देश के लोगों के खिलाफ गुजरात में एनआरसी !

अखिलेश अखिल

यहां यह समझने की आवश्यकता है कि आखिर एनआरसी है क्या? एनआरसी से पता चलता है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं। जिनके नाम इसमें शामिल नहीं होते हैं, उन्हें अवैध नागरिक माना जाता है। इसके हिसाब से 25 मार्च, 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है। असम पहला राज्य है जहां भारतीय नागरिकों के नाम शामिल करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है।बता दें ये रजिस्टर असम का निवासी होने का सर्टिफिकेट है।

अब मुद्दे की बात। गुजरात में जारी हिंसा और उत्तरभारतीयों के पलायन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देर से सही बड़ा बयान दिया है। सीएम नीतीश कुमार ने बिना नाम लिए हिंदी भाषियों पर हुई हिंसा पर कहा, ”यह देश, दुनिया, प्रकृति सबकी है, अगर किसी को लगता है कि वो ज्यादा ताकतवर है तो समझ लीजिए ये ताकत ज्यादा दिन नहीं रहने वाली।” नीतीश कुमार ने आगे कहा, “समाज में टकराव की स्थिति बन रही है, सोशल मीडिया के जरिए समाज में कटुता का माहौल बनाया जा रहा है, समाज में प्रेम और सद्भावना का माहौल होना चाहिए।”

जिस तरह से एक बच्ची के साथ दुराचार की घटना के बाद पूरे उत्तरा भारतियों को गुजरात में निशाना बनाया जा रहा है उससे दो सवाल पैदा हो रहे हैं। पहल सवाल तो यह है कि उत्तरा भारतियों पर हमलावर गुजराती समाज सबसे पहले बलात्कार की शिकार हुयी मासूम बच्ची को न्याय दिलाने के लिए क्या कर रहा है। लगता है हमला के फेर में उस मासूम बच्ची की फ़रियाद गौण सी हो गयी है जबकि पहली जरूरत यह है कि बलात्कारी को चिन्हित कर उसे कड़ी सजा दी जाय। भले ही उसकी सजा मौत ही क्यों हो। सजा ऐसी होनी चाहिए जिससे दुराचार करने वालों को सिख मिल जाए। लेकिन ऐसा होता दिखता नहीं। जिस तरह के माहौल बनाये जा रहे हैं उससे तो यही लगता है कि गुजरात में इस घटना से पहले कभी बलात्कार हुए ही नहीं। संभव है की यह पहला बलात्कार कांड होगा जिसे गैर गुजरातियों ने अंजाम दिया हो। कानून की धज्जियां गुजराती समाज खूब उड़ाते रहे हैं।

याद रहे गुजरात में पूर्ण शराबबंदी है लेकिन गुजरात शराब में नहाया रहता है। सबसे बड़ा दोहरा चरित्र गुजरात का यही दिखता है।पिछले साल ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने गुजरात में महिला सुरक्षा को लेकर सत्ताधारी भाजपा को निशाने पर लिया था। एक रैली में उन्होंने कहा, ‘क्यों राज्य के दो बड़े शहर- अहमदाबाद और सूरत महिलाओं के खिलाफ अपराध को लेकर शीर्ष 10 शहरों में शामिल हैं।’ कांग्रेस के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने यह बात नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के हवाले से कही। एनसीआरबी ने पूरे देश में अपराध की स्थिति को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है कि 2016 में देश के साथ-साथ राज्यों में अपराध की क्या स्थिति रही। इसके मुताबिक बीते साल गुजरात में आईपीसी और स्पेशल लोकल लॉ (एसएलएल) के तहत अपराध के कुल 4,35,422 मामले दर्ज किए गए। यह पूरे देश में दर्ज मामलों का नौ फीसदी है। इससे पहले साल राज्य में 4,34,043 मामले दर्ज किए गए थे।

आबादी (करीब छह करोड़) और आपराधिक मामलों की संख्या के अनुपात के लिहाज से देखें तो गुजरात देश में तीसरे पायदान पर है। दूसरी ओर, अपराध के मामले में देश के 19 बड़े शहरों की सूची में शामिल गुजरात के अहमदाबाद और सूरत में बीते साल दर्ज कुल मामलों की संख्या 31,762 और 56,943 है। अपराध दर (500 और 1243 प्रति लाख) के आधार पर ये दोनों शहर सूची में 13वें और पांचवें पायदान पर हैं। बीते साल पूरे राज्य में बलात्कार के कुल 982 मामले दर्ज किए गए। इनमें पीड़ितों की संख्या 986 है। इनमें से दो मामले पुलिस हिरासत से भी जुड़े हुए हैं। बलात्कार के अलावा छेड़छाड़ के कुल 87 मामले दर्ज किए गए जबकि आईपीसी की धारा 354-ए के तहत यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों की संख्या 473 रही। उधर, 2016 में शहरों में बलात्कार से जुड़े मामलों की करें तो अहमदाबाद में बलात्कार के 112 और सूरत में 121 मामले दर्ज किए गए हैं। इन शहरों में छेड़छाड़ के मामलों के आंकड़े क्रमश: 15 और शून्य हैं।

बीते साल अहमदाबाद के उना में दलितों के खिलाफ अत्याचार का मुद्दा देश भर में छाया रहा। राज्य में दलित उत्पीड़न की बात करें तो साल 2016 में इससे संबंधित कुल 1322 मामले दर्ज किए गए । इनमें से अहमदाबाद में 96 और सूरत में 19 मामले दर्ज हुए। दलित उत्पीड़न के लिहाज से गुजरात राज्यों में पांचवें पायदान पर है। इसके अलावा इस लिहाज से देश के 19 बड़े शहरों में अहमदाबाद सातवें और सूरत 16वें पायदान पर है। साल 2016 के दौरान राज्य में आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार से जुड़े कुल 281 मामले दर्ज किए गए हैं।

