पोस्टर ब्वॉय फेल

भाजपा के नए जादूगर के रूप में उभरे यूपी के सीएम संत योगी की कट्टरवादी सोच और नफरत भरे चुनावी भाषण पार्टी को जमींदोज कर गए। चुनावी हार के कई और कारण होंगे, लेकिन जिस तीव्रता से योगी पांच राज्यों को बांधते नजर आ रहे थे और भगवान के नाम पर हिंदू तुष्टिकरण का तमाशा दिखा रहे थे, वह काम नहीं आया। योगी की नाकामयाबी की दास्तान बता रहे हैं मुखियाजी

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों से एक बात तो साफ है कि इस बार मतदाताओं ने धार्मिक गोलबंदी की कोशिशों को नकार दिया है। इसके अलावा जहां पीएम मोदी की जुमलेबाजी को नकारा, वहीं यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की धार्मिक गोलबंदी की तमाम कोशिशों को भी तार-तार कर दिया। पार्टी ने पहली बार इस चुनाव में योगी आदित्यनाथ को अपना पोस्टर ब्वॉय बनाया था। उन्होंने पांचों राज्यों में 70 से अधिक रैलियां कीं। पूरा फोकस धार्मिक ध्रुवीकरण पर रखा। अली और बजरंगबली की तुलना कर हिंदू कार्ड खेला। मध्यप्रदेश से लेकर तेलंगाना तक, योगी ने चुनाव को इसी धारा में मोडऩे की कोशिश की। उनकी रैलियों में भीड़ भी आई, लेकिन परिणाम उस अनुरूप नहीं आए। योगी ने मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में 63 विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी सभाएं कीं। इनमें से केवल 26 सीटों पर भाजपा को बढ़त हासिल थी। योगी की सफलता दर 41 फीसदी रही। पिछली बार पार्टी इनमें से 47 सीटों पर जीती थी। अब इन प्रदेशों के हारे नेता कह रहे हैं कि योगी नहीं आते, तो शायद उनकी जीत हो जाती। राहुल गांधी का नौजवान, किसान का नारा योगी पर भारी पड़ गया।

भाजपा के नए जादूगर के रूप में उभरे यूपी के सीएम संत योगी की कट्टरवादी सोच और नफरत भरे चुनावी भाषण पार्टी को जमींदोज कर गए। चुनावी हार के कई और कारण होंगे, लेकिन जिस तीव्रता से योगी पांच राज्यों को बांधते नजर आ रहे थे और भगवान के नाम पर हिंदू तुष्टिकरण का तमाशा दिखा रहे थे, वह काम नहीं आया। भाजपा की यह हार योगी के नाम भी है। जिस भाजपा में एक से बढ़कर एक धुरंधर मंच से चिल्ला रहे थे और उससे भी ज्यादा योगी हिंदुत्व की ध्वज-पताका लिए घूम रहे थे, सब बेकार ही गया। बदनाम भी ऐसे हुए कि अब शायद ही भाजपा योगी को आगे के लिए स्टार प्रचारक बनाए। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि योगी जहां-जहां गए, भाजपा की लुटिया डूब गई।

चार राज्यों में योगी की 70 सभाएं हुईं। इनमें 26 सभाएं राजस्थान, 19 छतीसगढ़, 17 मध्य प्रदेश और 8 सभाएं तेलंगाना में थीं। योगी को खासकर उन क्षेत्रों में उतारा गया था, जहां कांग्रेस ने मुस्लिम उम्मीदवारों को खड़ा किया था। सब बेकार चला गया। छत्तीसगढ़ में तो जहां-जहां योगी के पांव पड़े भाजपा खत्म ही हो गई। मध्यप्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में उनके जहर भरे बयान से वे उम्मीदवार भी घायल हुए हैं और हारे हैं, जो सेफ माने जाते रहे हैं। पहले भाजपा के लोग चहक रहे थे और कह रहे थे कि जहां योगी हैं, वहीं भाजपा है। लेकिन परिणाम ने योगी की राजनीति को जमींदोज कर दिया। कुछ समय के बाद जब भाजपा अपनी हार का मंथन करेगी, तो उसकी निगाहें योगी की तरफ भी जाएंगी और उन पर भी बहस होगी। अब भाजपा लोकसभा चुनाव में योगी की सेवा लेगी भी या नहीं, यह सबसे बड़ा सवाल है।

