बड़े काम का बीस हजारी मोजा

हर माता-पिता को सबसे ज्यादा चिंता अपने बच्चे को लेकर होती है। अगर बच्चा नवजात या बहुत छोटा है, तो यह चिंता और भी बढ़ जाती है। लोगों की इस परेशानी का हल ढूंढऩे को लेकर शोध जारी हैं। इसी क्रम में एक नई खोज है स्मार्ट मोजा। यह मोजा बच्चे की नब्ज मापता है और उसके आधार पर ऑक्सीजन लेवल, दिल की धड़कन और तापमान का डेटा तैयार करता है। यह एप्पल वॉच और फिटबिट जैसा गैजेट है।

लिंडसे इलियट मां बनीं तो अपनी बेटी हेजेल को थोड़ी देर के लिए भी अकेला छोडऩे में उनका जी घबराता था। 29 साल की इलियट टीचर हैं। इलियट की चिंता एक मोजे ने दूर की। 300 डॉलर का यह स्मार्ट मोजा नब्ज मापता है और उसके आधार पर ऑक्सीजन स्तर, दिल की धड़कन और तापमान का डेटा तैयार करता है। इसे अस्पतालों की प्रेरणा से बनाया गया है। यह एप्पल वॉच और फिटबिट जैसा गैजेट है। इलियट अमेरिका के फ्लोरिडा में विंटर पार्क में रहती हैं। इलियट जैसे कई मां-बाप ने स्मार्ट बेबी टेक्नोलॉजी को अपनाया है।

पिछले कुछ साल में कई कंपनियों ने पहनने योग्य और अन्य स्मार्ट उत्पादों से बच्चों को लैस करने के बाजार को पहचान लिया है। ऑस्ट्रेलिया की सोशल रिसर्च फर्म मैक्क्रिंडल के मुताबिक, हर हफ्ते दुनिया भर में ‘जेनरेशन अल्फा’ के 25 लाख नए सदस्य पैदा हो रहे हैं। इस पीढ़ी की शुरुआत 2010 में पैदा हुए बच्चों से मानी जाती है। उस साल आईपैड और इंस्टाग्राम लॉन्च हुए थे। 2025 में इस पीढ़ी के औपचारिक तौर पर समाप्त होने तक इसमें 2 अरब सदस्य शामिल हो जाएंगे। इन उत्पादों की मदद से मां-बाप नर्सरी से लगातार जुड़े रहते हैं। उनको बोतल, डमी, कॉट, प्रैम, कपड़े वगैरह के फीडबैक लगातार मिलते रहते हैं। इनमें से कुछ उत्पाद मां-बाप के तनाव को कम करते हैं, तो कुछ दूसरे उत्पाद परवरिश के उन हिस्सों को पूरी तरह स्वचालित बना देते हैं, जिनके लिए मां-बाप पहले अनुभूतियों पर निर्भर रहते थे। उदाहरण के लिए दूध के बोतल की पेंदी से जुड़ा ‘इंटेलीजेंट बेबी फीडिंग मॉनिटर’ ब्लूटूथ से स्मार्टफोन को डेटा भेजता है। बच्चे को दूध पिलाने के लिए मां पहले अपने अनुभव पर निर्भर रहती थीं। अब दूध की मात्रा, समय, उसके तापमान और बोतल के कोण तक को ऐप्स से नियंत्रित किया जाता है।

2016 में अमेरिका में होने वाले सालाना कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक शो (जो दुनिया का सबसे बड़ा कंज्यूमर टेक्नोलॉजी ट्रेड शो है) में एक विशेष शाखा लॉन्च की गई- बेबी टेक समिट। इस समिट के प्रोड्यूसर जिल गिल्बर्ट कहते हैं कि पहले यह कार्यक्रम उन स्टार्ट-अप्स के बीच लोकप्रिय था, जो बच्चों के लिए किसी एक काम को करने वाले उत्पाद बनाते थे। शुरुआत में जो उत्पाद बने उनमें सेंसर वाली कार सीट और नैपी बदलने का अलार्म देने वाले सेंसर शामिल थे। धीरे-धीरे ये बेबी प्रोडक्ट जटिल होते गए। मोटोरोला ने नर्सरी उत्पादों का एक सूट बनाया है। फिलिप्स ने एक ऐप प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जो बेबी मॉनिटर से मिले डेटा को मां-बाप द्वारा दर्ज रुझानों और डॉक्टरों के ऑनलाइन वीडियो परामर्शों से जोड़ता है।

