पुत्रमोह के चलते धर्मसंकट में फंसे राजनेता

हर राजनेता की चाहत होती है कि उसका उत्तराधिकार बेटे-बेटी या परिवार का कोई निकटतम सम्बंधी संभाले। कभी-कभी राजनीति में ऐसे हालात पैदा हो जाते हैं जब पुत्रमोह के चलते पिता धर्मसंकट में फंस जाते हैं। किसी के मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने की नौबत आ जाती है तो कोई दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ रहे अपने बेटे के खिलाफ प्रचार नहीं करने की बात करता है। यदि एक ही पार्टी हो तो धर्मसंकट की स्थिति पैदा नहीं होती लेकिन कभी-कभी ऐसा होता है कि पुत्र को राजनीति में स्थापित करने की चाह में पुत्र को हराने वाला विधायक लोकसभा चुनाव में पिता को चुनौती देते हुए ताल ठोंकता नजर आता है।

हिमाचल प्रदेश में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर की सरकार के मंत्री अनिल शर्मा को मंत्री पद से त्यागपत्र देने की नौबत इसलिए आ गयी क्योंकि उनके बेटे आश्रय शर्मा को कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार बना दिया। अनिल शर्मा के पिता पं. सुखराम ने अपने पोते आश्रय शर्मा सहित घर वापसी करते हुए कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली। आश्रय को कांग्रेस ने मंडी लोकसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में उतारा है। इस सीट पर सुखराम का अच्छा-खासा दबदबा है। अनिल शर्मा भी कांग्रेस सरकार में मंत्री थे लेकिन विधानसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया एवं मंत्री बन बैठे।

अनिल शर्मा का कहना था कि वे अपने बेटे के खिलाफ चुनाव प्रचार करने नहीं जायेंगे, लेकिन उन्हें उनके विधानसभा क्षेत्र मंडी में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर द्वारा कही गई यह बात चुभ गई कि मेरे मंत्री कहीं खो गये हैं अगर उनके ठिकाने के बारे में कुछ पता हो तो मुझे इससे अवगत कराए। शर्मा का कहना है कि मुख्यमंत्री की व्यंग्यात्मक टिप्पणियों के कारण ही उन्हें मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र देने के लिए मजबूर होना पड़ा है, क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि मुख्यंत्री का अब मुझमें भरोसा नहीं रहा। शर्मा पर यह दबाव था कि अपने बेटे के खिलाफ भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में चुनाव प्रचार करें। हालांकि वे दलबदल के चक्कर में न फंस जायें इसलिए उन्होंने साफ कर दिया कि वे भाजपा नहीं छोड़ रहे हैं। अब गेंद ठाकुर के पाले में है कि पुत्रमोह में फंसे पिता के साथ क्या सलूक करते है।

महाराष्ट्र के अहमद नगर सीट पर भी कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है जहां कांग्रेस विधायक दल के नेता राधाकृष्ण विखे चाहते थे कि उनके बेटे को कांग्रेस इस सीट से अपना उम्मीदवार बनाये लेकिन यह सीट गठबंधन के तहत राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कोटे में गई और भाजपा ने दलबदल कराकर उनके बेटे सुजय विखे को अहमद नगर से उम्मीदवार बना दिया। विखे ने साफ कहा है कि वे अपने बेटे के खिलाफ चुनाव प्रचार करने नहीं जायेंगे। अब यह तो बाद में ही पता चलेगा कि उन्हें इसकी कोई राजनीतिक कीमत तो नहीं चुकाना पड़ेगी, फिलहाल उन पर वहां प्रचार करने जाने के लिए पार्टी ने कोई दबाव नहीं डाला है। भाजपा ने एक परिवार से एक ही व्यक्ति को टिकट देने का अब तय कर लिया है इसलिए उसका अनुसरण करते हुए केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह ने इस्तीफे की पेशकश कर दी है क्योंकि उनके पुत्र बृजेन्द्र सिंह को भाजपा ने हिसार से चुनाव मैदान में उतारने का फैसला कर लिया है जो कि भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं और चुनाव लड़ने के लिए वीआरएस ले रहे हैं।

मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा राज्यसभा एवं लोकसभा सदस्य रहे सत्यव्रत चतुर्वेदी ने पुत्रमोह के चलते अपनी तरफ से कांग्रेस से किनारा कर लिया था और अपने बेटे के पक्ष में जमकर चुनाव प्रचार किया जो समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार थे। लेकिन वे अपने बेटे को चुनाव नहीं जिता पाये, अब लोकसभा चुनाव प्रचार तेज होने के साथ ही सत्यव्रत ने सफाई दी कि मैं कांग्रेस में पैदा हुआ हूं और कांग्रेस में ही मरुंगा। समाजवादी पार्टी का प्रचार जब उन्होंने खुलकर किया तो उसी समय कांग्रेस से उन्होंने किनारा कर लिया था। उन्होंने यह भी कहा कि मैं कांग्रेस में हूं या नहीं, लेकिन अब मुझे कांग्रेस में कोई पद नहीं चाहिए। यह स्पष्टीकरण सत्यव्रत ने उस समय दिया जब खजुराहो सीट से भाजपा प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की चर्चा होने लगी थी।

वरिष्ठ कांग्रेस नेता व पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया ने अपने बेटे विक्रांत भूरिया को हाल के विधानसभा चुनाव में झाबुआ से कांग्रेस उम्मीदवार बनवाया लेकिन वे उसे चुनाव नहीं जिता पाये। अब लोकसभा चुनाव में उनका मुकाबला भाजपा प्रत्याशी के रूप में उनके बेटे को हराने वाले विधायक जीएस डामोर से हो रहा है। डामोर पीएचई के पूर्व मुख्य अभियंता हैं और अब वे कांतिलाल से दो-दो हाथ करने जा रहे हैं।

सुबह सबेरे से साभार

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