मंत्रिमंडल विस्तार की डगर, अमृत कम ज्यादा है जहर

विस्तार करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती और कठिन कार्य होता है। उद्योगपतियों की बात करें तो एक इकाई की शुरुआत करने के बाद उसका विस्तार करने में पूरा जीवन खप जाता है। अगली पीढिय़ों तक विस्तार की प्रक्रिया चलती रहती है। साधु संतों की बात करें तो एक शिष्य से शुरू कर लाखों शिष्यों तक का सफर का विस्तार हो या फिर एक धार्मिक आयोजन से शुरु कर इसका सैकड़ों-हजारों की संख्या तक विस्तार होना भी संपूर्ण जीवन समर्पण करने पर ही संभव हो पाता है। विस्तार की यह कहानी सभी इंसानी उपलब्धियों पर लागू होती है।

फिलहाल हम बात कर रहे हैं मध्यप्रदेश के मंत्रिमंडल विस्तार की। 20 मार्च 2020 की तारीख मध्यप्रदेश के इतिहास में पंद्रहवीं विधानसभा में बनी मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व में बनी कांग्रेस की सरकार के गिरने की और भाजपा के सरकार बनाने का दावा पेश करने की तारीख है। तीन दिन चले घटनाक्रम के बाद मध्यप्रदेश में एक बार फिर शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश में चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर रिकार्ड कायम किया। और इसके बाद मंत्रिमंडल गठन की प्रक्रिया ने भी करीब एक महीने का समय लिया। यह सिर्फ इसलिए क्योंकि मध्यप्रदेश में यह सरकार सहज नहीं बनी थी बल्कि कांग्रेस से 22 विधायकों के इस्तीफे और ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आने के बाद असाधारण तौर पर सरकार का गठन हुआ था।

शायद इसीलिए मंत्रिमंडल बनने में करीब एक महीने भी लगा और मंथन में से निकले पांच मंत्री। अब फिर एक महीना होने को है और मंत्रिमंडल विस्तार का इंतजार जारी है। पर राजनीति के चाणक्य, जननायक, प्रदेश में लगातार तेरह साल तक मुख्यमंत्री रहने का रिकार्ड बनाने, सिंहस्थ के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड बनाने और 15 महीने के अंतराल के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री की चौथी बार शपथ लेकर रिकार्ड बनाने वाले शिवराज सिंह चौहान के लिए इस बार मंत्रिमंडल विस्तार की डगर अगर-मगर में उलझी नजर आ रही है। इसकी वजह जहां महाराज-शिवराज गठबंधन को माना जा रहा है तो मंत्री पद के दावेदारों की लंबी कतार भी मंत्रिमंडल विस्तार को मंझधार में डाल रही है।

पंद्रहवीं विधानसभा का दूसरा मंत्रिमंडल –
पंद्रहवीं विधानसभा में कांग्रेस सरकार के पलटने के बाद शिवराज सिंह चौहान के मुुख्यमंत्री बनने के बाद हुए मंत्रिमंडल गठन में फिलहाल डॉ. नरोत्तम मिश्रा, कमल पटेल ,मीना सिंह, तुलसीराम सिलावट और गोविंद सिंह राजपूूत मंत्री हैं। इनमें से तीन शिवराज तो दो महाराज के कोटे के मंत्री हैं। अब किसके कोटे से कितने मंत्री बनें, यह सवाल सौ टके का है। महाराज के कोटे के चार नाम डॉ. प्रभुराम चौधरी, इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसौदिया, प्रद्युम्न सिंह तोमर मंत्री पद की शपथ लेने के लिए कतार में हैं तो एंदल सिंह कंसाना, हरदीप सिंह डंग, बिसाहूलाल सिंह जैसे नाम भी मंत्री बनने की सूची में आने की प्रतीक्षा में हैं।

मुश्किल यह है कि नवगठित मंत्रिमंडल के पांच मंत्रियों में से केवल डॉ. नरोत्तम मिश्रा इकलौते मंत्री हैं जो शिवराज के पिछले मंत्रिमंडल में शामिल थे। बाकी चारों नाम वह हैं जो पिछले मंत्रिमंडल में नहीं थे। हालांकि कमल पटेल और मीना सिंह शिवराज के बारहवीं विधानसभा सत्र के मंत्रिमंडल में मंत्री पद से नवाजे गए थे। पर तेरहवीं और चौदहवीं विधानसभा में वह साथ नहीं थे।

