धारा 370 हटने व राजा रणजीतसिंह की प्रतिमा तोड़ने में क्या रिश्ता है?

कश्मीर में धारा 370 हटाने की गाज पाकिस्तान में महान सिख राजा रणजीतसिंह की प्रतिमा पर भी गिरी है। कश्मीर पर भारत के फैसले से गुस्साए दो पाक युवकों ने लाहौर में राजा रणजीतसिंह की उस प्रतिमा को खंडित कर दिया, जिसका अनावरण इसी साल जून में हुआ था। अच्छी बात यह है कि पाक पुलिस ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर ईष्या निंदा कानून के तहत मामला दर्ज किया है। साथ ही इस प्रतिमा की देख रेख करने वाले प्राधिकरण का है कि वो इस हरकत से हैरान है और ईद के बाद प्रतिमा की मरम्मत कर उसे पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा। इस खबर के बाद बहुतों के मन में सवाल उठे होंगे कि कश्मीर में धारा 370 हटाने और राजा रणजीतसिंह का क्या संबंध है? पाकिस्तान में उनकी प्रतिमा लगाना और भी हैरानी भरा है? ऐसा कैसे और क्यों हुआ? इसके पीछे क्या मंशा और कौन से कारण हैं?

पहले महाराजा रणजीतसिंह के बारे में जान लें। महाराजा रणजीतसिंह प्रतापी सिख राजा थे, जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप में उत्तर-पश्चिम में अपना विशाल साम्राज्य स्थापित किया। जो जम्मू कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान तक फैला था। लाहौर उनकी राजधानी थी। राजा रणजीतसिंह की सेनाओं ने दो बार कश्मीर पर हमला किया। पहला हमला वहां के जलवायु के कारण असफल रहा। दूसरा हमला 1818 में रणजीतसिंह के सिपह सालार मिश्र दीवान चंद के नेतृत्व में हुआ। उन्होंने अफगान शासक अहमद शाह दुर्रानी द्वारा कश्मीर में नियुक्त गवर्नर आजम खान को हराया।

साथ ही उस पर सालाना 70 लाख रूपए का हर्जाना भी लगाया। बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने दीवान मोतीराम को कश्मीर में अपना गर्वनर नियुक्त किया। रणजीतसिंह के देहांत के बाद राजा गुलाबसिंह ने 1846 में अंग्रेजों से संधि कर पूरा कश्मीर 75 लाख रूपए में खरीद लिया और वहां हिंदू डोगरा राजाओं का शासन शुरू हुआ, जो 1947 तक चला। दूसरी बात लाहौर में राजा रणजीतसिंह की प्रतिमा की स्थापना है। इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है। साथ ही मनुष्य की प्रतिमा बनाना भी वर्जित है। फिर भी वहां राजा रणजीतसिंह की प्रतिमा बनी और लगी तो इसके पीछे दो कारण है। पहले तो पाक सरकार वहां रह रहे सिखों को खुश करना चाहती थी ( इसकी आड़ में वह सिख आंतकवादियों को पोसना भी चाहती है)। महाराजा रणजीतसिंह की घोड़े पर सवार 9 फीट ऊंची प्रतिमा लाहौर के उस पुराने किले में स्थापित की गई है, जो कभी राजा रणजीतसिंह की सत्ता का केंद्र था।

यह प्रतिमा किले में स्थित माई जिदान हवेली के सिख गैलरी में लगाई गई है। प्रतिमा ‘वॉल्ड सिटी ऑफ लाहौर अथॉरिटी’ ने ब्रिटेन स्थित सिख हेरिटेज फाउंडेशन के सहयोग से तैयार की है। एक बात और। आंतकवादियों को पनाह देने और भारत विरोधी भावनाआंे को लगातार भड़काते रहने के बीच पाकिस्तान में एक नए किस्म का स्थानीय राष्ट्रवाद भी कुलबुलाने लगा है। हालांकि इसके समर्थकों की संख्या बहुत थोड़ी है और कट्टर इस्लामिक माहौल में उनकी आवाज तूती की तरह है। यह राष्ट्रवाद पंजाबी और सिंधी राष्ट्रवाद के रूप में है।

पाकिस्तान में बुद्धिजीवियों का एक छोटा वर्ग सोचता है कि उन्हें अपना इतिहास फिर से लिखना और आंकना चाहिए, क्योंकि आठवीं सदी में सिंध और 13 वीं सदी में पंजाब प्रांत पर इस्लाम की फतह से लेकर वहां अंग्रेजों के आने तक जो भी शासक रहे, वो सब विदेशी मुस्लिम थे। विदेशी इस अर्थ में कि उनमें से कोई भी खांटी सिंधी या पंजाबी नहीं था। यानी सिंध पर आखिरी सिंधी शासक राजा दाहिर था, तो पंजाब में आखिरी पंजाबी शासक 12 वीं सदी में राजा आनंदपाल था। उसके बाद इन प्रदेशों पर आक्रांता अरबों, पठानों, अफगानों ने ही राज किया।

