‘फॉग’ पर भारी ‘चौकीदार’  

– उमेश त्रिवेदी

वर्तमान दौर में कॉस्मेटिक्स की दुनिया में जैसे ‘फॉग’ चल रहा है, लगभग वैसे ही राजनीति के मार्केट में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘चौकीदार’ चल रहा है। फॉग डीऑड्रेन्ट या परफ्यूम में लोग खुशबू से रूबरू होते हैं, जबकि मोदी के ‘चौकीदार’ में लोग राफेल से जुड़ी कथित ईमानदारी को सूंघते हैं। ‘फॉग’ का विज्ञापन युवाओं में काफी लोकप्रिय है, जबकि मोदी का ‘चौकीदार’ उतना ही विवादास्पद और सवालों से घिरा है। फिर भी चुनावी-सभाओं के मोलभाव में चौकीदार सबसे ऊपर चल रहा है। राहुल गांधी कहते हैं ‘चौकीदार चोर है’ और  मोदीजी बताते है कि ‘मैं चौकीदार हूं’।

फॉग के विज्ञापन काफी दिलचस्प हैं। इसमें लोगों द्वारा सवाल पूछा जाता है कि- ‘आजकल क्या चल रहा है? थोड़े असमंजस, माथापच्ची के बाद उत्तर सुनाई पड़ता है- ‘फॉग चल रहा है’ …जब पूछने वाला इस उत्तर से मुतमईन नहीं होता है, तो  फिर कहा जाता है… ‘फॉग ही तो चल रहा है’ … और क्या…?  फॉग बॉडी स्प्रे परफ्यूम के विज्ञापन का यह डॉयलॉग आजकल हर युवा की जुबान पर है। विज्ञापन में सिर्फ एक सवाल है, थोड़ा सा पॉज है, और फिर जवाब है… और जवाब सबको लाजवाब करते हुए खत्म हो जाता है। अहमदाबाद की मशहूर कंपनी विनी कॉस्मेटिक्स के संस्थापक सीईओ दर्शन भाई पटेल और उनके पार्टनर दीपक भाई पटेल विज्ञापन के सूत्रधार हैं। अभी तक वह फॉग की दर्जनों ब्रांड को मार्केट लीडर बना चुके है।

फॉग के विज्ञापन की खुशबू के तिलिस्म की तरह भाजपा के मैनेजर लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीतिक छवि में ‘चौकीदार’ के नाम पर ईमानदारी, सजगता, सतर्कता और सफलता का तिलिस्म गढऩे में जी-जान से जुटे हैं। लोग मानते हैं कि फॉग की खुशबू कुछ घंटों में हवा हो जाएगी, जबकि मोदी के राजनीतिक चौकीदार से ईमानदारी की उम्मीदें स्थायी हैं। अब सवाल इतना ही है कि क्या फॉग की खुशबू की तरह ही चौकीदार की ईमानदारी, सजगता और सतर्कता कहीं ‘अच्छे दिनों’ की तरह हवा में तो नहीं उड़ जाएगी?

यह महज संयोग है कि फॉग की खुशबू का मायाजाल अहमदाबाद के दो गुजराती-व्यापारियों के दिमाग की देन है, उसी तरह ईमानदारी के प्रतीक के रूप में ‘चौकीदार’ की अवधारणा भी गुजरात मूल के ही दो धुरंधर नेताओं के दिमाग की उपज है।  यह देखना दिलचस्प होगा कि फॉग के विज्ञापन की बदौलत जिस प्रकार दर्शन भाई पटेल और दीपक भाई पटेल ने खुशबू के आधे से ज्यादा मार्केट पर कब्जा कर लिया है, क्या उसी प्रकार गुजरात मूल के प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित भाई शाह अपनी ”चौकादार’ ब्रांड की बदौलत वोटों के बाजार पर कब्जा कर पाएगें?

मोदी के राजनीतिक जीवन-दर्शन में चौकीदार का अवतरण राफेल के मामले में उन पर लगने वाले सीधे आरोपों के बाद हुआ है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने राफेल की खरीदी में मोदी के खिलाफ नारा बुलंद किया है कि ‘चौकीदार चोर है’। अपने भाषणों में मोदी खुद को प्रधान सेवक अथवा देश का चौकीदार निरूपित करते रहे हैं। ‘चौकीदार चोर है’ की राजनीतिक प्रभावशीलता के मद्देनजर भाजपा ने बचाव की रणनीति के तहत ‘मैं चौकीदार हूं’ का हठधॢमता से ओतप्रोत आत्म-मुग्ध कैम्पेन शुरू किया है। मोदी ने 15 मार्च 2019 को अपने ट्विटर हैंडल पर अपने नाम के आगे चौकीदार जोड़ दिया था। उसके बाद सभी मंत्री, सांसद, विधायक और मोदी-भक्त सोशल मीडिया सेनानी, चौकीदार बनकर लोकसभा चुनाव में भाजपा की चौकसी में लग गए है।

सियासत में गिरगिट के रंग बदलने की तरह नाम बदलने का गिरगिटी-चलन समाज कबूल नहीं करता है। नाम बदलने से व्यक्ति की तासीर नहीं बदलती है। सवालों को मार देने से उत्तर नहीं मरते हैं। क्या मोदी के भीतर बैठा चौकीदार उनसे यह नहीं पूछ रहा है कि उनकी रैलियों पर होने वाला करोड़ों रुपया किस टकसाल में ढाला जा रहा है? आरोपों को नकारना, अनसुना करना या शोर मचाना मोदी सरकार की राजनीतिक शैली है। आरोपों के जवाब में सीनाजोरी भाजपा की रणनीति का मूलमंत्र है। ‘मैं चौकीदार हूं’ का नारा भी इसी मनोवृत्ति की देन है।

जब मोदी के पास सवालों के जवाब नहीं होते हैं, तो वह इसी मनोवृत्ति का रक्षा-कवच लेकर खड़े हो जाते हैं। ‘मैं चौकीदार हूं’ की तर्ज पर मोदी ने 6 अप्रैल को भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के उस ब्लॉग पर खुद को अहोभाग्य कहा था, जिसका हर शब्द उन्हें आरोपों के कठघरे में खड़ा कर रहा था, ताकि आडवाणी की नसीहतें राजनीतिक-बिरादरी में बहस का सबब नहीं बन सकें। उनकी हठधॢमता लाजवाब और लाइलाज दोनों हैं।

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