नाम में बहुत कुछ!

विलियम शेक्सपियर ने अपने प्रसिद्ध नाटक ‘रोमियो और जूलियट’ में लिखा है- नाम में क्या रखा है, गर गुलाब को हम किसी और नाम से पुकारें तो भी वह ऐसी ही खूबसूरत महक देगा। लेकिन शेक्सपियर अगर आज जीवित होते, तो उनकी सोच ही बदल जाती। गुलाब की परिभाषा भी बदल जाती और वह मजबूरन कह उठते, नाम में बहुत कुछ रखा है। इसके पीछे कारण यह है कि नाम को प्रतिष्ठा के साथ जोडऩे की प्रथा चल रही है। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ भारत में ही हो रहा है, बल्कि कई विकसित से लेकर विकासशील देश भी नाम बदलने में पीछे नहीं हैं। अब ईरान को ही ले लीजिए। वर्ष 1935 तक ईरान का नाम पर्शिया था। इसी तरह से कंबोडिया ने तो कई बार अपना नाम बदला है। इसके अलावा म्यांमार (पहले बर्मा), जॉर्डन (पहले ट्रांसजॉर्डन), इथोपिया (पहले अबीसीनिया), श्रीलंका (पहले सीलोन) जैसे देशों की लंबी लिस्ट है, जिन्होंने अपने नाम बदले। इन देशों के नाम बदलने की इस दौड़ में जहां राजनीतिक फैक्टर हावी था, तो धार्मिक फैक्टर भी पीछे नहीं था।

अब अपने देश की बात करते हैं। यहां तो राजनीतिक और धार्मिक के साथ जातिगत समीकरण कुछ इस कदर हावी हैं कि शायद ही किसी राज्य की सरकार ने अपने कार्यकाल में नाम ना बदले हों। जिस पार्टी की सरकार सत्ता में आती है, वह अपने आईकन के नाम पर शहरों, गांवों और कस्बों के ही नहीं, सड़कों और चौराहों तक के नाम बदलने का सिलसिला शुरू कर देती है। अब करीब डेढ़ साल पहले यूपी की सत्ता पर काबिज हुई योगी आदित्यनाथ सरकार को ही ले लीजिए। योगी सरकार ने हालिया जो नाम बदला है, वह है इलाहाबाद का। अब इलाहाबाद का नाम बदलकर प्रयागराज हो गया है। इसके पीछे योगी सरकार ने तर्क दिया है कि प्रयागराज पौराणिक और मूल नाम है। योगी सरकार की यह बात काफी हद तक सही भी है। कुंभ की नगरी प्रयागराज। संगम की नगरी प्रयागराज। कहते हैं कि यहां अमृत गिरा था और जो लोग संगम में स्नान करते हैं उनके सारे पाप दूर होते हैं। नाम बदलने पर हो-हल्ला होने पर योगी आदित्यनाथ ने कहा कि वही लोग नाम पर बवाल मचा रहे हैं, जिन्हें संस्कृति की समझ नहीं है। हमने जो किया है वह इतिहास का हिस्सा रहा है। प्रयागराज हमारी संस्कृति रही है। सनातन संस्कृति। ऐसी संस्कृति जिसका कभी क्षय नहीं होता। सदा चलते रहने वाली संस्कृति।

दरअसल, सैकड़ों साल पहले इलाहाबाद को प्रयागराज के रूप में ही जाना जाता था। लेकिन अब इलाहाबाद नाम कई ऐसी जगहों पर अंकित हो चुका है, जिसे बदलना शायद संभव ही नहीं है। हाईकोर्ट से लेकर बैंक तक कई ऐसे नाम इलाहाबाद के नाम पर हैं, जिन्हें बदलना इतना आसान नहीं है। यह तो बात इलाहाबाद (अब प्रयागराज) को लेकर है। लेकिन अगर बात नामों की चल पड़ी है, तो इसी शहर के कई ऐसे मोहल्ले और चौराहे हैं जिनके नाम मुगल या अंग्रेज शासकों के नाम पर हैं। हालांकि ऐसा केवल प्रयागराज के साथ ही नहीं है। पूरे यूपी में शायद ही कोई ऐसा शहर हो, जहां के मोहल्लों और सड़कों के नाम मुगल शासकों, नवाबों या फिर अंग्रेज शासकों के नाम पर ना हों। ऐसे में इलाहाबाद का नाम बदलने का मतलब समझ पाना काफी आसान है। दरअसल, कुंभ के ठीक पहले इस तरह नाम बदलने के पीछे सीधा राजनीतिक कारण यह है कि 2019 में लोकसभा चुनाव होने हैं और भाजपा इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करके इसका सीधा फायदा लेना चाहती है। हालांकि पहले के अनुभवों की अगर बात की जाए, तो शायद ही इस तरह नाम बदलने का फायदा किसी भी पार्टी को मिला हो।

अगर नाम बदलने को लेकर योगी सरकार की सफाई की बात की जाए, तो फिर सभी को अपने मूल नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। तो चलिए मूल नाम से पहचानने को लेकर ही बात करते हैं। अगर योगीजी को सब कुछ मूल नाम में वापस लाने की ही पहल करनी है, तो शुरुआत खुद से करनी चाहिए। दरअसल, देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को देश इसी नाम जानता और पहचानता है। बहुत से लोगों को तो केवल योगी नाम ही पता है। गेरुआधारी, तिलकधारी, मुंडन धारी व्यक्तित्व ही योगीजी की पहचान है। बहुत कम उम्र से राजनीति कर रहे हैं योगी जी। काबीलियत की बातें ऐसी करते हैं मानो सबकुछ मां शारदे ने उन्हें ही दे दिया है। उनके अनुकूल राजनीति चले तो कोई बात नहीं, लेकिन जैसे ही प्रतिकूल हुई, योगीजी के तेवर देखने लायक होते हैं। लेकिन जैसे ही हम अतीत में जाते हैं, असलियत कुछ और ही कहने लगती है। दरअसल, योगीजी का मूल नाम अजय सिंह बिष्ट है।

उनके माता-पिता ने उनका नाम अपने हिसाब से अजय ही रखा था। वही उनका मूल नाम है। वही उनकी संस्कृति और धर्म है। लेकिन उन्होंने अपना मूल नाम भूलकर नया नाम योगी आदित्यनाथ रख लिया है। अब जब मूल नाम में ही सब कुछ है, तो योगीजी को सबसे पहले अपना नाम बदलना चाहिए। क्योंकि अजय सिंह बिष्ट नाम उनके माता-पिता का दिया हुआ है। फिर योगीजी को दूसरा नाम रखने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या इलाहाबाद की तरह योगीजी को अपने माता-पिता का दिया नाम भी अच्छा नहीं लगता था? क्या राजनीतिक बिसात पर उनका मूल नाम फिट नहीं था? अगर ऐसा नहीं है, तो क्या इलाहाबाद की तरह योगी जी अपना मूल नाम फिर से अपनाने का साहस कर पाएंगे?

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