मायावती ने कांग्रेस को दिखाई ताकत, अब गठबंधन का रास्ता साफ़

दिल्ली ब्यूरो: बसपा प्रमुख मायावती ने अपनी ताकत तो दिखा ही दी। तीन राज्यों के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि बसपा को किया जा सकता। खासकर मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को बसपा की ताकत का कुछ ज्यादा ही अहसास हुआ। यहां बसपा चुनाव नहीं लड़ती तो कांग्रेस -बीजेपी के बीच जीत का अंतर बड़ा ही होता। बसपा ने साफ़ तौर पर कांग्रेस के वोट को काटा और कांग्रेस को उलझन में डाला। यह बात और है कि मायावती ने दोनों राज्यों में समर्थन दिया है लेकिन अपनी ताकत का अहसास कराकर।

कांग्रेस इस अहसान को शायद ही भूलपाये। अब ना बसपा को कांग्रेस से परहेज हो सकता है और ना ही कांग्रेस मायावती को अलग करके चल सकती है। राजनीतिक रूप से सबसे उत्तर प्रदेश में भी भाजपा विरोधी महागठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने की संभावना बढ़ गई है। कांग्रेस के लिए सिर्फ दो सीट छोड़ने की बात करने वाले सपा और बसपा के नेता सात सीटें देने पर राजी हो गए हैं। थोड़ी बातचीत के बाद सीटें बढ़ भी सकती हैं। बिहार में भी अब राजद को कांग्रेस के लिए उसकी मनलायक सीटें छोड़नी होंगी। बाकी राज्यों के संभावित सहयोगी भी तालमेल की बातचीत का रास्ता खोल रहे हैं।

तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत से कई राज्यों में गठबंधन का रास्ता साफ हो गया है। कम से कम लोकसभा चुनाव के लिए पार्टी गठबंधन करेंगी और कांग्रेस को उसके मनलायक सीटें भी मिलेंगी। इन नतीजों से पहले ऐसा लग रहा था कि झारखंड में शायद महागठबंधन नहीं बने। पर अब बताया जा रहा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन के लिए तैयार है। वह सिर्फ तीन सीटें लेकर भी महागठबंधन में रहने पर सहमत हो गई है। सो, अब झारखंड में कांग्रेस, जेएमएम, जेवीएम और राजद का महागठबंधन बनना तय लग रहा है, जिसमें राज्य की 14 में आठ सीटें कांग्रेस के पास रहेंगी।

इसी तरह तमिलनाडु का मामला भी अब निपटता दिख रहा है। जानकार सूत्रों का कहना है कि पी चिदंबरम ने अपने बेटे कार्ति के भविष्य की चिंता में डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन से बात कर ली थी और उनसे वादा कर दिया था कि कांग्रेस पांच ही सीटें लेकर लड़ने को तैयार है। बाद में कांग्रेस में इसका विरोध हुआ। अब कहा जा रहा है कि डीएमके पहले की तरह कांग्रेस के लिए आठ सीट छोड़ने पर राजी हो जाएगी। महाराष्ट्र में पहले से कांग्रेस और एनसीपी सीट बंटवारे पर चर्चा कर रहे हैं। वहां भी अब तय हो गया दिख रहा है कि एनसीपी से कम से कम दो सीट ज्यादा लड़ेगी कांग्रेस।

एक नजर फिर से बसपा की राजनीति पर। मध्य प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को पांच फीसदी वोट मिले हैं। जबकि कांग्रेस और भाजपा के वोट बराबर हैं, बल्कि भाजपा को ही थोड़े से वोट ज्यादा मिले हैं। अगर कांग्रेस ने बसपा से तालमेल किया होता तो लड़ाई इतनी नजदीकी नहीं रहती। दोनों के बीच पांच फीसदी वोट का फासला होता और करीब 30 से ज्यादा सीटों का अंतर होता। इसके उलट बसपा के लड़ने से मुकाबला नजदीकी हो गया और कांग्रेस संयोग से जीत गई। सिर्फ चार हजार वोट इधऱ उधर होने से भाजपा को बहुमत मिल जाता। इतना नजदीकी मुकाबला बसपा के कारण है। इसी तरह राजस्थान में भी बसपा को चार फीसदी वोट मिले हैं। जबकि कांग्रेस और भाजपा के बीच सिर्फ आधा फीसदी वोट का अंतर है। अगर बसपा से कांग्रेस का तालमेल होता तो 38.8 फीसदी वोट लेकर भाजपा की सीटों की संख्या बहुत कम होती।

बसपा ने छत्तीसगढ़ में अजित जोगी की पार्टी के साथ तालमेल करके चुनाव लड़ा था। बसपा को वहां साढ़े पांच लाख से ज्यादा करीब चार फीसदी मिले हैं, जबकि जोगी की पार्टी को करीब आठ फीसदी वोट मिले हैं। इन दोनों को मिले 11 फीसदी वोट मोटे तौर पर भाजपा का कोर वोट था, जो नाराजगी में इनके साथ चला गया। कांग्रेस और भाजपा के वोट में दस फीसदी का जो अंतर रहा वह इनकी वजह से रहा। इन दोनों ने मिल कर भाजपा के वोट काटे। कांग्रेस तो अपने पुराने वोट से थोड़ा ही आगे बढ़ पाई पर भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ।

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