प्रदेश के बाजार में बेभाव टमाटरों की मर्मकथा…!

अजय बोकिल

इसे दैव योग ही मानें कि इधर सालाना रस्म की तरह मध्यप्रदेश को पांचवीं बार कृषि कर्मण पुरस्कार का ऐलान हुआ, उधर राज्य में टमाटर की बंपर फसल के बाद जानवरों की बन आई। गधों के गुलाब जामुन खाने की तर्ज पर एमपी के गाय, घोड़े और टट्टू भी टमाटर पर ताव मारने लगे। क्योंकि बाजार में टमाटर का भाव बाजार में 1 रू. किलो से भी नीचे चला गया। बेचना तो दूर खेत में टमाटर तुड़वाना भी किसानों को महंगा पड़ गया । कई ने तो टमाटर रास्ते पर ही फेंक दिए, क्योंकि उन्हें मं‍डी तक ले जाना भी घाटे का सौदा था। बीते तीन-चार सालों से मार्च में टमाटर की यही कथा है। बारिश में कई बार टमाटर अमीरों की वस्तु बन जाती है तो गर्मियां शुरू होते ही बकरियां भी टमाटर शौक से चरती हैं। आलम यह है कि बाजार सस्ते टमाटरों से लाल हो चुका है, लेकिन खरीददार नदारद हैं। जितनी जरूरत नहीं है, उससे कई गुना ज्यादा माल मंडी में आ रहा है। टमाटर कोई सोना भी नहीं कि खरीदकर लाॅकर में रख लें। दो-तीन दिन के भीतर वह रसोई तक नहीं पहुंचा तो खुद खराब होकर मर जाता है। इसी के साथ प्रदेश के टमाटर उपजाने वाले किसानों के सपने भी चटनी की तरह पिस जाते हैं।

विडंबना यह है कि सरकार का एक विभाग फसलों की पैदावार बढ़ाने में लगा है तो दूसरी तरफ पैदा फसल वाजिब भाव के लिए तरसती रहती है। टमाटर के साथ कुछ ऐसा ही होता आ रहा है। दो दशक पहले तक टमाटर मध्य प्रदेश में कम ही होता था। गर्मियों में तो उसके दर्शन भी कम होते थे। लेकिन किसानों की मेहनत और सरकारी प्रयासों के चलते मध्यप्रदेश टमाटर उत्पादन में देश में तीसरे स्थान पर आ गया है। पहले नंबर पर आंध्र और दूसरे नंबर पर कर्नाटक है। खास बात यह है कि टमाटर की फसल बड़ी तादाद में आदिवासी किसान भी पैदा कर रहे हैं।

क्योंकि कृषि विभाग ने लोगों को समझाया कि टमाटर की फसल में मार्जिन ज्यादा है। इसमे काफी हद तक सचाई भी है। आज मध्यप्रदेश का टमाटर एक्सपोर्ट हो रहा है। लेकिन जब अच्छे भाव की उम्मीदें जवानी पर आती हैं तो भाव धड़ाम से नीचे आ जाते हैं। उधर पाकिस्तान में मप्र का टमाटर धूम मचाए था, लेकिन यह निर्यात अचानक बंद हो गया। क्यों हुआ, इसका कारण अभी साफ नहीं है, लेकिन मप्र के किसानों के प्राण गले को आ गए। भाव 1 रू. किलो तक गिर गया। क्या पैदा करें और क्या कमाएं वाली स्थिति। जब जिन्स का भाव गिरता है तो बेपारी भी सवारी गांठने लगता है। खरीदार भी सस्ती सब्जी को भाव नहीं देते। किसान का पसीना मन मसोस कर रह जाता है।

यूं टमाटर मूल भारतीय सब्जियों में से नहीं है। इसे स्पेनिश लोग मेक्सिको और दक्षिण अमेरिका से यहां लेकर आए। यही कारण है कि संस्कृत में ( संभवत:) टमाटर के लिए कोई शब्द नहीं है। टमाटर या अंग्रेजी का टोमटो भी स्पेनिश तोमेत का ही बदला रूप है। पुरानी भारतीय रेसिपियों में टमाटर का ज्यादा इस्तेमाल भी नहीं होता था। लेकिन पिछले कुछ सालों से टमाटर हमारे किचन का जरूरी आयटम बन गया है। इसमें कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि टमाटर को पौष्टिक और गुणकारी माना गया है। भारतीय भोजन में टमाटर को आरक्षण मुख्यहत: सलाद और चटनी में मिला है। बिना टमाटर अब देसी थाली की कल्पना मुश्किल है।

कोई आयटम जरूरी होने का मतलब यह भी नहीं कि वह माटी के मोल मिलने लगे। टमाटर की यही दुर्दशा है। आज आप पाव भर मांगोगे तो दुकानदार आधा किलो ही देगा। कारण कि बाजार में माल की इफरात है। खरीदार नहीं है। बेचनेवाले हैं पर दाम नहीं है। हमारी कृषि और बाजार व्यवस्था के गोरखधंधे में टमाटर चटनी बन गया है, क्योंकि उत्पादन और विपणन के बीच कोई तालमेल है ही नहीं। एक साल माल ऊंचे भाव बिका तो ज्यादातर किसान वही पैदा करने बैठ जाते हैं। नतीजतन सोना के भाव पीतल से भी नीचे चला जाता है।

अंदेशा है कि टमाटर के बाद अब अगली दुर्दशा प्याज की होने वाली है। पिछले साल भी यही हुआ था। मजबूरी में सरकार ने 8 रू. किलो प्याज खरीदकर किसानों के आंसू पोंछने की कोशिश की थी। इसी के बाद भावांतर योजना वजूद में आई। भावांतर बोले तो किसान को मंडी में उपज का दाम कम मिलने पर न्यूनतम समर्थन मूल्य या औसत माॅडल रेट की दर से अंतर की राशि का भुगतान सरकार सीधे किसान के खाते में करती है। राजनीतिक कारणों से इसे मुख्यामंत्री भावांतर योजना नाम दिया गया है। हकीकत में किसानों को इससे कितना फायदा हुआ है, यह तो अगले चुनाव में ही पता चलेगा, लेकिन इस पहल को सराहनीय माना गया है। लेकिन टमाटर का दुर्भाग्य यह है कि वह भावांतर के लायक भी नहीं है। क्योंकि टमाटर की जिंदगी दो-चार दिन की ही होती है। भावांतर के नखरे उठाने की उसकी औकात नहीं है। वह जितनी जल्दी पेट में जाए, उतना अच्छा। लेकिन सवाल यह है कि यह जाए तो जाए कैसे?

किसान तो खेत में उस पर जानवर छोड़ रहे हैं। टमाटर की यह भी बदकिस्मती है कि उसे फल माना जाए या सब्जी, इसको लेकर आजतक फैसला नहीं हो पाया है। सब्जियों में उसकी हैसियत सहायक की है तो फलों के बाजार में उसे गुलाम की जगह भी नहीं मिली। मुहावरों में टमाटर को अपनी सुर्खी के कारण थोड़ा महत्व मिला, लेकिन कुल मिलाकर टमाटर की औकात उस राजनीतिक पार्टी की तरह ही है, जो बिना गठबंधन के चुनाव नहीं लड़ सकती। और अभी तो टमाटर की हालत जमानत गंवा चुके प्रत्याशी की सी है। लागत से भी हाथ धो चुके किसान को समझ नहीं आ रहा कि टमाटर की इस जखीरे का क्या करें? कोई टोटका है किसी के पास?

सुबह सबेरे से साभार

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