2016 में गुजरात में आईपीसी के तहत हत्या के कुल 1120 मामले दर्ज किए। हत्या के अलावा अपहरण के कुल 2784 मामले दर्ज हुए। हत्या से जुड़े अपराध के मामले में गुजरात देश में 27वें और अपहरण की घटनाओं के लिहाज से 23वें पायदान पर है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 8532 मामले दर्ज किए गए। 2015 में यह आंकड़ा 7777 था। महिलाओं के खिलाफ अपराध के लिहाज से गुजरात राज्यों के बीच 27वें पायदान पर है। साल 2016 में राज्य में दर्ज 1659 मामले दंगों से जुड़े हुए हैं। इनमें से 10 अहमदाबाद और नौ सूरत में दर्ज किए गए। ये आंकड़े पिछले सालों के हैं जिसे गुजराती समाज को देखना चाहिए और वे जो कर रहे हैं उस पर सोचना चाहिए।

और दुसरा सवाल है कि जो गुजराती समाज हिंदी भाषियों को बलात्कारी या फिर दुराचारी के आरोप में खदेड़ रहा है उसे अपने गिरेवान में भी झांकना चाहिए और यह भी देखना चाहिए कि पेट पालने और व्यवसाय करने के लिए गुजराती समाज भी बड़ी संख्या में दुनिया के अन्य देशों में भागे भागे फिर रहे हैं। गामिनत है कि उत्तर भारतीय रोटी की तलाश में अपने ही देश में भटक रहे हैं और गुजरती समाज दुनिया की खाक छान रहे हैं। फिर भारत का कोई भी आदमी जब देश के किसी भी इलाके में रोजगार करने को स्वतंत्र है तब उत्तरा भारतियों पर हमला कैसे जायज हो सकता है। यह हमला भारतीय राष्ट्र कानून के भी खिलाफ है। और ऐसा होता है तो फिर राष्ट्र की अवधारणा ही गलत है। गुजरात अभी इस अवधारणा को तोड़ता नजर आ रहा है।

जानकारी के मुताविक गुजरात से अभीतक लाखों बिहार तथा उत्तर प्रदेश के मजदुर पलायन कर चुके हैं और जानकारी के मुताविक जहां 500 से ज्यादा मजदुर गिरफ्तार हैं वही कई दर्जन मजदुर घायल है। दो लोगो के मारे जाने की भी खबर है। गुजरात में बच्ची के साथ जो भी हुआ उसकी घोर निंदा कीजानी चाहिए और दोषी को फांसी की सजा मिलनी चाहिए लेकिन जब कोई घटना राजनीति से प्रेरित हो जाय तब क्या कहा जाय। बता दें कि गुजरात में राजनीतिक दल भी काफी लम्बे समय से प्रवासियों के खिलाफ भावनाओं को भड़का रहे थे मगर गत वर्ष विधानसभा चुनावों के दौरान इन भावनाओं का इस्तेमाल किया गया। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता वोट हथियाने के लिए स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों का मुद्दा उठाते रहे हैं। यहां तक कि पाटीदार आंदोलन भी स्थानीय लोगों के लिए नौकरियों के अवसरों के अभाव की मांग पर आधारित था। यहां तक कि अब भाजपा नेता ‘बाहरी लोगों’ के खिलाफ हिंसा भड़काने के लिए कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकोर पर उंगलियां उठा रहे हैं।यद्यपि उन्होंने आरोप का खंडन किया है और कहा है कि वीडियो, जिसमें उन्हें अन्य राज्यों के लोगों के खिलाफ बोलते दिखाया गया है, ‘पुराना’ था। जब भाजपा के एक प्रवक्ता से पूछा गया कि यदि यह सच था तो उन्हें गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया तो उन्होंने बचाव में यह कहा कि मामले की कानूनी तौर पर समीक्षा की जा रही है। दूसरी ओर कांग्रेस सारा दोष राज्य की भाजपा सरकार पर डाल रही है।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है, जो संबंधित सरकारों की रोजगार पैदा कर पाने में विफलता को प्रतिबिंबित करती है। गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने भी हाल ही में घोषणा की थी कि वह राज्य में स्थानीय लोगों के लिए 80 प्रतिशत नौकरियां आरक्षित करने के लिए एक विधेयक पारित करेंगे। हालांकि यह गुजरात में प्रवासियों के प्रश्र तथा ‘बाहरी लोगों’ को नौकरियों पर प्रतिबंध के बारे में एक व्यंग्य के समान ही है। मामला गुजरात में उठाया जा रहा है जहां के निवासी देश से विदेशों में जाने वाले शीर्ष प्रवासियों में से एक हैं। वे अपने उद्यम तथा व्यापार कौशल के लिए जाने जाते हैं। इसके साथ ही उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि राज्य में मूलभूत ढांचा खड़ा करने का बड़ा श्रेय राज्य से बाहर के कार्यबल को जाता है।

गुजरात में जो हो रहा उसे जल्द नहीं रोका गया तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पहले ही ऐसे संकेत हैं कि कुछ राज्य किसी विशेष राज्य के बाहरी लोगों की संख्या रिकार्ड करने के लिए नैशनल रजिस्टर आफ सिटीजन्स की मांग कर रहे हैं। ऐसी मांग करने वालों में शामिल होने वाले नवीनतम हैं हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर। गुजरात भी उसी राह पर जाता दिख रहा है। और ऐसा हुआ तब देश को बचाना मुश्किल हो सकता है।

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