बेबी टेक सेक्टर नया है। इसके बारे में कम अध्ययन हुए हैं। फिर भी, हेक्सा के मार्केट रिसर्चर का अनुमान है कि अकेले बेबी मॉनिटरिंग सब-मार्केट 2016 के 92.9 करोड़ डॉलर से बढ़कर 2025 तक 163 करोड़ डॉलर पहुंच सकता है। फिलहाल चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है। हेक्सा के मुताबिक, 2025 तक एशिया प्रशांत क्षेत्र का भी वैश्विक बाजार में अच्छा खासा हिस्सा होगा। अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस और चीन में ज्यादा मिलेनियल पैरेंट्स घर छोड़कर काम पर जाते हैं। अनुमान है कि वे डिजिटल बेबी मॉनिटर्स पर भरोसा करेंगे। अगली कड़ी में भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और थाईलैंड जैसे उभरते बाजारों के माता-पिता भी इसे अपना सकते हैं। दोह्योंग पार्क दक्षिण कोरिया की स्मार्ट नैपी मॉनिटर कंपनी मॉनिट के सीईओ हैं। वह कहते हैं, ‘बच्चे के बारे में सोच-सोचकर तनाव लेना परवरिश का सबसे अच्छा तरीका नहीं हैं। अगर आप बच्चे को खुश रखना चाहते हैं, तो सबसे पहले आपको खुश रहना चाहिए। इससे परवरिश अच्छी होगी।’ दोह्योंग ऐसी तकनीक विकसित कर रहे हैं, जो ठीक यही काम कर सकती है।

हालांकि बच्चों की देखभाल से जुड़ी टेक्नोलॉजी महंगी है। तकनीक से जुड़े रहने के बावजूद मिलेनियल्स पीढ़ी महसूस करती है कि आॢथक तौर वह पिछली पीढ़ी से घाटे में है। उदाहरण के लिए, बच्चे को झूला झुलाकर सुलाने वाली स्मार्ट कॉट ‘दी स्नू’ 1,160 डॉलर की है। अमेरिका के टेनेसी के नेशविले में रहने वाली 29 साल की फोटोग्राफर मिशेल डॉडी 3 बच्चों की मां है। उनके पास यह स्मार्ट कॉट है। वह कहती हैं, ‘यदि मेरा बच्चा नहीं सोता है, तो मेरे पैसे की कीमत वसूल है।’ डॉडी के लिए यह स्मार्ट कॉट किसी महंगे पालने जैसा है। ब्रिटेन और अमेरिका में बच्चे को संभालने के लिए नर्स 200 डॉलर प्रति रात फीस लेती हैं। मतलब यह कि स्नू की कीमत एक हफ्ते में ही वसूल हो रही है। जिन मां-बाप ने बच्चे के पालने पर सैकड़ों डॉलर खर्च किए हैं, उनके लिए एक स्मार्ट कॉट पर हजार डॉलर खर्च करना बड़ी बात नहीं। लेकिन बच्चों की बुनियादी जरूरतें जुटाने के लिए संघर्ष कर रहे मां-बाप के लिए बेबी टेक्नोलॉजी ना सिर्फ पहुंच से बाहर है।

यूनिवर्सिटी ऑफ विक्टोरिया में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर एलिसाबेथ गुग्ल ने फैमिली इकोनॉमिक्स पर रिसर्च किया है। उनको लगता है कि जब तक यह इंडस्ट्री अपने आॢथक और सेहत संबंधी दावों को साबित करने वाले सबूत नहीं जुटाती, तब तक मां-बाप तथ्यों को कल्पना से अलग करने में सक्षम नहीं हो पाएंगे और कंपनियां झूठे दावे करके अपने उत्पाद बेच सकती हैं। जो मां-बाप इन उपकरणों का इस्तेमाल यूज कर रहे हैं, वे इनको बढ़ावा दे रहे हैं। दूसरे शब्दों में, डेटा के आधार पर पली-बढ़ी पीढ़ी आ चुकी है।

बीबीसी से साभार

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