पिछले मंत्रीमंडल के यह मंत्री अब भी मंत्री बनने की कतार में हैं या इंतजार में हैं। गोपाल भार्गव, विजय शाह,गौरीशंकर बिसेन, जालम सिंह पटेल, यशोधरा राजे सिंधिया, पारस चंद्र जैन, राजेंद्र शुक्ल, रामपाल सिंह, भूपेंद्र सिंह, सुरेंद्र पटवा, विश्वास सारंग, संजय पाठक और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष रहे डॉ. सीतासरन शर्मा। इनके अलावा अरविंद सिंह भदौरिया, हरिशंकर खटीक, जुगुल किशोर बागरी, नागेंद्र सिंह, केदारनाथ शुक्ल, अजय विश्नोई, करण सिंह वर्मा, नीना विक्रम वर्मा, इंदौर जिले से मालिनी गौड़, महेंद्र हार्डिया, रमेश मेन्दोला में से , जगदीश देवड़ा, डॉ. राजेंद्र पांडेय, ओमप्रकाश सखलेचा,यशपाल सिंह सिसौदिया आदि में से एक दर्जन प्रबल दावेदारी पेश कर रहे हैं मंत्री बनने की। बात यहीं खत्म नहीं होती इसके अलावा भी महात्वाकांक्षी, संघ-केंद्र तक हाथ-पैर मार रहे काबिल भाजपा विधायकों की कमी नहीं है। ऐसे में समुद्र में से 10-12 रत्न निकालना शिवराज सिंह चौहान को भंवर में डाले है। समाधान की चाबी भी अकेले उनके हाथ में नहीं। ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार पर करेला और नीम चढ़ा की कहावत चरितार्थ हो रही है।

चुनौती यहां कम नहीं –
महाराज कोटे के सात और नेता मंत्री पद की सूची के हकदार मान लें, लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। इसके अलावा चार निर्दलीय, एक सपा और दो बसपा यानि सात में से चार मंत्री बनने का सपना संजोए हैं। पर जिस तरह नए चेहरों को भी शामिल करने का दबाव मानें या फिर संघ और केंद्र की सिफारिश पर भाजपा में ही कुछ नए चेहरों को मेनस्ट्रीम में लाने की चुनौती मानें या फिर इंदौर जैसे महत्वपूर्ण गढ़ जो पिछली भाजपा सरकार में मंत्री पद के लिए तरस गया था वहां से फिलहाल महाराज कोटे से एक मंत्री बन चुका है लेकिन भाजपा में जीवन खपा चुके चेहरे अब भी वंचित हैं…ऐसे में भाजपा के लिए बन रही एक अनार सौ बीमार और महाराज कोटे के चेहरों को लेकर असमंजस मंत्रिमंडल विस्तार में कंटक बना नजर आ रहा है।

समस्या यह भी –
क्षेत्रीय संतुलन इस मंत्रिमंडल विस्तार के गले की हड्डी बनने वाला है। सागर से पंडित गोपाल भार्गव, गोविंद सिंह राजपूूत और भूपेंद्र सिंह तो रायसेन जिले से डॉ. प्रभुराम चौधरी, रामपाल सिंह और सुरेंद्र पटवा तीन-तीन नाम हैं जो मंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं। यही असंतुलन दूूसरे जिलों में भी सिर चढक़र बोलेगा। ऐसे में विस्तार की चुनौती सबसे बड़ी नजर आ रही है।

कंठ तो नीला होगा ही –
मंत्रिमंडल विस्तार को अंगीकार करना वह कठिन डगर है, जहां अमृत पीने को सब तैयार हैं लेकिन जहर का प्याला सिर्फ शिवराज के हिस्से में ही आ रहा है। लोक कल्याण के लिए शिव को अपना कंठ नीला करने के अलावा मानो कोई चारा नहीं है। समस्या यह भी है कि उसके बाद भी शिवराज किसी को संतुष्ट कर पाएंगे, यह दावा कतई नहीं किया जा सकता।

कौशल किशोर चतुर्वेदी, भोपाल

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