पढ़िए लघुकथा धागे

बुआ की बूढ़ी आंखों में आज थकान नहीं थी। न उदासी न बेबसी। उनमें आज ललक थी। घर आए अपने भतीजे पर समूचा प्यार उड़ेल देने की ललक।
‘तुझे देखकर आत्मा हरी हो गई बेटे।’ देवेन के बालों में उंगलियां फिराते हुए वह बोलीं, ‘जुग-जुग जीओ मेरे बच्चे।’

‘मेरे मन में तुम्हारे दर्शनों की इच्छा बड़े दिनों से थी बुआ।’ देवेन उनके चरण छूता हुआ बोला, ‘लेकिन नौकरी में ऐसा फंस गया हूं कि मत पूछो! आज दोपहर बाद कुछ फुरसत-सी थी। बस, घर न जाकर सीधा इधर ही निकल आया। अब, रातभर तुम्हारा सिर खाऊंगा। कुछ पूछूंगा, कुछ सुनूंगा। सुनाऊंगा कुछ नहीं। सिर्फ एक घंटा सोऊंगा और सवेरे वापस चला जाऊंगा।’ उसके अंदाज पर बुआ का मन तरल हो उठा। आंखें छलक आईं। गला रुंध गया।
‘क्या हुआ बुआ?’ उनकी इस गंभीरता पर देवेन ने पूछा।
‘कुछ नहीं।’ अपने पल्लू से आंखें पोंछती बुआ बोलीं, ‘बिल्कुल बड़े भैया पर गया है तू। वह भी जब आते थे, तो खूब बातें करते थे। सुख-दुख, प्यार-दुलार और दुनियादारी की बातें। उनके आने पर रात बहुत छोटी लगती थी। गुस्सा आता था कि सूरज इतनी जल्दी क्यों उग आया।’
भावुकताभरी उनकी इस बात पर देवेन भी अतीत में उतर गया। बुआ के बड़े भैया यानी पिताजी की स्मृति हजारों हजार फूलों की गंध-सी उसके ह्रदय में उतर गई। उसके उदास चेहरे को देख बुआ तो सिसक ही पड़ीं।
‘भैया ने कभी भी मुझे छोटी बहन नहीं समझा, हमेशा बेटी ही माना अपनी।’ सिसकते हुए ही वह बोलीं,’वह मेरा ख्याल न रखते, तो 71 की लड़ाई में तेरे फूफा के शहीद हो जाने के बाद इस दुनिया में रह ही कौन गया था मेरा? अपने मां-बाप की इकलौती संतान थे तेरे फूफा। न बाल न बच्चा। साल-छह महीने रोकर मैं भी मर-खप गई होती…।’
‘ऐसी थकी और हारी हुई बातें नहीं किया करते बुआ।’ अपनी उदासी पर काबू पाते हुए देवेन ने बुआ के कंधों पर अपने हाथ रखे। बोला, ‘जैसे पिताजी तुम्हारे लिए पिता समान थे, वैसे ही तुम हमारे लिए मां समान हो। एक-दूसरे को स्नेह और सहारा देते रहने की यह परंपरा अगर टूट जाने दी तो घर, घर नहीं रहेंगे बुआ, नर्क बन जाएंगे।’
देवेन की इन बातों ने बुआ के भावना-भरे मन में बवंडर-सा मचा दिया। अपने कंधों पर उसके हाथ उन्हें अपने भतीजे के नहीं, बड़े भैया के हाथों-जैसे दुलार-भरे लगे। आगे बढ़कर वह उसके सीने से लग गईं और ‘भैया-भैया’ कहती फूट-फूट कर रो उठीं।

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