इन नव राष्ट्रवादियों का मानना है कि ये तमाम विदेशी शासक पंजाब और सिंध के ‘हीरो’ कैसे हो सकते हैं? इस थ्योरी के हिसाब से राजा आनंदपाल के बाद महाराजा रणजीतसिंह ही पंजाब के पहले ऐसे शासक थे, जो पूरी तरह पंजाबी थे। इस दृष्टि से पंजाबियों को ( इनमे मुसलमान पंजाबी भी शामिल हैं) महाराजा रणजीतसिंह को ही अपना असली हीरो मानना चाहिए। लाहौर में महाराजा रणजीतसिंह की प्रतिमा भी इसी सोच का नतीजा थी कि पंजाबियों के हीरो भी पंजाबी ही होने चाहिए न कि कोई गैर पंजाबी। यही कारण है कि पाकिस्तान में इस प्रतिमा खंडन को गंभीरता से लिया गया। जिन दो युवकों ने यह प्रतिमा तोड़ी वो एक आंतकी संगठन तहरीक लब्बैक से जुड़े बताए जाते हैं, जिसे एक अतिवादी मौलाना नईम रिजवी चलाता है।

हो सकता है कश्मीर से धारा 370 हटाने को ये युवक राजा रणजीतसिंह की परोक्ष जीत मानते हों। अब बात कश्मीर की। इतिहास को देखें तो कश्मीर पर शासन करने वाला आखिरी खांटी कश्मीरी शासक लोहारा वंश का हिंदू राजा सहदेव था। आंतरिक अराजकता और कुशासन के कारण उसे एक मुस्लिम अफगान जनरल जिल्जू ने हरा दिया। सहदेव के बाद कुछ समय कश्मीर की सत्ता एक लद्दाखी रिन चेन के हाथ आई जो अपने प्रधानमंत्री शाह मीर के प्रभाव में मुसलमान बन गया। उसके बाद कश्मीर पर अफगानवंशी शाह मीरियों, फिर मुगलों, उसके बाद पठानों, फिर पंजाबियों और बाद में हिंदू डोगराओंका शासन रहा।

1947 में भारत संघ में सशर्त विलय के बाद कश्मीर को करीब सात सौ साल बाद वास्तव में कश्मीरी शासक मिला। अब कश्मीरी फिर ‘आजादी’ की मांग कर रहे हैं, जबकि भारत से जुड़ने पर ही सही अर्थों में सत्ता उनके हाथ आई है। ऐसे में यह ‘आजादी’ की यह मांग वास्तव में कश्मीरियों की आजादी को लेकर है या फिर भारत के कथित ‘हिंदू’ शासन से ‘मुसलमान कश्मीरियों’ की आजादी की है, इसको गहराई से समझना पड़ेगा। कश्मीर में इस्लाम सूफी संत लेकर आए। बाद में मुस्लिम शासकों ने इसे और फैलाया। करीब एक सौ साल में ही कश्मीर की नब्बे फीसदी आबादी मुसलमान हो गई, जिनमें कई कश्मीरी ब्राह्मण भी थे।

हालांकि उन्हें कश्मीर फिर भी नहीं छोड़ना पड़ा, क्योंकि इस्लाम का सूफी मत सहिष्णुता का पैरोकार रहा है, लेकिन बीते चार दशकों में दुनिया भर में फैल रहे कट्टर वहाबी इस्लाम का असर कश्मीर में भी हुआ और धार्मिक कट्टरता को कश्मीर की आजादी से जोड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि अपनी मूल संस्कृति को सहेजे कश्मीरी पंडितों को अपनी ही मातृभूमि से बेदखल होना पड़ा। जबकि असल कश्मीरियत के वारिस तो ये ही लोग हैं।

अब जब कश्मीरियत को बचाने और कश्मीर की आजादी की बात की जा रही है तो सवाल यह है कि कौन सी कश्मीरियत की आजादी की बात? क्या यह केवल राज सत्ता की आजादी है या फिर कश्मीर की सुदीर्घ सांस्कृतिक परंपराओं से अलग होने की आजादी है? यह सही है कि कश्मीरियों को ज्यादा समय तक दबाया नहीं जा सकता और न ही बीते सात सौ सालों में वहां हुए धार्मिक-सांस्कृतिक बदलावों को पलटा जा सकता है, लेकिन अंधे अलगाव की धारा में बहने के बजाए खुद कश्मीरियों को भी सोचना होगा कि उनके प्रेरणा बिंदु क्या होने चाहिए? ठीक उसी तरह कि जिस भावना से लाहौर में महाराजा रणजीतसिंह की प्रतिमा स्थापित की गई।

सुबह सबेरे से साभार

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