बप्पा की पीड़ा

हमारे देश में आस्था का सीधा-सा संबंध उत्सव और त्योहारों से है। एक त्योहार खत्म नहीं हुआ कि दूसरा तैयार रहता है। अब कृष्ण जन्माष्टमी के बाद कृष्णजी की छठी और इसके बाद आ जाता है गणेशोत्सव। गणेशोत्सव यानी भगवान गणेश का हैप्पी बर्थडे। हर साल बप्पा के बर्थडे को लेकर पूरे देश में धूम मचती है। हर गांव-गली-चौराहे पर बप्पा के मंडप सजते हैं। पहले केवल चतुर्थी के दिन ही गणेशोत्सव मनाया जाता था, लेकिन अब तो यह सप्ताह भर तक मनाया जाता है।

बप्पा को लाने के लिए भक्तों का हुजूम डीजे की धुनों पर रवाना होता है और पूरे शहर में नाचते हुए बप्पा को बड़ी ही श्रद्धा के साथ विराजमान करता है। रात-रातभर कानफोड़ू म्यूजिक और गीतों की भक्ति सरिता बहती है। फिल्मी गानों पर न केवल बच्चे और युवा, बल्कि उम्रदराज लोग भी जमकर नाचते नजर आते हैं। हालांकि इस नाचने-कूदने के बीच बप्पा की पीड़ा कोई नहीं जान पाता। यदि बप्पा की जगह खुद बैठे होते तो उठकर इन भक्तों के गाल पर आशीर्वाद जरूर देते। बप्पा सोचते होंगे- तमाशा बना दिया है मेरे बर्थडे को।

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जितने हर्षोल्लास के साथ लाते हैं, उतने ही धूमधाम के साथ नदी या तालाब के मटमैले पानी में मुझे विसर्जित भी कर देते हैं। मेरी एक नहीं सुनते। लाते समय भी पूरे जोश में अपने नृत्य का प्रदर्शन करते हैं और विसर्जित करते समय भी नाचते-गाते और होली खेलते हैं। भक्तों को देखकर तो लगता है कि गणेशोत्सव नहीं, डांस कम्पटीशन में भाग ले रहे हैं। लेकिन, इन सबके बीच भक्त मेरी पीड़ा से अनजान रहते हैं। विसर्जन करने की क्या जरूरत है? ऐसे तमाम सवाल बप्पा के मन में चुभते रहते हैं।

ये भक्त भी कमाल, धमाल और बेमिसाल है। बप्पा को विसर्जित करने ले जाते समय यह भी कहेंगे- ‘तू अगले बरस जल्दी आना।’ इस बीच बढ़ते जुलूस के साथ बप्पा की धड़कनें भी बेतहाशा तेज होती जाती हैं। काश, बप्पा भी मोदीजी की तरह ‘मन की बात’ कह पाते, तो जरूर अपनी ऐसी विदाई को लेकर भक्तों को डांटते। बप्पा कहते कि भक्तजनों मेरे साथ ही ऐसा सलूक क्यों? इस सृष्टि पर 33 करोड़ देवी-देवता हैं, उन्हें भी तो मौका दो।

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