पॉलटिक्स का फिल्मी कनेक्शन

हाल ही में फिल्मी जगत की मशहूर नायिका उर्मिला मातोंडकर कांग्रेस में शामिल हुईं, तो जयाप्रदा ने भाजपा का दामन थाम लिया। हेमा मालिनी, शत्रुघ्न सिन्हा, राज बब्बर, रवि किशन, दिनेशलाल यादव (निरहुआ) जैसे कई नाम ऐसे हैं, जिन्होंने फिल्मी दुनिया से अपनी पहचान बनाई है। दरअसल, जिस लोकसभा चुनाव में महज टिकट हासिल करने के लिए किसी स्थानीय या राष्ट्रीय नेता को जमीनी गतिविधियों के जरिए जनता के बीच अपने प्रति समर्थन पैदा करने से लेकर अपनी पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व तक को संतुष्ट करना पड़ता है, उसके लिए किसी फिल्मी कलाकार का सिर्फ सिनेमा के पर्दे पर मशहूर होना काफी मान लिया जाता है। सवाल है कि इसके पीछे राजनीतिक दलों की कौन-सी मजबूरी काम करती है जिस वजह से उन्हें जनता को आकर्षित करने के लिए फिल्मी या खेल की दुनिया के सितारों का सहारा लेना पड़ता है।
अब हेमा मालिनी को ही ले लीजिए।

हेमा मालिनी इस समय उत्तर प्रदेश की मथुरा सीट से सांसद हैं। भाजपा ने दोबारा उन्हें मथुरा से प्रत्याशी बनाया है। हेमा मालिनी फरवरी 2004 में भाजपा की आधिकारिक सदस्य बनी थीं। इसी तरह शत्रुघ्न सिन्हा 2009 और 2014 में भाजपा के टिकट पर बिहार के पटनासाहिब से सांसद रहे हैं। वह परिवार कल्याण और शिपिंग के केंद्रीय मंत्री भी रह चुके हैं। पिछले दिनों उन्होंने भाजपा को छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया। भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार मनोज तिवारी ने राजनीति में कम समय में खुद को स्थापित किया है। वह इस समय दिल्ली के भाजपा अध्यक्ष हैं। राजनीतिक शुरुआत उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ की। 2009 के चुनाव में वह एसपी के टिकट पर चुनाव लड़े और हार गए। 2014 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और उत्तरी दिल्ली से सांसद चुने गए। राजबब्बर ने फिल्मों से ज्यादा नाम राजनीति में कमाया है। राजनीति की शुरुआत तो उन्होंने जनता दल से की, लेकिन सफलता उन्हें सपा का सदस्य बनने के बाद मिली। तीन बार लोकसभा चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। 2008 में पाला बदला और कांग्रेस में शामिल हो गए और 2009 के चुनाव में फिर जीत दर्ज की। 2014 में उन्हें मोदी लहर के चलते हार झेलनी पड़ी। इस समय वह यूपी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं।

इसी तरह कभी सास-बहू की नोक-झोक वाले कार्यक्रम में बहू का किरदार निभाने वाली स्मृति जुबिन ईरानी अपनी मुखर आवाज के दम पर राजनीतिक गलियारे में अपने नाम को साबित करने में सफल रही हैं। 2004 में वह दिल्ली की चांदनी चौक सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन कांग्रेस के कपिल सिब्बल से वह हार गईं। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी को अमेठी की सीट से चुनौती दी, लेकिन हार गईं। इसके इनाम में भाजपा आलाकमान ने उन्हें राज्यसभा सांसद के साथ ही मंत्री पद से भी नवाजा। इस लोकसभा चुनाव के जरिए राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाले भोजपुरी फिल्मों के गायक व एक्टर दिनेश लाल यादव निरहुआ ने पहली बार में ही कठिन चुनौती स्वीकार की है। वह भाजपा के टिकट पर आजमगढ़ से यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के सामने हैं। उधर, बाबुल सुप्रियो पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से भाजपा के सांसद हैं।

दोबारा भी वह इसी सीट से मैदान में उतरे हैं। गायक से नेता बने बाबुल सुप्रियो बंगाल में भाजपा के सबसे बड़े चेहरों में से एक माने जाते हैं। दरअसल, राजनीतिक दलों को यह सबसे आसान लगता है कि सिनेमा के पर्दे से लोकप्रिय सितारों को चुनावी जंग में उतारा जाए। उनका मानना है कि जनता के एक बड़े हिस्से को इनके ग्लैमर की ओर खींचा जा सकता हैं। हालांकि इससे एक सवाल यह भी उठता है कि आखिर हमारी पार्टियों ने आम लोगों के बीच राजनीतिक सशक्तिकरण के मसले पर किस तरह काम किया है कि वे किसी नेता के सरोकार, ईमानदारी, जमीनी पकड़ आदि का आकलन करने के बजाय फिल्मों या खेल की दुनिया के सितारों की चकाचौंध से आकॢषत होकर वोट देते हैं?

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