बड़ी चुनौती के बीच प्रियंका की नजर अपनी दादी के वोट बैंक पर

अखिलेश अखिल

इंदिरा गांधी कि पोती ,राजीव गांधी की बेटी और राहुल गांधी की बहन के साथ ही प्रियंका गांधी की पहचान वाड्रा की पत्नी भी है। लेकिन प्रियंका के पास सबसे बड़ी थाती आजादी की लड़ाई में कांग्रेस की भूमिका ,कांग्रेस की कुर्वानी का इतिहास है तो दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की ह्त्या से जुड़े फड़फड़ाते दस्तावेज भी। कांग्रेस की यही कुर्वानी प्रियंका को मजबूत बनाते हैं और जनता के बीच बहुत कुछ कहने को बाध्य भी करते हैं। प्रियंका राजनीति में सक्रीय हो गई है और सोमवार से वह यूपी की चार दिनों की यात्रा पर निकल चुकी है। ये चार दिन प्रियंका के लिए भी महत्व के हैं तो यही चार दिन विपक्ष की राजनीति को समझने के लिए भी काफी है।

प्रियंका का दाव यूपी मि कितना चलेगा इस पर सबकी नजरें है तो बीजेपी समेत सपा -बसपा गठबंधन की राजनीति में उठे तूफ़ान को समझने के भी दिन हैं। प्रियंका और ज्योतिरादित्य के ऑडियो क्लिप को यूपी के 60 लाख लोगों को सुनाया गया है। सक्रिय राजनीति में उतरने के बाद प्रियंका गांधी को लेकर कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह तो है और ‘प्रियंका नहीं ये आंधी है, दूसरी इंदिरा गांधी है’ व ‘प्रियंका गांधी आई है, नयी रोशनी लाई है’ जैसे नारे भी दिये जा रहे हैं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं है।

प्रियंका की सबसे बड़ी चुनौती संगठन की कमजोरी है। यूपी में कांग्रेस कासंगठन लगभग ना के बराबर है। इसे प्रियंका कितना जिवंत कर पाएगी यही असली सवाल है। सबसे बड़ी बात यह है कि चुनाव महज अब दो महीने रह गए हैं। 2009 के लोकसभा चुनाव में जिस कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 21 सीटें मिली थी, वही कांग्रेस 2014 में महज दो सीटों पर सिमट के रह गई। जाहिर है कांग्रेस ताकत वहाँ कमजोर होचुकी है। अब प्रियंका अगर संगठन को मजबूत कर पाई और युवाओं से लेकर पुराने कोंग्रेसियों को अपने पाले में खींच सकीं तो कांग्रेस के लिए चुनावी तस्वीर बदल सकती है।

पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भले ही कांग्रेस के हिस्से 2 सीटें आई हों, लेकिन करीब दो दर्जन सीटें ऐसी थीं, जिन पर कांग्रेस को ठीक-ठाक वोट मिले थे। पश्चिमी यूपी की सहारनपुर व गाजियाबाद जैसी सीट पर कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन उसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे थे। यही स्थिति लखनऊ, कानपुर, बाराबंकी और कुशीनगर की भी थी। यहां भी कांग्रेस ने मोदी लहर के बावजूद बीजेपी को कांटे की टक्कर दी थी। इस बार प्रियंका गांधी के सामने पूर्वी यूपी की ऐसी ही सीटों को ‘विनिंग सीट’ में तब्दील करने की चुनौती है।

पहले चर्चा थी कि उत्तर प्रदेश में सपा, बसपा और कांग्रेस साथ चुनाव लड़ेंगी, लेकिन ‘बुआ-भतीजे’ की जोड़ी ने ऐन मौके पर कांग्रेस को झटका दे दिया। दोनों दलों ने गठबंधन के बाद 38-38 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारने का ऐलान किया है। हालांकि दोनों दल कांग्रेस के गढ़ अमेठी और रायबरेली में अपना प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। यूपी में सपा-बसपा का गठबंधन बीजेपी के लिए चुनौती तो है ही, कांग्रेस को भी मुश्किलें होने वाली हैं। खासकर फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उप चुनावों में दोनों पार्टियों ने इस गठबंधन की ताकत देखी है। ऐसे में प्रियंका गांधी को इस स्थिति से भी निपटना है।

उत्तर प्रदेश चुनावों में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की प्रयोगशाला बन जाता है। कभी ‘एम-वाई’ फैक्टर पर चुनाव लड़े जाते हैं तो कभी ‘बीबीसी’ फैक्टर पर। इस बार सपा-बसपा के साथ आने से दूसरे दलों के लिए ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की इस पहले को हल करना पहले के मुकाबले और कठिन हो गया है। इस नई परिस्थिति में कांग्रेस के सामने दो तरफ से चुनौतियां हैं। पहली, कांग्रेस के पारंपरिक वोटर पिछले कुछ वर्षों में लगातार पार्टी से छिटकते गए। 2014 के चुनावों में भाजपा को इसका लाभ मिला। दूसरी, कांग्रेस को उम्मीद थी कि अगर वह सपा-बसपा के साथ गठबंधन के तहत चुनाव में उतरती तो उसे सवर्ण वोटरों के साथ दूसरे तबकों का भी साथ मिलता, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। इसके साथ ही लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी को परिवार के मोर्चे पर भी चुनौती मिलने वाली है। विपक्षी दल, खासकर भाजपा लगातार मनी लॉन्डरिंग केस में जांच का सामने कर रहे उनके पति रॉबर्ट वाड्रा का मामला उठाती रही है और इस बहाने घेरने का प्रयास करती रही है। दूसरी तरफ, सोशल मीडिया पर भी प्रियंका गांधी के खिलाफ कैंपेन चलाया जाता रहा है। ऐसे में प्रियंका गांधी को इन चुनौतियों से भी निपटना होगा।

इधर कांग्रेस के पास यूपी में भारी चुनौती तो है ही लेकिन इन चुनौतियों के बीच प्रियंका और सिंधिया को लेकर जो रणनीति बनाई है वह भी कम रोचक नहीं। ये रणनीतियां कामयाब हो जाती है तो इसका सबसे ज्यादा असर बसपा की राजनीति पर पड़ने वाला है। कांग्रेस के पक्ष में दलितों को लामबंद करने के लिए पार्टी ने 35 सदस्यीय ”टीम यूपी” बनाई है। पार्टी के अनुसूचित जाति विभाग की ओर बनाई गई इस टीम ने कुछ दिनों पहले ही प्रियंका और सिंधिया के समक्ष अपना ”ब्लूप्रिंट” रखा और जल्द ही वह उत्तर प्रदेश में जमीनी स्तर पर उतरने जा रही है। कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के अध्यक्ष नितिन राउत ने कहा कि टीम यूपी मुख्य रूप से उन सीटों पर ध्यान देगी जहां दलित मतदाताओं की संख्या 20 फीसदी या इससे अधिक है। उन्होंने कहा, ”पिछले दिनों हमने प्रियंका गांधी और सिंधिया दोनों को ब्लूप्रिंट सौंप दिया। हम जल्द ही जमीनी स्तर पर काम शुरू कर देंगे।” प्लान से ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अपने कोर वोट बैंक को फिर से वापस पाने की कोशिश करेगी जो कभी इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस के साथ था लेकिन अब इस पर मायावती का कब्जा है। अगर कांग्रेस का इस प्लान में कामयाबी पाती है तो निश्चित तौर पर बीएसपी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

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