह बालक बड़ा होता जाता है इसे अपने देवीय शक्तियों का आभास होने लगता है और उसे सब कुछ याद आ जाता है। ‘कि वह किसका पुत्र हैं? उसके साथ सातों रानियों ने क्या किया?’

सब कुछ ज्ञात होने के पश्चात लड़का अपने पिता मछुआरे के पास गया और घोड़े की मांग की मछुआरा गरीब था घोड़ा खरीद पाने में असमर्थ था तो वह काठ(लकड़ी) का घोड़ा ले आया। लड़का अपने भगवान भैरव के अवतार को जान चुका था जिस कारण उसमें देवीय व चमत्कारी शक्तियां आ चुकी थी। लड़के ने अपनी चमत्कारी शक्तियों से काठ(लकड़ी) के घोड़े को जीवित कर दिया और घोड़े को लेकर राजा झोलूराई के राज्य की ओर चल पड़ा। राजधानी के समीप स्थित एक तालाब के किनारे सातो रानियां बैठी हुई थी। सातों रानियों को देखकर लड़के ने अपने घोड़े को फिर से लकड़ी का घोड़ा बना दिया और रानियों के पास जाकर बोला कि “हटो यहां से, मेरे घोड़े को पानी पीना है” यह सुनकर सातों रानियां हैरान होकर बोली “भला कोई काठ का घोड़ा पानी कैसे पी सकता है” यह सुनकर लड़का ऊंचे स्वर में बोला “अगर इस राज्य की रानी एक सिलबट्टे(पत्थर) को जन्म दे सकती है, तो क्या मेरा लकड़ी का घोड़ा पानी नहीं पी सकता।” लड़के की बातों से सातों रानियाँ क्रोधित हो गई और उनमें कथित तौर पर विवाद हो गया। राजा झोलूराई को जैसे ही इस विवाद की खबर मिली उन्होंने उस बालक को अपने दरबार में बुला लिया। राजा ने मीठे स्वर में बालक से पूछा “बालक क्या आपको ज्ञात नहीं लकड़ी का घोड़ा पानी नहीं पी सकता” बालक ने राजा के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा राजन अगर इस राज्य की रानी सिलबट्टे (पत्थर) को जन्म दे सकती है तो क्या मेरा काठ का घोड़ा पानी नहीं पी सकता। साथ ही बालक ने राजा को अपनी संतान बता कर सातों रानियों की करतूतों का पर्दाफाश किया। पहले तो राजा को यकीन नहीं हुआ परंतु जब उस बालक ने राजा को भगवान भैरव और उनके बीच हुई वार्तालाप का व्याख्यान किया तो राजा को पूर्ण विश्वास हो गया। राजा ने क्रोधित होकर सातों रानियों को आजीवन कारावास की सजा दे डाली। सातों रानियाँ चीख-चीखकर राजा से क्षमा याचना मांगने लगी परंतु राजा ने उनकी एक न सुनी। परंतु बालक के कहने पर राजा ने उन्हें क्षमा कर दिया और इस बालक को अपने बेटे के तौर पर स्वीकार किया। रानी कलिंगा भी उस बालक को देखकर खुशी से गदगद हो गई। यही बालक आगे चलकर गोलू देवता,ग्वाल महाराज, गोलू बाला, गोरिया,गोलू देव और गौर भैरव शिव गुरु इत्यादि नामों से प्रसिद्ध हुए।

पूरे कुमाऊं क्षेत्र में गोलू देवता काफी प्रसिद्ध है प्रदेश में इनके कई सारे मंदिर हैं। गोलू देवता का प्रसिद्ध मंदिर उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के चितई नाम के स्थान पर स्थित है। यह मंदिर अल्मोड़ा शहर से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है मान्यता है कि इस मंदिर में जो कोई भी व्यक्ति मुराद लेकर आता है वह जरूर पूरी होती है साथ ही कोई अगर न्याय की आस में यहां आता है तो गोलू देवता के दर्शन करके उसको जल्दी न्याय की प्राप्ति होती है।

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