देश की सबसे संवेदनशील अनंतनाग सीट में तीन चरणों में होगा मतदान

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर की अनंतनाग संसदीय सीट देश की एकमात्र ऐसी सीट है, जहां चुनाव तीन चरणों में सम्पन्न कराया जाएगा। इस सीट के लिए तय किए गए चुनाव कार्यक्रम के अनुसार यहां तीसरे चरण में 23 अप्रैल को, चौथे चरण में 29 अप्रैल को और पांचवें चरण में 6 मई को मतदान होना है। इस सीट पर तीन हिस्सों में चुनाव कराए जाने का मकसद साफ है। यह सीट सुरक्षा के लिहाज से काफी संवेदनशील मानी जाती है। चुनाव आयोग ने जम्मू-कश्मीर सरकार और केंद्रीय गृह मंत्रालय से इस मुद्दे पर चर्चा की। इसके बाद तय किया गया कि अनंतनाग में चुनाव नहीं कराया जाना और बाकी के 5 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव कराने पर देश के भीतर और बाहर गलत संदेश जाएगा।

ऐसा होता है तो अनंतनाग के लोग इसे बड़ा मुद्दा बना सकते हैं। पुलवामा और शोपियां हाल के दिनों में सबसे ज्यादा आतंकी गतिविधि वाले क्षेत्र माने गए हैं। ये दोनों ही क्षेत्र अनंतनाग में आते हैं। यदि इस इलाके में चुनाव को स्थगित किया जाता है, तो वहां के लोगों के बीच बेहद नकारात्मक संदेश जाएगा। हाल ही में सरकार ने वहां की जमात-ए-इस्लामी को गैर-कानूनी संस्था घोषित किया और पिछले 15 दिन में इसके 400 से ज्यादा नेताओं और काडर गिरफ्तार किया।

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आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिजबुल मुजाहिद्दीन का गढ़ माना जाता है। सरकार को आशंका थी कि जमात की तरफ से इन संगठनों को चुनाव के दौरान अशांति फैलाने में मदद की जा सकती है। स्थानीय अथॉरिटीज ने चुनाव आयोग को इस बारे में जानकारी दी थी। शोपियां में सन 2018 में 43 आतंकवादी मारे गए थे। शोपियां को आतंकी संगठनों का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता है। सूत्रों का कहना है कि घाटी में इस समय 336 आतंकी सक्रिय हैं, जिनमें 204 अकेले दक्षिण कश्मीर में हैं।

सुरक्षा बलों से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अनंतनाग परंपरागत रूप से पीडीपी का सपॉर्ट बेस रहा है। पीडीपी के भाजपा से गठबंधन के बाद यहां के लोग पीडीपी से काफी नाराज हुए थे। सन 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से पीडीपी की महबूबा मुफ्ती ने 53.41 प्रतिशत मतों से चुनाव जीता था। सन 2016 में पीडीपी नेता मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत के बाद महबूबा सूबे की मुख्यमंत्री बनी और उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी।

महबूबा मुफ्ती के सीएम बनने के बाद यह सीट खाली हो गई। इसके बाद जुलाई 2016 में आतंकी बुराहन वानी की मौत के बाद वहां के हालात इतने खराब होते चले गए कि चुनाव आयोग वहां अब तक भी उप-चुनाव नहीं करा सका है। यहां तक कि 2017 में उपचुनाव का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन बाद में उसे रद्द करना पड़ा। 1996 के आम चुनाव में इस सीट पर 50 प्रतिशत से ज्यादा मतदान हुआ था। इसके बाद से अब तक यहां का वोट प्रतिशत लगातार गिरा है। राज्य के दूसरे हिस्सों की तुलना में यहां सबसे कम मतदान होता है।

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