बता दें कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री की कमान संभालते ही योगी आदित्यनाथ को भाजपा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकल्प के तौर देखा जाने लगा था। इसकी गवाही अन्य चुनावों के दौरान उनकी ताबड़तोड़ सभाएं देती हैं। लेकिन तथ्य उनके खिलाफ हैं। योगी आदित्यनाथ भाजपा के लिए लाभकारी साबित नहीं हो पा रहे हैं। योगी आदित्यनाथ ने जिन-जिन राज्यों में भाजपा के लिए ज्यादा प्रचार किया, पार्टी की वहां उतनी ही करारी शिकस्त हुई। योगी ने छत्तीसगढ़ में चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी ले रखी थी। सीएम रमन सिंह जब राजनंदगांव में अपनी सीट पर नामांकन करने निकले, तो उन्होंने योगी आदित्यनाथ का पैर छूकर उनकी आरती उतारवाई। इसके बाद से योगी ने प्रदेश में जमकर प्रचार किया। लेकिन ज्यादातर उन सीटों पर भाजपा को हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह राजस्थान में योगी आदित्यनाथ को स्टार प्रचारक बनाया गया था, लेकिन वहां भी भाजपा को कोई फायदा नहीं मिला।

कर्नाटक में जब योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब यूपी में लोग तूफान से हताहत होकर अस्पतालों में दम तोड़ रहे थे। कांग्रेस के सीएम रहे सिद्धारमैया ने इसके लिए उन्हें लताड़ा था। बाद में उन्हें प्रचार बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था। वहां भी योगी के प्रचार वाली सीटों पर भाजपा को हार का सामना पड़ा था। योगी आदित्यनाथ को सीएम बनने के बाद उपचुनाव में अपनी ही लोकसभा सीट बसपा और सपा के हाथों गंवानी पड़ी। गोरखपुर और फूलपुर सीटों पर भाजपा की हार से ही पतन का दौर शुरू हुआ। इसके अलावा योगी ने इस साल हुए त्रिपुरा विधानसभा चुनावों में प्रचार किया था। लेकिन भाजपा की जीत के चलते वहां उनके प्रदर्शन का ज्यादा मुआयना नहीं किया गया। इसी तरह जब योगी गुजरात में प्रचार के लिए उतरे, तो भाजपा की सीटें कम हो गईं।

भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हार-जीत अलग बात है, लेकिन योगी जी और यहां तक कि मोदी जी जितना बोल रहे हैं वह सब ठीक नहीं। खासकर योगी जी ने बहुत खराब काम किया। हालांकि पार्टी के निर्देश के मुताबिक ही वह सभाओं में बोलते थे, लेकिन जनता उसे स्वीकार नहीं कर पाई। दांव उल्टा पड़ गया।’ करीब 20-22 महीने पहले योगी ने जब उत्तर प्रदेश की कमान संभाली थी, तब उन्होंने अपनी छवि से एकदम उलट एक ऐतिहासिक बयान दिया था-‘विकास सबका होगा, तुष्टिकरण किसी का नहीं होगा।’ लेकिन, उनके लगभग दो साल के कार्यकाल और सियासत को देखने-समझने पर इतना जरूर समझ आता है कि वह खुल कर हिंदू तुष्टिकरण पर जोर दे रहे हैं। हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए उन्होंने फटाफट शहरों के नाम तक बदल दिए। हिंदुओं के प्रति उनकी निष्टा देखते हुए भाजपा ने छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में योगी को स्टार प्रचारक के तौर पर उतारा। योगी ने भी अपना कर्तव्य बखूबी निभाया और अपनी फायर ब्रांड वाली इमेज बरकरार रखते हुए धड़ाधड़ रैलियां कीं। राममंदिर के मुद्दे को भी उठाया, लेकिन जनता ने उनकी इस जबरदस्त कैंपेन को सिरे से नकार दिया।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह पिछले 15 साल से जनता की सेवा कर रहे थे। चौथी बार सीएम की रेस में उनके 15 साल का रिपोर्ट कार्ड ही काफी होना चाहिए था, लेकिन ‘चाउर (चावल) बाबा’ का चार्म शायद इस बार थोड़ा फीका रह गया, जिसे ठीक करने के लिए योगी को मैदान में उतरना पड़ा। यहां भी वह राममंदिर का आलाप छेडऩा नहीं भूले। जो राम का नहीं, वह किसी काम का नहीं से लेकर बजरंग बली तक को चुनाव में घसीट लाए। योगी ने एक सभा में कहा, ’20 नवम्बर को वोट पडऩे हैं। यह दिन मंगलवार है। मंगलवार बजरंगबली का दिन है। बजरंगबली राम के भक्त हैं। राज्य में नक्सलवाद कांग्रेस की देन है, जिसने राममंदिर निर्माण में बाधा पहुंचाई, उनको समर्थन कर वोट खराब नहीं करना है। उत्तर प्रदेश के अयोध्या में मंदिर बनना है।’ लोग तब तालियां बजा रहे थे, लेकिन वोट नहीं दिया।

राजस्थान में तो वसुंधरा राजे का सियासी गणित पहले से ही गड़बड़ा रहा था। राजस्थान में गूंजते ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, पर रानी तेरी खैर नहीं’ जैसे नारों ने पहले ही संकेत दे दिया था कि इस बार महारानी का सिंहासन डोलने वाला है। राजस्थान में वसुंधरा की खराब हालत देख भाजपा ने योगी की कई सभाएं कराईं। बैठकें कीं। बजरंगबली की जाति से लेकर गोत्र पर बहस सामने आई। योगी सबके निशाने पर आए और जिस समाज का वोट पाने के लिए योगी ने हनुमानजी को दलित बताया, वही समाज भाजपा को जमींदोज कर गया।

तेलंगाना में भी योगी ने हिंदू कार्ड खेलने की पूरी कोशिश की। जिस तरह के भड़काऊ भाषण ओवैसी ब्रदर्स देते हैं, कुछ वैसा ही योगी ने भी तेलंगाना में किया। हिंदू वोटरों को साधने की दृष्टि से योगी ने पूरे जोश से भाषण दिया कि ‘अगर भाजपा सत्ता में आई, तो ओवैसी को तेलंगाना छोड़कर भागना होगा, ठीक वैसे ही जैसे निजाम को हैदराबाद से बाहर भागना पड़ा था।’ इतना ही नहीं, राज्यों का नाम बदलने की कला में माहिर योगी ने वहां की जनता से वादा किया कि अगर तेलंगाना में भाजपा की सरकार बनती है, तो वह हैदराबाद का नाम बदलकर भाग्यनगर कर देंगे। लेकिन, नतीजों में साफ हो गया कि वहां की जनता को हैदराबाद नाम ही पसंद है।

पीएम मोदी के बाद भाजपा को लग रहा था कि सीम योगी पर भविष्य का दांव खेला जा सकता है। संघ और तमाम हिंदूवादी संगठन भी योगी को कट्टरवादी हिंदूवादी नेता के रूप में आगे बढ़ा रहे थे। उन्हें लग रहा था कि जो काम मोदी नहीं कर पाए, योगी करेंगे। भाजपा के तमाम एजेंडे को योगी आगे बढ़ा सकते हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह से योगी के चेहरे को नकारा गया है, उसके चलते अब भाजपा शायद ही योगी को मैदान में उतारे।

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