बीजेपी की ख़ास नजरें टिकी है राहुल की इफ्तार पार्टी पर

(Last Updated On: 13/06/2018 5:49 PM)

दिल्ली ब्यूरो: सोनिया गांधी के डिनर पार्टी के बाद राहुल गांधी की इफ्तार पार्टी सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच हलचल पैदा कर रही है। दिल्ली के होटल ताज में राहुल की इफ्तार पार्टी आयोजित हो रही है जिसमे विपक्ष के तमाम बड़े चेहरे शामिल हो रहे हैं। इफ्तार के बहाने विपक्ष को एकजुट करने का यह राहुल गांधी का पहला प्रयास है। उधर बीजेपी की नजर इस इफ्तार पार्टी पर जमी हुयी है और पार्टी में शामिल होने वाले तमाम चेहरों को पढ़ा जा रहा है ताकि आने वाले दिनों में राजनीतिक मिजाज को बदला जा सके और राजनीतिक खेल को आगे बढ़ाया जा सके। बीजेपी प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कहा है कि जितने लोगों को इफ्तार पार्टी में बुलाया गया है, उनमें एक दूसरे के बारे में काफी अदावत है, ऐसे में कितना इकरार होगा और कितनी तकरार होगी इसे देखना और समझना होगा। त्रिवेदी ने कहा कि जिसका रोजा से कोई मतलब नहीं है वो इफ्तार दे तो यह सियासत है। यह पार्टी मजहबी नहीं सियासी है। किसी ने प्रधानमंत्री पद के लिए अभी राहुल गांधी को स्वीकार नहीं किया है।

गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी के तौर पर प्रमोट करना चाहती है जबकि सपा, बसपा और इनेलो जैसे कुछ दल मायावती के नाम आगे बढ़ा रहे हैं। ममता बनर्जीभी उनके नाम पर सहमत नहीं दिख रही हैं। ऐसे में असली सवाल ये है कि क्या इफ्तार के बहाने कांग्रेस को बीजेपी विरोधी पार्टियों से कोई फायदा मिलेगा या विपक्ष पहले से अधिक मजबूत हो पाएगा? आगे क्या होगा और राहुल गांधी की राजनीति कहाँ तक आगे बढ़ेगी इसे देखने की जरूरत है लेकिन फिलहाल तो राजनीतिक गलियारों में यह पार्टी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। कुमार स्वामी के शपथ ग्रहण के बाद यह पहला मौका होगा जब सभी विपक्षी दल एक साथ खड़े दिख सकते हैं। छोटे दल लगातार कांग्रेस पर दबाव बना रहे हैं। केसीआर, ममता बनर्जी जैसे कई नेता ऐसे फेडरल फ्रंट की बात कर रहे हैं जो गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी हो। ऐसे में देखना ये होगा कि इफ्तार के बहाने कांग्रेस ने जो ख्वाब पाल रखे हैं वो पूरे होते हैं या नहीं?

सियासी जानकारों का कहना है कि ये पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मुस्लिम समाज को संदेश देने की कोशिश भी है। कांग्रेस ने इससे पहले 2015 में इफ्तार दिया था। राहुल गांधी गुजरात और कर्नाटक चुनाव में मंदिरों और मठों में भटके हैं। खुद को कभी शिवभक्त और कभी जनेऊधारी ब्राह्मण बताया है. इससे कांग्रेस पर सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ झुकने की इमेज बन रही है। ऐसे में इस पार्टी के सहारे पार्टी यह बताना चाहती है कि मुस्लिम उसके एजेंडे में हैं और वो किसी भी धर्म विशेष की तरफ झुकी नहीं है। तो क्या 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देने के लिए कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व और सेकुलरिज्म का कॉकटेल बना रही है? कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी का कहना है कि अगर कोई शिवभक्त रोजा इफ्तार दे रहा है तो दिक्कत क्या है? कांग्रेस हर साल इफ्तार पार्टी रखती है। पिछले साल किसी वजह से नहीं रख पाई थी. कांग्रेस पार्टी सर्वधर्म सम्मान करती है। सभी त्योहार मनाती है। बीजेपी सिर्फ एक ही धर्म को मानती है।

खबर के मुताबिक़ पार्टी में आमंत्रित लोगों में उन सभी बड़े राजनेताओं और पार्टियों के नाम शामिल हैं जिन्हें सोनिया गांधी ने डिनर पर बुलाया था। इसलिए इसे विपक्षी ‘महागठबंधन’ बनाने की कोशिश के रूप में देखा जाएगा। राहुल गांधी विपक्ष को एकजुट करने की कोशिश करेंगे ताकि 2019 के आम चुनाव के लिए महागठबंधन पर व्यापक सहमति तैयार हो सके। कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राहुल गांधी जो सॉफ्ट हिंदुत्व और सेकुलरिज्म का घालमेल करने की कोशिश कर रहे हैं उस नीति पर कांग्रेस पहले ही चल चुकी है। लेकिन मंडल-कमंडल की राजनीति शुरू होने के बाद कांग्रेस का खेल खराब हो गया। ‘मंडल’ चला गया क्षेत्रीय पार्टियों में और ‘कमंडल’ चला गया बीजेपी में।”

इसमें कोई शक नहीं कि वर्तमान राजनीति में हिंदुत्व का वोटबैंक बीजेपी के साथ है। मुस्लिम और दलित भी किसी न किसी अंब्रेला के नीचे हैं। अभी बीजेपी ने कोई ऐसी गलती नहीं की है कि ब्राह्मणों का झुकाव कांग्रेस की तरफ हो जाए और सपा-बसपा जैसी पार्टियों ने कोई गलती नहीं की है कि दलित और मुस्लिम कांग्रेस की तरफ आ जाएं। ऐसे राहुल गांधी के लिए जरुरी है कि वे अधिक से अधिक पार्टियों को अपनी छतरी के नीचे लाये और मजबूत विपक्ष बनाकर बीजेपी को घेरे। अगर ऐसा संभव हो गया तो अगली राजनीति बदलेगी और बीजेपी को नुक्सान होगा।

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