प्रदूषण की मार, गंगा का 51 फीसदी हिस्सा जीव-जंतुओं के रहने लायक नहीं

इलाहाबाद: केंद्र की सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले गंगा पुनर्जीवन अभियान का उद्घोष किया था। प्रधानमत्री ने गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने के लिए नमामि गंगे, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा जैसे बड़े अभियान चलाने की घोषणा की थी। लेकिन उनके सत्ता में आने के बाद भी गंगा की स्थिति में कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ा है। भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा का 51 फीसदी हिस्सा इतना प्रदूषित हो चुका है कि जलीय जीव और वनस्पतियां समाप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत भारतीय वन्य जीव संस्थान के वैज्ञानिक गंगा की जैवविवधिता के संरक्षण के साथ ही गंगा के जीर्णोद्धार के लिए काम कर रहे हैं।

इसके लिए संस्थान के 25 वैज्ञानिक और 50 शोधार्थी गंगा में पाई जाने वाली वनस्पतियों, जलीय जीवों समेत विभिन्न विषयों का अध्ययन कर रहे हैं। दो साल से चल रहे इस अध्ययन के दौरान पाया गया कि पांच राज्यों में 2525 किलोमीटर लंबा रास्ता तय करने वाली गंगा के 49 फीसदी क्षेत्र में ही जैवविवधिता बची है। यानि गंगा यहां इतनी प्रदूषित नहीं है कि जीव-जंतुओं के लिए उसका पानी ज़हर हो जाए। यूपी के नरौरा से लेकर इलाहाबाद तक के करीब छह सौ किलोमीटर हिस्से में गंगा पर भारी खतरा मंडरा रहा है। मानव आबादी के बढ़ते दबाव और औधोगिक कचरे के कारण यहां जलीय जीवों का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है।

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गंगा में डॉल्फिन की मौजूदगी पर शोध कर रहे शोधार्थी गौरा चंद्रा दास की रिपोर्ट के अनुसार बेस लाइन सर्वे में बिजनौर से लेकर गंगासागर तक 1400 डॉल्फिन पाई गईं, लेकिन, कानपुर के करीब चालीस किलोमीटर हिस्से में एक भी डॉल्फिन नहीं हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक डॉक्टर एसए हुसैन नरौरा से इलाहाबाद के बीच भारी प्रदूषण की दो वजहें बताते हैं। पहला तो इंडस्ट्रियल बेल्ट का बहुत सारा कचरा गंगा में गिरता। दूसरा इस बेल्ट में नदी में पानी भी कम है। डॉक्टर हुसैन के अनुसार नदी को पुनर्जीवित करना है तो दोनों समस्याओं को दूर करना होगा। औद्योगिक कचरा गिराना बंद करना होगा और नदी में पानी की मात्रा को बढ़ाना होगा। भारत में गंगा सिर्फ एक नदी नहीं करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र भी है।

गंगा के प्रति मां जैसी आस्था को भुनाने के लिए ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस से चुनाव लड़े थे। उन्होंने गंगा को स्वच्छ एवं निर्मल बनाने का संकल्प लिया था। चार साल में गंगा की सफ़ाई की बातें तो बहुत हुई हैं, लेकिन धरातल पर कुछ होता नहीं दिखाई दिया। अब जबकि चुनाव एक बार फिर सिर पर हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है।

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